गोधरा: नौ सालों ने चुकाई एक दिन की क़ीमत

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इनायत अब्दुल सत्तार जुजारा को 27 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में आग लगाने के मामले में गिरफ़्तार किया गया था. साबरमती जेल की सलाखों के पीछे नौ सालों तक रहने के बाद फरवरी, 2011 में उन्हें एक विशेष ट्रायल कोर्ट ने निर्दोष करार दिया.

गोधरा ट्रेन हत्याकांड में जिन 64 लोगों को निर्दोष पाया गया, उनमें इनायत अब्दुल सत्तार भी एक थे लेकिन उनका संघर्ष अभी ख़त्म नहीं हुआ है.

इनायत एक सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी हैं और सिग्नल फालिया कालोनी के निवासी हैं, जहां से ज़्यादातर लोगों को गिरफ़्तार किया गया था.

फिलहाल वह राज्य सरकार से अपनी ग्रेच्युटी और अन्य बकाया पाने की लड़ाई लड़ रहे हैं.

इनायत की पत्नी अज़ीज़ा ख़ान जब भी उनसे मिलने अहमदाबाद जातीं तो वह रोजा रखती थीं. अहमदाबाद की जेल में नौ साल बिताने के दौरान हर दिन इनायत की पत्नी उनके लिए जेल में खाना भेजती थीं.

त्रासदी

अज़ीज़ा बताती हैं, "जब तक वह जेल में रहे, किसी ने ईद नहीं मनाई. इन सालों के दौरान मैंने एक भी कपड़ा नहीं ख़रीदा, आज हमारे लिए हर दिन ईद के जैसा है."

उन्होंने कहा, "जब उनकी गिरफ़्तारी हुई तो मेरे सभी बच्चे स्कूल जाते थे, जबकि उनके जेल में रहने के दौरान मैंने अपने चार बच्चों की शादी की और शादी की तारीख़ तभी तय की जाती थी जब उन्हें उस दिन पेरोल पर बाहर आने की इजाज़त मिल जाती थी."

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अज़ीज़ा ने बताया, "उन्होंने तो अपनी पूरी ज़िंदगी में किसी को घूँसा भी नहीं मारा होगा. यहां तक कि जवानी के दिनों में भी इनायत ने किसी के साथ बहस भी नहीं की होगी, दुर्भाग्य यह रहा कि उन्हें लोगों को मारने के लिए गिरफ़्तार किया गया."

अज़ीज़ा अब चाहती हैं कि इनायत अपना पूरा समय परिवार के साथ बिताएँ, ताकि उन नौ सालों की कुछ भरपाई तो हो सके.

लंबी लड़ाई

इनायत गुजरातसरकार के सिंचाई विभाग में काम करते थे. उन्हें रिटायर होने से 13 महीने पहले फ़रवरी 2002 में गिरफ़्तार किया गया था.

पुलिस के मुताबिक़ वह ट्रेन को आग लगाने वाले अभियुक्तों में शामिल थे. आरोपपत्र में इनायत के ख़िलाफ़ साक्ष्य के तौर पर गिरफ़्तारी पंचनामा और दो पुलिसकर्मियों के बयान थे. लेकिन ट्रायल कोर्ट में दोनों पुलिसकर्मी इनायत की पहचान करने में नाकाम रहे.

इनायत ने कहा, "पंचनामा के मुताबिक़ मुझे सुबह नौ बजे गिरफ़्तार किया गया था और सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार मैं उस समय अपने दफ़्तर में बैठकर तनख्वाह के चेक बना रहा था. मेरे ख़िलाफ़ कोई आरोप सिद्ध नहीं होने के बाद भी मुझे जमानत नहीं दी गई."

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उन्होंने बताया, "मैं सरकार से अपना बकाया पाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहा हूं. एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी के तौर पर मुझे ग्रेच्युटी और दूसरे बकाया मिलने चाहिए, लेकिन वो मुझे अभी तक नहीं दिए गए हैं."

पुलिस की चार्जशीट के मुताबिक़ इनायत को मौके से गिरफ़्तार किया गया था. वह जिस सिग्नल फालिआ इलाक़े में रहते थे, वो दुर्घटनास्थल से लगा हुआ था.

विकास के दावे

ट्रायल कोर्ट ने गोधरा हत्याकांड मामले में फरवरी 2011 में अपना फ़ैसला दिया. उसने पाया कि सिग्नल फालिया इलाक़े से आई भीड़ ने ट्रेन पर लाठी, पत्थर और तलवारों से हमला किया.

सभी के विकास के भारी भरकम दावे सिग्नल फालिया में आकर ढह जाते हैं, जो गोधरा कांड के बाद से काफ़ी बदनाम हो चुका है. सिग्नल फालिया के 2,000 परिवारों के लिए पानी, साफ़-सफाई और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं आज भी एक सपने की तरह हैं.

इस इलाक़े में दर्ज़ी की दुकान चलाने वाले शोएब सत्तार कहते हैं, "पिछले दस सालों के दौरान हमारे लिए कुछ नहीं बदला है. इस सोसाइटी में सड़क या पानी के लिए कोई कनेक्शन नहीं है. इस सिलसिले में हम लोगों ने संबंधित लोगों से कई बार मुलाक़ात की लेकिन कुछ नहीं हुआ."

उन्होंने बताया, "मेरी दुकान पर कपड़े सिलवाने के लिए कई हिंदू आते हैं. हमारे दिलों में कोई नफ़रत नहीं है. सिर्फ़ इसलिए क्योंकि 12 साल पहले इस इलाक़े के कुछ मुट्ठी भर लोगों ने कथित रूप से साबरमती एक्सप्रेस को जला दिया था, वो पूरी कॉलोनी को नज़र अंदाज कर रहे हैं. ये अन्याय है."

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