सबसे मज़ेदार हो सकते हैं 16वें आम चुनाव

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भारतीय संसद में 1989 के बाद अब तक किसी भी एक दल को बहुमत नहीं मिला है और इसके बाद की हर सरकार छोटे, क्षेत्रीय दलों के सहयोग से ही बनी हैं.

विश्लेषकों का कहना है कि अप्रैल और मई में नौ चरणों में होने वाले 16वें आम चुनाव के परिणाम भी इससे अलग नहीं होंगे.

आज़ादी के बाद छह दशकों में भारत में लोकतांत्रिक जड़ें मज़बूत हुई हैं. लोकतंत्र का स्वागत ही हुआ है भले ही थोड़ी अराजकता के साथ.

साल 1952 में हुए भारत के पहले आम चुनाव में हर संसदीय क्षेत्र में 4.67 उम्मीदवार थे. साल 2009 में हर संसदीय क्षेत्र में औसतन दस उम्मीदवार थे.

साल 1952 में चुनाव जीतने वाली पार्टी कांग्रेस और उसकी सबसे निकटतम प्रतिद्वंदी वामपंथी दलों के बीच 348 सीटों का अंतर था.

वर्ष 2009 में कांग्रेस और बीजेपी के बीच का अंतर 90 सीटों का था. मौजूदा लोकसभा में 39 पार्टियां हैं.

कांग्रेस और मोदी

हालांकि इसके बावजूद 2014 के चुनावों का ताना बाना कुछ ऐसा बुना गया है कि ये सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी और नरेंद्र मोदी के बीच है.

मोदी विवादित नेता हैं और मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं.

विश्लेषक कहते हैं कि धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था, बढती मंहगाई, भ्रष्टाचार के कई मामले और हर तरह से कमज़ोर दिख रही सरकार के कारण इन चुनावों में कांग्रेस पार्टी की सीटें कम होने की पूरी संभावना है.

चुनाव से पहले के सर्वेक्षणों में कांग्रेस को 100 से भी कम सीटें मिलने की संभावना बताई जा रही है.

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कई लोगों का कहना है कि दो बार लगातार सत्ता में रह चुकी सरकार ने कई बड़े क़ानून बनाए जिसमें सूचना का अधिकार, भोजन और शिक्षा का अधिकार जैसे शामिल हैं लेकिन सरकार अर्थव्यवस्था की दिक़्क़तों और भ्रष्टाचार के मामलों से सही तरीक़े से नहीं निपट सकी और इसी कारण उसके अच्छे कामों पर पानी फिर गया.

घटती ताक़त

मनमोहन सिंह, जिनकी ताक़त लगातार क्षीण होती चली गई, के नेतृत्व में कांग्रेस एक बिना रीढ़ के जहाज़ की तरह दिखी. राहुल गांधी को कांग्रेस की प्रचार की कमान सौंपना भी बहुत देर से लिया गया फ़ैसला लग रहा है.

उधर दूसरी तरफ़, बीजेपी के नरेंद्र मोदी का ग्राफ़ लगातार बढ़ा ही है. हालिया चुनावों में बीजेपी ने पांच राज्यों में से तीन में सत्ता पाई है और दिल्ली में सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर सामने आई है.

राष्ट्रवाद और गुजरात की आर्थिक समृद्धि को पूरे देश में लागू करने के वादों के साथ मोदी के पक्ष में युवा लोगों की एक बड़ी संख्या दिखाई देती है. इसके बावजूद राजनीतिक दांव पेंच कह लीजिए या विडंबना कि मोदी बीजेपी के लिए आने वाले दिनों में लाभप्रद और हानिकारक दोनों साबित हो सकते हैं.

एक राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार नरेंद्र मोदी जैसे ध्रुवीकरण करने वाले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के बिना 2014 के चुनाव बीजेपी के लिए बहुत उम्मीदें नहीं जगा पाते.

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प्रभावशाली और चतुर नेता

यूं तो मोदी के समर्थक उन्हें प्रभावशाली और चतुर नेता बताते हैं लेकिन उनके आलोचक, जिनकी संख्या भी बहुत है, कहते हैं कि मोदी ने गुजरात में साल 2002 में मुस्लिम विरोधी दंगों को रोकने के लिए कुछ नहीं किया.

भारत में मुस्लिमों की आबादी कुल जनसंख्या का 13 प्रतिशत है और लगता नहीं है कि वो मोदी को वोट देने वाले हैं.

इस बीच भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ खड़ी हुई आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के चुनावों मे ज़बर्दस्त जीत दर्ज की है जो मोदी के लिए कुछ सीटों पर नुक़सानदेह साबित हो सकती है.

इसका यह अर्थ है कि लड़ाई कांटे की हो सकती है जिसमें बीजेपी को भी छोटे और क्षेत्रीय दलों का साथ लेना होगा और सरकार बनाने के लिए गठबंधन करना होगा.

और यह अभी कहा नहीं जा सकता कि क्षेत्रीय दल, जो मूल रुप से लोकप्रिय नेताओं द्वारा चलाए जाते हैं, मोदी को प्रधानमंत्री के रुप में क़बूल करेंगे या नहीं.

यह शायद इस बात पर निर्भर करेगा कि मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को कितनी सीटें मिलती हैं. इन सबके मद्देनज़र यह भारत के सबसे मज़ेदार चुनावों में से एक होने वाला है.

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