ख़तरनाक आदमख़ोर बाघ की तलाश में...

  • 27 फरवरी 2014

उत्तर प्रदेश के उत्तरी हिस्से में स्थित साहूवाला गांव में सालों से खतरा बने भारत के अतिवांछित आदमख़ोर बाघ को मारने की चुनौती ने अनुभवी शिकारियों रमेश चौहान और आशीष दासगुप्ता की नसों का दबाव बढ़ा दिया है और उनकी प्रतिष्ठा भी दांव पर लगा दी है.

दल के मुखिया आशीष दासगुप्ता के मुताबिक़ हो सकता है कि इस आदमख़ोर बाघ ने अब तक 10 लोगों की जान ली हो.

वह अभी तक इस बात को लेकर भी निश्चित नहीं है कि बाघ अभी तक जिंदा भी है या नहीं क्योंकि अफवाह है कि स्थानीय सिखों ने उसे मारा डाला है लेकिन वह इस पर चुप हैं.

इन शिकारियों को वहां पहुँचे एक हफ़्ते हो गए है और वे अब निराश हो रहे हैं.

आदमख़ोर बाघ का शिकार हुआ आख़िरी मामला 65 वर्षीय लाल सिंह का था. वह बाघ का शिकार तब बने थे जब वह अपने भैसों को चराने ले गए थे.

उनका पोता विक्की सिंह उस दिन को याद करते हुए कहता है कि "मवेशी उनके बिना ही वापस लौट आए थे."

विक्की ने कहा, "अगली सुबह मैंने उनकी लाल-पीली रंग की पगड़ी पाई थी और फिर उनके पैर और शरीर के अन्य अंग पाए. मैं पूरी तरह से टूट गया."

आदमख़ोर बाघ

आदमख़ोर बाघ गांव के चारों ओर गन्ने के खेतों, जंगल और झाड़ी के बीच कहीं है जहां दासगुप्ता और उनकी टीम ने ध्यान केंद्रित किया हुआ है.

नरभक्षी बन चुके 40 बाघों का शिकार कर चुके अनुभवी शिकारी दासगुप्ता का कहना है कि यह मामला "विशेष रूप से दिग्भ्रमित" करने वाला है.

इस बाघ ने दिसंबर की आख़िर में लोगों को मारने की शुरुआत की. उसकी एक रणनीति गन्ने के खेतों में काम कर रहे लोगों पर छिपकर हमला करने की है.

दासगुप्ता अपनी कूल्हे पर टंगी पिस्तौल पर हाथ रखते हुए कहते हैं कि "वह कहीं से भी आ सकता है और फिर अचानक गायब हो सकता है. यह सब कुछ पलक झपकते हो सकता है".

यहां से कुछ देर की दूरी पर ही भारत का सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क है जो कि देश में अनुमानित 1700 जंगली बाघों में हर दस में से एक का घर है.

पूरी दुनिया में पाए जाने वाले बाघों की आधी से ज़्यादा आबादी भारत में है. माना जा रहा है कि यह आदमख़ोर बाघ इसी अभयारण्य से आया है.

लेकिन आदमख़ोर बाघ के शिकार के शुरुआती हमले 100 किलीमीटर से अधिक की दूरी पर हुए हैं जो कि बाघ के विचरण के सामान्य दायरे से बहुत दूर है.

खाने का तरीक़ा

दूसरी आश्चर्य की बात यह है कि आदमख़ोर बाघ के अपने शिकार को खाने का तरीक़ा.

दासगुप्ता कहते है, "वह सिर्फ शरीर के कोमल अंगों जैसे पेट और गुप्तांगों को ही खा रहा है पूरे शरीर को नहीं. ऐसा लगता है कि वह मांस के मोटे हिस्से को खाने और हड्डियों को चबाने में सक्षम नहीं है."

दासगुप्ता संभावना जताते हैं कि यह बाघ ज़ख्मी है और अपनी जबड़े का सही से इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है. शायद इसी वजह से वह हिरण और अन्य जंगली जानवरों के बजाए इंसानों को अपना निशाना बना रहा है.

लेकिन अगर बाघ जिंदा है तो वह फिर से हमला करेगा क्योंकि उसे अब उसकी जीभ को इंसानी खून लग चुका है.

रात घिरते ही शिकारी अपनी जीप और सर्चलाइट के जरिए बाघ की तलाश शुरू कर देते हैं.

गांव के लोग अभी भी दहशत में हैं. वे अपनी मवेशियों को चराने भी नहीं ले जा रहे हैं.

आशंका

पत्ते के हिलने की आहट भी गांव वालों को इस आशंका से भर दे रही है कि कहीं बाघ तो नहीं.

हालांकि कुछ संरक्षणवादी बाघ को मारने के बजाए बेहोश करने की वकालत कर रहे हैं. अटकलों के मुताबिक़ यह आदमख़ोर बाघ मादा हो सकती है.

गन्ने की फसल काटने के लिए मज़दूरों की किल्लत से जूझ रहे स्थानीय किसान शाहिद हुसैन कहते हैं, "हम बाघों के साथ रह रहे हैं. वे कभी-कभी हमारे मवेशियों को खा जाते है कोई बात नहीं लेकिन वे अगर इंसानों को खाएंगे तो हम इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते".

दासगुप्ता बताते है कि यह उनका पेशा नहीं है बल्कि शौक है. दासगुप्ता एक उद्यमी है. उनके दोस्त रमेश चौहान कांग्रेस पार्टी के नेता है. उनकी टीम के अन्य दो सदस्य फार्मासिस्ट और प्रॉपर्टी डीलर हैं.

रमेश चौहान कहते है कि "दासगुप्ता झाड़ियों में पैदल उतर जाते है लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकता".

वह शिकार के दौरान जीप में ही रहना पसंद करते है. शिकार के मद्देनज़र दासगुप्ता एक राज़ साझा करते हुए कहते हैं, "एक बाघ की तरह सोचो, एक परभक्षी की तरह सोचो".

हमले के सात हफ़्ते के बाद आतुर राज्य सरकार ने अब और अधिक शिकारियों को बुलाया है.

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