क्या सचमुच मोदी की 'लहर' बन रही है?

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साल 2013 की शुरुआत से ही भारत की राजनीतिक फ़िजा में एक सवाल तैर रहा है, क्या आगामी आम चुनाव में भाजपा नेता नरेंद्र मोदी की लहर रहेगी? आर्थिक मामलों में गुजरात के मुख्यमंत्री का प्रदर्शन प्रभावशाली रहा है लेकिन साल 2002 में गुजरात में हुए हिंसक दंगों के बाद से उन्हें विभाजनकारी नेता के रूप में भी देखा जाता रहा है.

पिछले साल सितंबर में नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी ने अपना प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया. उस वक़्त यह कहना जल्दबाज़ी होती कि आम भारतीय आगामी लोक सभा चुनाव में मोदी को भारी संख्या में वोट देंगे कि नहीं.

भारत में हाल ही में हुए विधान सभा चुनाव में भाजपा के दमदार प्रदर्शन के बाद पहले से आ रही आहट और तेज़ प्रतीत होने लगी है.

हाल ही में सामने आए कुछ चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के नतीजों से लगता है कि एक ऐसी 'लहर' है जिसे नकारना मुश्किल है. लेकिन भारतीय राजनीति की राह कभी भी इतनी आसान नहीं रही है.

जटिलता

दिल्ली स्थित एक सम्मानित थिंक टैंक सेंटर फॉर दि स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटी (सीएसडीएस) के लोकनीति कार्यक्रम के तहत किए गए एक ताज़ा सर्वेक्षण को देखें तो नरेंद्र मोदी के समर्थन में उठी लहर के पक्ष में चार प्रमुख साक्ष्य दिखते हैं.

पहला, भाजपा ने साल 2009 में 18.8 प्रतिशत मत प्राप्त किए थे. साल 1998 में मिले 25.6 प्रतिशत मतों की तुलना में ये भारी गिरावट थी. (देखें – नीचे की तालिका)

सीएसडीएस के जुलाई, 2013 के सर्वेक्षण के अनुसार भाजपा को 27 प्रतिशत मत मिलने की संभावना जताई गई थी. जनवरी, 2014 में यह आंकड़ा 34 प्रतिशत पहुंच गया यानी कि मतों में 80 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो सकती है.

भारतीय चुनाव की अनिश्चितता को देखते हुए कहा जा सकता है कि भारत में मतों को सीटों में बदलना थोड़ा जटिल है.

एक अनुमान के मुताबिक़ 34 प्रतिशत मतों से भाजपा को 192 से 201 सीटें मिल सकती हैं. भारत की 543 सीटों वाले संसद में अगर भाजपा इतनी सीटें पाने में सफल रहती है तो यह उसे साल 2009 में मिली 116 सीटों से काफ़ी ज़्यादा होंगी.

दूसरा, सीएसडीएस के अनुसार भारत की राजनीति में ख़ास स्थान रखने वाली 'हिन्दी पट्टी' में भाजपा के पक्ष में एक छिपी हुई लहर है. (नीचे का ग्राफ़ देखें)

बिहार और उत्तर प्रदेश में कुल मिलाकर लोकसभा की 120 सीटें हैं. भाजपा के मतों में बिहार में 25 प्रतिशत और यूपी में 20 प्रतिशत की वृद्धि होने की बात कही जा रही है.

इन सभी राज्यों के बारे में सबसे ख़ास बात है कि यहाँ भाजपा और कांग्रेस में सीधी टक्कर नहीं है. हर राज्य में किसी न किसी क्षेत्रीय पार्टी का मजबूत दबदबा है.

इसका अर्थ है कि भाजपा के पक्ष में जो झुकाव दिख रहा है वो केवल कांग्रेस-विरोध के कारण नहीं है.

यूपी में कांग्रेस से नाराज़गी का सीधा फ़ायदा राज्य की राजनीति की कद्दावर पार्टियों समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को मिलता नहीं दिख रहा है. इनके बजाय यह फ़ायदा भाजपा को मिल सकता है.

बिहार में जनता चाहती है कि राज्य स्तर पर जनता दल (एकीकृत) बना रहे लेकिन लोकसभा चुनाव में वो भाजपा को चाहती है.

भाजपा उन राज्यों में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद कर रही है जहाँ ऐतिहासिक रूप से अच्छा प्रदर्शन नहीं करती रही है.

लोकप्रियता

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ऐसा नहीं है कि भाजपा के इस संभावित प्रदर्शन के पीछे पार्टी का मजबूत होना है. यह मोदी के प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करने का ही असर लग रहा है.

कर्नाटक को छोड़ दिया जाए तो भाजपा पिछले कुछ चुनाव से दक्षिण भारत में जगह बनाने में ख़ास सफल नहीं रही है.

कमजोर आधार होने के बावजूद आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में भाजपा का मत प्रतिशत क्रमशः छह और 14 प्रतिशत बढ़ा है.

इन राज्यों में भाजपा के अनुमानित प्रदर्शन से उसे सीटें मिलती तो नहीं दिख रहीं लेकिन इससे यह ज़रूर पता चलता है कि उसका समर्थन बढ़ रहा है.

