क्या इन चुनावों में पकेगी मायावती की खिचड़ी?

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अंक-एक, दृश्य-तीन, स्थान-दिल्ली/इंदरपुरी झुग्गी कॉलोनी. मुख्य पात्र: मायावती.

बीरबल की खिचड़ी का एक पूर्व पाठ है. उसकी पूर्व कथा, जिसके बिना कभी न बनने वाली खिचड़ी का रहस्य नहीं खुलता.

यही पाठ खिचड़ी को सतही मुहावरेदारी से बाहर निकालता है. पूर्व कथा में एक युवक का ज़िक्र है जिस पर भ्रष्टाचार का आरोप था. सुनवाई हुई तो सज़ा के तौर पर उसे रात भर महल के तड़ाग में खड़ा रहना पड़ा.

दरबारियों को उम्मीद नहीं थी कि वो बचेगा, पर वो बच गया. अगली सुबह पता चला कि वह कभी महल के ऊपर जल रहा दीपक और कभी पानी में उसकी परछाईं देखता रहा था.

उसके मन में क्या था नहीं मालूम, पर इसी में रात कट गई. दरबारियों ने इसे भी एक पेशेवर अपराधी का भ्रष्टाचार माना. तर्क था कि उसने महल के दीये से गर्मी ली और कड़कड़ाती सर्दी झेल गया. रोशनी ने उसमें उम्मीद जगाए रखी जिसका वो हक़दार नहीं था.

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राजमहलों के अंत:पुरों के क्रूर जीवन और षडयंत्रों से वाक़िफ़ बीरबल ने खिचड़ी इसीलिए बनाई. ताकि एक युवक को अन्याय से बचाया जा सके.

मटका बांस की बल्ली के ऊपर, आंच नीचे. खिचड़ी न पकनी थी, न पकी.

गठबंधन की खिचड़ी

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ये कथा सही है या नहीं, बीरबल और उनके समकालीन जानें लेकिन इसका एक ज़्यादा सार्थक उत्तर-आधुनिक पाठ अब ज़रुर किया जा सकता है.

उम्मीद को लेकर, कि उम्मीद आपको रोशनी देगी, ऊर्जा देगी और शून्य- संभावना परिदृश्य को हक़ीक़त में बदल देगी. आज नहीं तो कल. जीवन के किसी क्षेत्र में, राजनीति में तो ख़ास तौर पर.

ताज़ा माहौल में गठबंधनों को खिचड़ी सरकार कहने में शायद ही किसी को गुरेज़ हो.

दोनों में समानताएं बेहिसाब. मटका प्रधानमंत्री का पद हो, नीचे जल रही आंच मतदाताओं की वास्तविकता हो, प्रतीक्षारत मजमा उम्मीद से बेदख़ल न होना चाहता हो और इसी उम्मीद से बंधे उम्मीदवार चूल्हे की लकड़ियां खिसकाते नज़र आते हों.

बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने इसी उम्मीद के सहारे अपना यहां तक का सफ़र तय किया है.

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दिल्ली में इंदरपुरी झुग्गी झोपड़ी कॉलोनी में स्कूल मास्टरनी से उस हैसियत तक कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी जन्मदिन पर उनके लिए फूल का गुलदस्ता लेकर जाती हों और भारतीय जनता पार्टी पिछले वक़्तों का हवाला देकर उन्हें अपनी ओर खींचने में लगी हो.

लोकतंत्र का चमत्कार

पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव मायावती को ‘लोकतंत्र का चमत्कार’ कहते थे और अर्थशास्त्री स्वामीनाथन अय्यर सर्वोच्च प्रशासनिक पद को लेकर कहते हैं कि अगर ऐसा हुआ तो बहनजी ‘एक बेहतरीन प्रधानमंत्री’ साबित होंगी.

मायावती के जीवनीकार अजय बोस एक क़िस्सा बयान करते हैं. मायावती भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाना चाहती थीं, आईएएस बनना चाहती थीं.

उसी दौरान कांशीराम उनके घर आए और कहा....छोड़ो ये सब. मैं तुम्हें इतना बड़ा नेता बना दूंगा कि आईएएस पंक्तिबद्ध होकर तुम्हारे सामने खड़े होंगे.

इस घटना के कुछ ही समय बाद मायावती संसद पहुंच गईं. सन् 1989 में.

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तीन बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं मायावती का संसद में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 21 सीटों का रहा है. ये पिछले चुनाव की बात है, जिसमें उन्हें 20 सीटें, 80 लोकसभा सीट वाले राज्य उत्तर प्रदेश से मिली थीं और एक मध्य प्रदेश से.

दिल्ली में किसी बड़ी भूमिका के लिए उन्हें ये प्रदर्शन बेहतर करना होगा. मायावती इस बार अपने दम पर अकेले चुनाव लड़ रही हैं और उन्होंने उम्मीद का दामन पकड़ रखा है.

सबसे बड़ी चुनौती

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सचाई ये है कि सन् 2012 में समाजवादी पार्टी से मात खाने के बाद उनकी स्थिति कमज़ोर हुई है पर वह ब्राह्मण सम्मेलनों और मुस्लिम आकांक्षाओं के दम पर इसे सुधारना चाहती हैं.

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की कथित लहर की चर्चा चाहे जितनी हो, मायावती ने अपनी ज़मीन एक इंच भी नहीं छोड़ी है.

मायावती भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं, मुलायम सिंह यादव से कहीं अधिक.

इसी से भाजपा के मन में संशय है कि कहीं मायावती राज्य से सबसे बड़ी सियासी जमात बन कर न उभरें. प्रधानमंत्री पद की चाबी उनके हाथ चली जाए और सारा खेल बिगड़ जाए.

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चुनाव के लिए प्रत्याशियों की घोषणा पहले ही कर चुकीं मायावती ने खेल की तैयारी पूरी कर ली है. उन्होंने 18 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं. ब्राह्मण उम्मीदवारों की संख्या भी लगभग इतनी ही है. बाक़ी में उनका आधार है ही.

कुंजी

संयोग से राज्य में मुस्लिम आबादी 17 प्रतिशत और ब्राह्मण 18 प्रतिशत हैं.

उम्मीद है कि बसपा को 25 से 30 सीटें मिल सकती हैं जो उसे संसद में तीसरा सबसे बड़ा राजनीतिक दल बना देंगी.

ममता बनर्जी और जयललिता की तरह ही मायावती के लिए भी भाजपा अछूत नहीं है. अगर कुंजी मायावती के हाथ गई तो यही तथ्य भाजपा के लिए संतोष का सबब हो सकता है. हालांकि मायावती के लिए ये ‘बेकार की बात’ है.

बसपा को आशा है कि सन 2009 में जिन 47 सीटों पर पार्टी दूसरे नंबर पर रही थी उनमें से कई उसकी झोली में आ सकती हैं.

भ्रष्टाचार और भोंडे ढंग से अपना जन्मदिन मनाने के आरोपों से घिरी रहने वाली पूर्व अध्यापिका की खिचड़ी इन चुनावों में शायद न पके लेकिन इससे न तो महल के दीये की ऊष्मा कम होती है, न चूल्हे की आंच.

उम्मीद जहां थी, वहां है.

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