जाट आरक्षण पर बादल का आत्मसमर्पण क्यों?

पटियाला में एक सिख किसान इमेज कॉपीरइट AFP

चार मार्च, 2014 की तारीख़ पंजाब के इतिहास में सिख नेतृत्व के जाति आधारित राजनीति के आगे सबसे बड़े समर्पण के रूप में दर्ज होगी, जब राज्य की शिरोमणि अकाली दल के नेतृत्व वाली सरकार ने जाटों को पिछड़ी जाति घोषित कर दिया.

साल 1898 में कान सिंह नाभा ने अपने मशहूर पैम्फ़लेट 'हम हिंदू नहीं' में दावा किया था कि सिखों में जाति प्रथा नहीं है. अकाली नेतृत्व हमेशा से कहता रहा है कि सिखों में जाति प्रथा नहीं है हालांकि समाजशास्त्रियों ने अपने विभिन्न अध्ययनों में यह साबित किया है कि सिखों में जाति प्रथा एक वास्तविकता है.

लेकिन सिखों में जाति आधारित वर्गीकरण सैद्धांतिक रूप से हिंदुओं से अलग है. सिखों में ब्राह्मण जाति नहीं है. साल 1931 की जनगणना के अनुसार जाति आधारित समुदायों की मौजूदगी एक महत्वपूर्ण सामाजिक वास्तविकता थी.

सिखों की कुल आबादी में से दो तिहाई हिस्सा जाटों का है. जाट मूल रूप से किसान हैं, जो अपनी और अन्य लोगों की ज़मीन पर खेती करते हैं. पंजाब के ज़्यादातर जाट सिख हैं लेकिन जाटों का संबंध दूसरे धर्मों जैसे हिन्दू और इस्लाम से भी है.

अधिकांश मुस्लिम जाट पाकिस्तानी पंजाब में रहते हैं लेकिन कुछ भारत के हरियाणा और दूसरे राज्यों में भी रहते हैं. उसी तरह पंजाब के सारे जाट सिख नहीं हैं, फिरोज़पुर और होशियारपुर ज़िलों के कुछ हिस्सों में हिंदू जाट भी हैं.

(पढ़ेंः जाति के आधार पर आरक्षण को लेकर उठे सवाल)

'अधिकांश मुख्यमंत्री जाट रहे हैं'

इमेज कॉपीरइट

ऐतिहासिक रूप से जाटों ने अन्य लोगों के मन में अपनी जीवनशैली के कारण एक ख़ास तरह के विचारों को बढ़ावा दिया है.

उदाहरण के लिए 18वीं शताब्दी के महान पंजाबी कवि वारिस शाह ने जाटों की व्याख्या नासमजझ और गवार लोगों के तौर पर की थी लेकिन इसके साथ ही उन्होंने जाट लड़के और लड़की के प्रेम गीत - 'हीर' को भी लिखा.

कई जाने-माने ब्रितानी मानवविज्ञानियों ने जाट सिखों के अध्ययन से निष्कर्ष निकाला कि उनके बीच उच्च स्तर की गुटबंदी होती है जो परिवारों के बीच आपसी संवाद में भी दिखाई पड़ती है और जो राज्य की राजनीति तक जाती है. ये गुट सत्ता के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा करते हैं और निरंतर एकदूसरे से उलझते रहते हैं.

पंजाब में अधिकांश कृषि भूमि पर जाटों का नियंत्रण है और वे राज्य में हर जगह मौजूद हैं. अन्य जातिगत समुदाय जिनके पास अपनी ज़मीन है और कुछ हिस्सों में जिनका प्रभाव है उनमें सैनी, महतोन, राजपूत, लबाना (ओबीसी), कंबोज (ओबीसी) प्रमुख हैं.

वर्तमान समय में पंजाब की कुल आबादी में जाट 35 से 40 फ़ीसदी है और वे सबसे बड़े जाति आधारित समूह हैं. इसके बाद मज़हबी, बाल्मीकि, मसीह और चमार जातियां आती हैं.

इसी वजह से बीजेपी और बीएसपी को छोड़कर शेष सभी राजनीतिक दलों में जाटों का दबदबा है. पंजाब के अधिकांश मुख्यमंत्री जाट जाति से रहे हैं. साल 1966 के बाद से कुछ अपवाद भी रहे हैं: जैसे राम किशन, ज्ञानी ज़ैल सिंह (और शायद गुरमुख सिंह मुसाफ़िर).

