'मुठभेड़' के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के बाद कर्फ़्यू

कश्मीर में कर्फ्यू (फाइल फोटो) इमेज कॉपीरइट ASSOCIATED PRESS

भारत प्रशासित कश्मीर के सीमावर्ती शहर कुपवाड़ा में कर्फ़्यू लगा दिया गया है.

मंगलवार को कुपवाड़ा में बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिकों ने भारतीय सेना के एक मुठभेड़ में सात चरमपंथियों के मारे जाने के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया था.

भारतीय सेना ने कुपवाड़ा के दर्दपोरा जंगल में मुठभेड़ में सात चरमपंथियों को मारने का दावा किया है.

चश्मदीदों के अनुसार सात लोगों की मौत से भड़के युवाओं ने स्थानीय पुलिस स्टेशन में घुसने की कोशिश की लेकिन पुलिसकर्मियों ने नाराज़ भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले दागे.

भारतीय रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता लेफ़्टिनेंट कर्नल एन एन जोशी ने सोमवार को जारी एक बयान में कहा, "लोलाब के दर्दपोरा जंगल में सेना के गश्तीदल पर गोलियां चलाई गई थीं. सेना के गश्त दल ने भी जवाबी कार्रवाई की. भारी गोलीबारी में सात चरमपंथी मारे गए हैं."

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जम्मू-कश्मीर पुलिस पहले ही सेना के इस दावे की पुष्टि कर चुकी है. पुलिस ने कहा है कि "ये सेना और पुलिस का संयुक्त अभियान था."

'फ़र्ज़ी मुठभेड़'

कुपवाड़ा में हड़बड़ी में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाई गई. इस प्रेस कॉन्फ़्रेंस में जैसे ही पत्रकार पहुंचे, स्थानीय लोगों ने मृतकों की असली पहचान बताने की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया.

कुपवाड़ा ज़िले के एक निवासी अब्दुल अहाद ने कहा, "इस तरह की फ़र्ज़ी मुठभेड़ पहले भी होती रही है. इसलिए हम सेना की बातों पर भरोसा नहीं कर सकते. लोग मृतकों के शव देखना चाहते हैं ताकि उनकी पहचान कर सकें. अगर सेना झूठ नहीं बोल रही तो प्रदर्शन कर रहे लोगों पर बल प्रयोग कर उन्हें तितर-बितर क्यों किया गया?"

स्वतंत्र फ़ोटो पत्रकार शाहिद मेराज ने कहा, "पुलिस ने लोगों पर आंसू गैस के गोले छोड़े और उन्हें बुरी तरह मारा-पीटा. इस मारपीट में हमारे भी कुछ सहयोगी घायल हुए हैं."

सेना की ओर से कश्मीर के दूरदराज़ के इलाकों, खासकर नियंत्रण रेखा से सटे इलाकों, में की जाने वाली मुठभेड़ों पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं.

साल 2010 में कुपवाड़ा इलाके में हुई ऐसी ही एक मुठभेड़ पुलिस की जांच के बाद फ़र्ज़ी पाई गई थी. मुठभेड़ के फ़र्ज़ी होने की बात सामने आने पर पूरी घाटी में अलगाववादियों ने अभियान चलाया था.

प्रदर्शनों पर काबू पाने के लिए की गई कार्रवाई में 100 से ज़्यादा लड़कों की मौत हो गई थी.

ड्रेसकोड

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एक युवा पत्रकार तारिक अली मीर बताते हैं, "हमें कुछ भी ख़बर नहीं कि वहां क्या हो रहा है. हमारी जानकारी का स्रोत या तो सेना है या पुलिस. इसलिए हम ना तो सेना के दावे पर विश्वास कर सकते हैं, न ही खंडन कर सकते हैं. जब स्थानीय नागरिकों की तरफ़ से अलग बयान आता है तब हमें कहानी का पता चलता है"

भले ही भारतीय सेना कश्मीर में आम जनता का विश्वास जीतने के लिए बड़े पैमाने पर वित्तीय संसाधन खर्च कर रही हो, बार-बार उठने वाले विवादों ने उसकी नाक में दम कर रखा है.

हाल ही में एक और विवाद उठा था. एक स्थानीय पत्रकार ने तब नाराज़गी जताई थी जब प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान भारत प्रशासित कश्मीर में सेना के कमांडर ने उन्हें ड्रेस कोड में आने की हिदायत दी. बाद में सेना ने इसे वापस ले लिया था.

सेना ने प्रेस कांफ्रेंस के दौरान पत्रकारों को फिरन न पहन कर आने की हिदायत दी थी. फिरन एक लंबा परिधान है जिसे कश्मीर के लोग सर्दियों में पहनते हैं.

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