और अगर भाजपा का समर्थन बढ़ना जारी रहा तो कई अन्य क्षेत्रीय दल चुनावों से पहले भाजपा से हाथ मिला सकते हैं.

तीसरा, मतदाताओं के बीच मोदी का असर साफ़ दिखता है. (देखें नीचे की तालिका)

साल 2009 में दो प्रतिशत लोगों ने मोदी का समर्थन किया था.

साल 2011 में यह समर्थन बढ़कर पांच प्रतिशत, साल 2013 में 19 प्रतिशत और जनवरी 2014 में 34 प्रतिशत हो गया. इसके उलट कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के समर्थन में कोई ख़ास बढ़ोत्तरी नहीं देखी गई.

सीएसडीएस ने जिन राज्यों में भी सर्वेक्षण किया उनमें कमोबेश मतदाताओं ने मोदी को राहुल पर तरजीह दी.

अक्तूबर, 2013 में मध्य प्रदेश के 31 प्रतिशत मतदाता मोदी को प्रधानमंत्री देखना चाहते थे तो अब यहाँ 54 प्रतिशत मतदाता उन्हें इस पद पर देखना चाहते हैं.

अब से बस एक महीने पहले छत्तीसगढ़ और राजस्थान में क्रमशः 15 प्रतिशत और 40 प्रतिशत मतदाताओं की प्रधानमंत्री पद की पसंद मोदी थे तो अब इन्हीं राज्यों में क्रमशः 28 प्रतिशत और 48 प्रतिशत लोग मोदी को इस पद पर देखना चाहते हैं.

मोदी के पक्ष में चल रही 'लहर' का चौथा साक्ष्य है नौजवान मतदाताओं में भाजपा की उल्लेखनीय अपील.

विकास और रोज़गार की बात बार-बार करके मोदी ने 25 साल के आसपास के मतदाताओं की आकांक्षाओं को हवा देकर उन्हें अपने पक्ष में मोड़ा है. गुजरात के आर्थिक विकास का उदाहरण सामने ही है.

विभिन्न स्थितियाँ

18 साल से 25 साल के युवाओं के बीच भाजपा तुलनात्मक रूप से ज़्यादा स्वीकार्य पार्टी है लेकिन उम्र बढ़ने के साथ ही मतदाताओं में भाजपा के प्रति रुझान कम होता देखा जा सकता है. (देखें नीचे तालिका)

लेकिन 56 वर्ष से ऊपर का आयु वर्ग ही एकमात्र ऐसा आयुवर्ग है जिसमें कांग्रेस भाजपा पर भारी दिखती है.

यह भी सही है कि साल 2004 और साल 2009 में सर्वेक्षणों में भाजपा की जीत के दावे ग़लत साबित हुए थे लेकिन इस बार स्थितियाँ बदली हुई हैं.

नौजवानों के बीच धीमे विकास, बढ़ती मुद्रा स्फीति और रोज़गार के अभाव को लेकर एक नाराज़गी है.

यह भी देखा जा रहा है कि ढेरों भारतीय एक ऐसा नेता चाहते हैं जो निर्णय लेने में सक्षम हो. देश की वर्तमान सरकार में उन्हें यह गुण नहीं दिखता और माना जाता है कि मोदी की छवि फ़ैसले लेने वाले नेता की है.

अगर ये सर्वेक्षण सही भी हैं तो मोदी की राह में अभी कई दूसरी बाधाएँ खड़ी हैं.

बाधाएँ

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इन बाधाओं में सबसे पहला तो यह है कि सभी विरोधी दल भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता का मुक़ाबला करने के लिए आपस में हाथ मिलाने की कोशिश कर रहे हैं. भारत में गठबंधन की राजनीति का समीकरण काफ़ी जटिल है.

भाजपा की संभावित सहयोगी एआईडीएमके ने हाल ही में तमिलनाडु में वाम दलों के साथ गठबंधन की घोषणा की है. इस गठबंधन से जयललिता ने छिपे तौर पर संकेत दिया है कि वह ख़ुद ही प्रधानमंत्री पद की संभावित दावेदार हैं.

नरेंद्र मोदी के लिए सबसे चिंता का विषय है भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की कोख से उपजी आम आदमी पार्टी.

भाजपा को सीधी टक्कर देते हुए आम आदमी पार्टी भी शहरी, युवा और मध्यवर्गीय मतदाताओं को ध्यान में रखे हुए है.

चुनाव होने में अभी तक़रीबन दो महीने हैं इसलिए चौंकाने वाली कई बातों के सामने आने के लिए अभी पर्याप्त समय है.

भाजपा का रास्ता सुगम तो नहीं है लेकिन ऐसा लगता ज़रूर है कि वो सचमुच 'मोदी की लहर' पर सवार है.

(मिलन वैष्णव अमरीका के वाशिंगटन डीसी स्थित कार्नेगी एनडाउमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के दक्षिण एशिया प्रोग्राम से जुड़े हुए हैं.)

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