जाट सिखों का प्रभुत्व गाँव की राजनीति से लेकर प्रदेश स्तर तक की राजनीति तक मौजूद है.

जाटों का सबसे ज़्यादा दबदबा सांस्कृतिक आधार पर दिखाई देता है. उदाहरण के लिए स्थानीय स्तर पर सबसे लोकप्रिय प्रेम गीत जिसे क़िस्सा कहा जाता है 'हीर' और 'मिर्ज़ा' का है. दोनों क़िस्सों में रोमांटिक युगल जाट जाति से संबंधित हैं.

अधिकांश पंजाबी गीत सीधे सादे और रोमांटिक लेकिन बहादुर जाट किरदारों के इर्द-गिर्द बुने होते हैं. एक अनुमान के मुताबिक़ कम से कम 30 से 40 फ़ीसदी पंजाबी गानों में जाटों का ज़िक्र होता है.

कई निजी वाहनों पर 'जाट पॉवर', 'पूत जाटां दे' और इस तरह की चीज़ें लिखी होती हैं. दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि राजनीति, संस्कृति और कृषि संबंधी मामलों में बिना किसी चुनौती और प्रतिस्पर्धा के जाटों का वर्चस्व बरक़रार है.

'जाट पिछड़े नहीं'

इमेज कॉपीरइट AP

पंजाबी पत्रिका 'लकीर' के एक सर्वेक्षण के अनुसार लेखकों का एक बड़ा हिस्सा जाट जाति से है. मैं इसमें जोड़ सकता हूँ कि ढेर सारी छोटी कहानियां और उपन्यास जाट किसानों से संबंधित है. इन मापदंडों के आधार पर जाटों को पिछड़ा नहीं कहा जा सकता है.

विदेशों में रहने वाले अधिकांश पंजाबी लोगों में जाटों की एक बड़ी संख्या है. औपनिवेशिक दौर में कहा जाता था कि जाट किसान, सैनिक या चालक, तीनों में से कोई भी काम कर सकता है.

लेकिन अब समय बदल गया है. हालांकि कुछ पहलू हैं जो जाटों के पिछड़े होने का समर्थन करते हैं. उदाहरण के तौर पर अन्य राज्यों में खेती करने वाले अधिकतर समुदायों को पिछड़ा माना गया है जैसे यादव, कुर्मी, वोकालिग्गा इत्यादि.

चूंकि जाट खेती करते हैं तो वर्ण व्यवस्था के आधार पर वे शूद्र की श्रेणी में आएंगे. पंजाब के बाहर नौ राज्यों में रहने वाले सभी जाटों को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पिछड़ा घोषित किया है. तो फिर पंजाबी जाटों को क्यों नहीं पिछड़ा माना गया?

यहां ये भी बताना ज़रूरी है कि जाट सिख हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और संभवतः राजस्थान में भी निवास करते हैं.

जाट आरक्षण की राजनीति

हालांकि हरियाणा समेत कई राज्यों की सरकारों ने समाजशास्त्रियों से परामर्श किया और कुछ स्थानों पर सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण किए गए. इस तरह का कोई सर्वेक्षण पंजाब में नहीं हुआ है.

कुछ परिवारों की ग़रीबी किसी जाति को पिछड़ा नहीं बनाती. पिछड़ापन साबित करने के लिए कुछ निश्चित महत्वपूर्ण मानक होने चाहिए. उदाहरण के तौर पर हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खाप पंचायतों की निरंतर मौजूदगी पिछड़ेपन का महत्वपूर्ण सूचक है.

यह काफ़ी रोचक है कि पंजाब के सिख जाटों का कोई जाति आधारित संगठन नहीं है, जिससे समझा जा सकता है कि पंजाब के जाट अपने हितों को पूरा करने के लिए दबाव समूह के रूप में काम नहीं कर रहे हैं. इसकी एक सीधी सी वजह है कि राजनीतिक सत्ता पर जाटों का ही नियंत्रण है.

इस समय जाटों को पिछड़ा घोषित करना पूरी तरह से उनके कुलीन वर्ग की ताक़त को प्रदर्शित करता है और यह फ़ैसला सिख नेतृत्व के अनुच्छेद 25 के ख़िलाफ़ संघर्ष करने के दावों को एक तमाशा क़रार देता है.

वास्तव में यह सत्ता की राजनीति है और यह फ़ैसला आगामी लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर लिया गया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जाटों को पिछड़ी जातियों में शामिल करने का लाभ कांग्रेस को न मिले.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार