फ़ेसबुक: दोस्त, सलाह या अफ़वाह

बीबीसी हिंदी फ़ेसबुक पेज

इंदौर की एक 25 साल की लड़की ने आत्महत्या करने से पहले अपने फ़ेसबुक पेज पर इस बारे में स्टेटस मैसेज पोस्ट किए, लेकिन उसके परिवार ने कभी इन पर ध्यान नहीं दिया. क्या सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई निजी बातों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए? क्या फ़ेसबुक किसी की मन: स्थिति का आईना हो सकता है? बीबीसी फ़ेसबुक इंडिया बोल में हमने आपसे यही सवाल पूछा था.

बीबीसी हिंदी के फ़ेसबुक पेज पर इस सवाल पर हमें सैकड़ों जबाव मिले हैं जिनमें मिलीजुली प्रतिक्रियाएं व्यक्त की गई हैं.

मोहम्मद आज़ाद क़ादरी कहते हैं, ''लोग समझते हैं कि फ़ेसबुक टाइमपास के लिए है. लेकिन मैं मानता हूं कि फ़ेसबुक किसी की दुखभरी या सुखभरी बातों को साझा करता है और इससे उस व्यक्ति का बोझ हट जाता है. फ़ेसबुक पर जो भी बातें हों, उसे हमें गंभीरता से लेना चाहिए.''

इमरोज़ शेख़ का मानना है, ''बिल्कुल गंभीरता से लेना चाहिए. जब इंसान तन्हा होता है तो वह फ़ेसबुक का ही सहारा लेता है अपने दिल की बात कहने के लिए. क्योंकि तन्हाई में उसके पास कोई और नहीं होता है...''

प्रबुद्ध कश्यप लिखते हैं, ''कुछ बातें जो हम अपने किसी नज़दीकी से नहीं कह सकते, उन्हें हम फ़ेसबुक पर लिखते हैं. इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए.''

'दोस्त, सलाह या अफ़वाह'

कुंदन झा विद्यार्थी कहते हैं, ''किसी के पास किसी के साथ बैठने का वक्त नहीं है. ऐसे में लोग फ़ेसबुक के रूप में एक दोस्त पाते हैं और अपने मन की बातों को शेयर करते हैं. कभी-कभी सच्चे दोस्त की तरह फ़ेसबुक पर सलाह भी मिल जाती है.''

दीपक शर्मा का मानना है, ''किसी के दिमाग को उस व्यक्ति को देखकर ही पढ़ा जा सकता है. अगर फ़ेसबुक पर इन सबकी बेकार बातों पर ध्यान दिया गया तो सब तरफ़ अफ़वाहें ही अफ़वाहें होंगी.''

इसी तरह अरविंद कुमार लिखते हैं, ''फ़ेसबुक पर बातों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए क्योंकि बहुत से लोग सिर्फ़ अपने पहलू को ही सही समझते हैं और उसी हिसाब से पोस्ट करते हैं. फ़ेसबुक पर कई लोग अपनी ज़िंदगी की अच्छी बातों और उम्दा तस्वीरों को ही पोस्ट करते हैं ताकि उन्हें ज्यादा से ज्यादा लाइक और कमेंट्स मिलें...इसे देखकर दूसरे लोग ज़रूर अपनी ज़िंदगी के बारे में दुखी हो जाते हैं.''

वहीं ईशान जायसवाल कहते हैं, ''फ़ेसबुक समाज का एक आईना है. इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए.''

राकेश राठौड़ लिखते हैं, ''दोस्तों मैं समझता हूं कि फ़ेसबुक पर नब्बे प्रतिशत लोग सच कहते हैं. फिर चाहे वो फ़ेक हो या रियल.''

कमलेश अरोड़ा का मानना है, ''फ़ेसबुक एक ऐसी वेबसाइट है जहां आप अपनी बात लिखकर मित्रों से शेयर कर सकते हैं. अगर लड़की ने कुछ लिखा है तो उसे सुबूत मान लेना उचित है, जैसे पुलिस क़लमबंद बयान को महत्व देती है.''

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