वर्ष 2000 की मैच फ़िक्सिंग रिपोर्ट में था क्या?

  • 6 मार्च 2014
Image caption एमए गणपति इन दिनों भारत सरकार के गृह मंत्रालय में बतौर संयुक्त सचिव कार्यरत हैं.

वर्ष 2000 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में मैच फ़िक्सिंग नामक एक भूचाल आया जिससे कई नामचीन हस्तियों पर सवाल उठे.

आरोप लगे थे सट्टेबाज़ों के ज़रिए मैचों, पिचों और टीम के चयन की पहले से जानकारी मुहैया कराने के.

भारत में बढ़ते दबाव के बीच केन्द्रीय जांच ब्यूरो को ये मामला सौंपा गया और उनके पास तहक़ीक़ात करने का समय भी कम था.

दूसरी ओर मीडिया में तरह-तरह की ख़बरें आ रहीं थीं और भारतीय टीम के सितारों के नामों पर कभी सही तो ज़्यादातर ग़लत क़यास भी लग रहे थे.

सीबीआई की ओर से जांच करने वाले तीन आला अफ़सरों में से एक एमए गणपति थे जिन्होंने बीबीसी हिंदी से हुई ख़ास बातचीत में इस बात का भी उल्लेख किया कि कैसे उनकी टीम ने बिना एफ़आईआर दर्ज हुए इस मामले की पड़ताल की.

उन्होंने बताया, "दिलचस्प बात ये है कि इस मामले में जो असल जांच हुई वो तो आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय ने की. मामले दर्ज हुए, चंद लोगों को शक के आधार पर हिरासत में लिया गया और बाद में उन्हें ज़मानत भी मिली. रहा सवाल सट्टेबाज़ों का तो उन पर तो गैम्बलिंग एक्ट जैसे क़ानून के तहत मामला चला. हालांकि मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि इस तरह के मामलों पर क़ानून बनें. आर्थिक अपराधों की तरह खेलों में होने वाली जालसाज़ी पर भी कड़े क़दम उठाए जाएं".

चार्जशीट

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Image caption कपिल देव पर लगाए मनोज प्रभाकर के आरोप सीबीआई ने खारिज कर दिए.

वर्ष 2000 में क्रिकेट मैच फ़िक्सिंग मामले में पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन और अजय शर्मा पर आजीवन प्रतिबंध लगाया गया था.

टीम के उप-कप्तान अजय जडेजा और मनोज प्रभाकर पर पांच-पांच वर्ष तक क्रिकेट न खेलने का प्रतिबंध लगाया गया जबकि टीम के फ़िज़ियो अली ईरानी पर भी प्रतिबंध लगा था.

ये सब कुछ सीबीआई द्वारा सौंपी गई उस 162 पेज की रिपोर्ट के आधार पर था जिसके बाद किसी के ख़िलाफ़ कोई औपचारिक मामला तो दर्ज नहीं किया गया था लेकिन प्रमुख बातें ये थीं:

  • पूर्व कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन ने क्रिकेट मैचों को 'फ़िक्स' किया जिसमें उनका साथ दिया अजय जडेजा और नयन मोंगिया ने. रिपोर्ट के अनुसार अज़हरुद्दीन ने पूछताछ के दौरान एम के गुप्ता नामक एक बुकी से अपने संबंधों पर जानकारी दी थी.
  • वेस्टइंडीज़ के बल्लेबाज़ ब्रायन लारा पर मुकेश गुप्ता ने 40,000 डॉलर 'घूस' लेने का इल्ज़ाम लगाया था जिसे संबंधित व्यक्ति ने पूरी तरह ख़ारिज कर दिया.
  • इंग्लैंड के पूर्व कप्तान एलेक स्टीवर्ट पर मुकेश गुप्ता ने पिच, मौसम और टीम के बारे में जानकारी के आरोप लगाए थे. हालांकि गुप्ता ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि एलेक स्टीवर्ट और न्यूज़ीलैंड के मार्टिन क्रो ने मैच फ़िक्स करने के उनके ऑफ़र को ठुकरा दिया था.
  • रिपोर्ट में कहा गया था कि उस समय से पहले भी भारत में कुछ घरेलू क्रिकेट मैचों पर पैसा लगने के प्रमाण मिले हैं लेकिन 1983 में भारत के पहली बार विश्व कप जीतने के बाद से इस पर पैसा ज़्यादा लगाया जाने लगा.
  • सीबीआई रिपोर्ट के अनुसार पूर्व भारतीय ऑलराउंडर मनोज प्रभाकर ने कई विदेशी खिलाडियों की बुकीज़ से जान-पहचान कराई थी. हालांकि रिपोर्ट में और ख़ुद एमए गणपति ने बीबीसी को बताया कि "मनोज प्रभाकर ने कपिल देव पर जो 'रिश्वत'' देने के आरोप लगाए थे वे सभी जांच के दौरान बेबुनियाद पाए गए".

क़ानून

आख़िरकार मैच फ़िक्सिंग की जांच के बाद खिलाड़ियों पर क्रिकेट बोर्ड से प्रतिबंध लगे और उनके ख़िलाफ़ कोई भी क़ानूनी मामला नहीं दर्ज हुआ.

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Image caption प्रतिबन्ध पूरा होने के बाद अजय जडेजा ने रणजी ट्रॉफी खेलना शुरू किया है.

हालांकि जिन खिलाडियों पर बोर्ड ने प्रतिबंध लगाया था उनमें से अज़हरुद्दीन जैसों ने कोर्ट में इसके ख़िलाफ़ अपील की और कई साल बाद उन पर लगा प्रतिबंध हटाया भी गया. लेकिन ये भी सच है कि वर्ष 2000 के बाद भी भारत में स्पॉट फ़िक्सिंग जैसे कुछ मामले हुए हैं.

मई, 2013 में भारत के लिए खेल चुके श्रीसंत और कुछ अन्य खिलाडियों को आईपीएल के दौरान स्पॉट फ़िक्सिंग के आरोपों के तहत गिरफ़्तार किया गया और कई आपराधिक मामले भी दर्ज हुए. लेकिन 14 वर्ष पहले जब पहली बार मैच फ़िक्सिंग के आरोपों के तहत सीबीआई जांच हुई थी न तो तब इससे निबटने के लिए भारत में कोई क़ानून था और न 2014 तक बन सका है.

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