अकेली औरतों की समस्याएं?

  • 7 मार्च 2014
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पिछले एक साल से भारत में औरतों पर हो रही हिंसा चर्चा का विषय रहीं. लेकिन इससे इतर हर रोज़ की जिंदगी में उन महिलाओं का सफ़र कैसा होता है जो या तो अविवाहित है, तलाक़शुदा या फिर विधवा. वे एक तरह से महिलाओं पर हो रही आम चर्चा की परिधि से थोड़ी अलग-थलग खड़ी हैं.

शहरों और गांवों की कहानियों की ज़मीन ऐसी औरतों के लिए अलग हो सकती हैं लेकिन अनुभव भी क्या अलग होते हैं?

2001 जनगणना के मुताबिक देश में ऐसी औरतों की संख्या लगभग चालीस लाख है पर इस बढ़ती हुई तादाद के सफर में क्या समय के साथ कुछ तब्दिलियां भी आ रही हैं?

विश्व महिला दिवस के दिन चर्चा इस बार इंडिया बोल के मंच पर इन्हीं औरतों के जीवन पर उठ रहे सवाल और उनके जवाब ढूंढने की जद्दोजहद पर होगी.

स्थितियां बदल जरूर रही है पर आज भी शहरों और गांवों में, पढ़ी या फिर अनपढ औरतों पर शादी का कितना दबाव होता है. क्या औरतों की पहचान उसकी काबिलियत से ज्यादा इस बात से होती है कि उसकी शादी ‘सही’ उम्र मे हुई या नहीं? क्या इस सदी में भी एक खास मानसिकता से औरतों को जूझना पड़ रहा है?

भारत में घरेलू हिंसा की दर पिछले दस सालों में दोगुना हो गई है लेकिन यहां तलाक की दर दुनिया में सबसे कम है. आखिर क्यों- क्या इस बात का दबाव महिलाओं पर ज्यादा है कि हर हाल में शादी को बचाया जाना चाहिए और तलाक ‘शरीफ औरतो’ का विकल्प नहीं होता है?

क्या इसकी वजह आर्थिक है या सामाजिक?

संपत्ति पर महिलाओं के अधिकार पर कानून हैं पर एक शोध के मुताबिक ज्यादातर महिलाएं इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं करती है. क्यों?

हर एक औरत के सफर में सवालों के कितने कटघरे हैं जिन्हे पार कर वे उस आजादी को महूसस कर पाएंगी जो केवल उसके औरत होने की शर्त मांगती है.

शनिवार, 8 मार्च, के इंडिया बोल कार्यक्रम में इसी मुद्दे पर चर्चा होगी

कार्यक्रम में शामिल होने के लिए हमें इन मुफ़्त नंबरों पर फ़ोन करें – 1800-11-7000 और 1800-102-7001.

आप हमें अपने टेलीफ़ोन नंबर bbchindi.indiabol@gmail.com पर भी भेज सकते हैं.

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