क्या राजनीति में सफल हो पाएंगे नंदन नीलेकणी ?

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वह बैंगलोर की आईटी का चेहरा थे. वह सफलता, संपत्ति, जानकारी और कॉर्पोरेट स्टाइल का प्रतीक थे. बहुत समय नहीं हुआ है जब उनका हर कदम मीडिया की हेडलाइन बन जाता था और उनके प्रशंसकों को भावुक बना देता था. लेकिन क्या नंदन नीलेकणी चुनावी राजनीति में भी वही प्रशंसा हासिल कर पाएंगे.

चुनाव मैदान में उतरने वाले नीलेकणी संभवतः कॉर्पोरेट भारत का सबसे बड़ा नाम हैं. वह 2014 के चुनावों में किस्मत आज़मा रहे गैर-पारंपरिक नेताओं या टेक्नोक्रेटों की सूची में शामिल हैं. दरअसल इस बार के चुनावों में विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले लोग जितनी तादाद में चुनावी जंग में शामिल हो रहे हैं उतने पहले कभी नहीं हुए.

बैंगलोर में इस वक्त चर्चा गरम है कि क्या नीलेकणी राजनीति के पुराने खिलाड़ी बीजेपी के अनंत कुमार को पटखनी दे पाएंगे. हालांकि इसका जवाब जल्द ही मिल जाएगा. लेकिन सवाल यह भी है कि क्या वह एक "ख़राब" पार्टी में अच्छे आदमी हैं? फ़िलहाल तो नीलेकणी को लगता है कि वह बाज़ार की एक और मांग को पूरा कर रहे हैं. लोगों की स्वच्छ प्रशासन की मांग को.

नीलेकणी ने बीबीसी हिंदी से कहा, "लोग जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अच्छा काम कर चुके स्वच्छ और सुयोग्य लोगों को चाहते हैं. वह स्थानीय उम्मीदवार चाहते हैं. यह एक मांग है और मैं एक स्थानीय उम्मीदवार हूं."

स्थानीय घोषणापत्र

यह पूछे जाने पर कि क्या टेक्नोक्रेट पारंपरिक नेताओं के मुकाबले लोगों को ज़्यादा सहजता से उपलब्ध होंगे"?

वह कहते हैं, "मेरा रिकॉर्ड बहुत साफ़ है. मैंने अब तक जो भी काम हाथ में लिए हैं उन्हें पूरा किया है. मैं लोगों के लिए व्यवस्थित ढंग से काम करूंगा."

नीलेकणी इंफ़ोसिस के सात संस्थापकों में से एक थे. यह कंपनी एक प्रसिद्ध ब्रांड बन गई क्योंकि इसने न सिर्फ़ नौकरियां पैदा की बल्कि भारतीयों को पैसा कमाने का रास्ता भी दिखाया. कंपनी के चेयरमैन के रूप में अपनी भूमिका ख़त्म होते ही उन्होंने आधार कार्ड उपलब्ध करवाने के लिए भारत सरकार के यूनीक आईडेंटिफ़िकेशन अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन, की भूमिका स्वीकार कर ली. यह पद केंद्रीय मंत्री के बराबर का था.

दक्षिण बैंगलोर लोकसभा सीट से नीलेकणी की उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा होना अभी बाकी है. कांग्रेस ने पिछले हफ़्ते ही कर्नाटक के लिए अपने उम्मीदवारो की पहली सूची जारी की है.

लेकिन नीलेकणी के कांग्रेस से चुनाव लड़ने के विचार से सब ख़ुश नहीं है. शहर के एक महिला कॉलेज में नीलेकणी जब अपने करियर के दौरान आई चुनौतियों और सबकों के बारे में बता रहे थे एक छात्रा ने सीधा सवाल पूछ लिया.

अगर वह स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में खड़े होते तो क्या उनके जीतने की संभावना बेहतर नहीं होती?

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नीलेकणी ने कहा, "भारतीय राजनीति में सिर्फ़ पार्टी की बदलाव ला सकती है. कांग्रेस पार्टी और मेरे सिद्धांत एक से हैं. मुझे पूरा विश्वास है कि कांग्रेस पार्टी के साथ मैं वह बदलाव ला सकूंगा जो ज़रूरी हैं."

दक्षिण बैंगलोर के लोगों तक पहुंचने की नीलेकणी की कोशिशें एक ज़ोरदार सोशल मीडिया प्रचार कही जा सकती हैं. इसके साथ ही उन्होंने क्षेत्र के हर व्यक्ति को सामान्य डाक के ज़रिए एक चिट्ठी भी भेजी है जिसमें उन्होंने बताया है कि उन्होंने क्या किया है और उन्हें क्या करना चाहिए.

वह कॉलेजों में जाकर विद्यार्थियों से मिल रहे हैं और स्टेज पर खड़े होकर या उतरकर सभी तरह के सवालों का जवाब दे रहे हैं, सभी तरह के कार्यक्रमों में शामिल हो रहे हैं.

अपने ब्लॉग पर वह क्षेत्र के लिए घोषणापत्र तैयार करने के लिए वह सुझाव मांग रहे हैं. इनमें से कुछ उकसाने वाले भी निकले हैं. ऑटोरिक्शा चालकों की समस्याओं से सहानुभूति जताने वाले विचार की आलोचना भी हुई है.

युवा मतदाता

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उनके प्रचार का मुख्य आधार इंफ़ोसिस के ज़रिए लाखों लोगों को रोज़गार उपलब्ध करवाना, मुख्यमंत्री एस एम कृष्णा के कार्यकाल के दौरान बैंगलोर एजेंडा टास्क फ़ोर्स (बीएटीएफ़) के चेयरमैन के रूप में बैंगलोर के लोगों के लिए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करवाना, और देश के 60 करोड़ लोगों को आधार कार्ड उपलब्ध करवाकर एक "भ्रष्टाचार-विरोधी शक्तिशाली मंच" तैयार करना शामिल है.

लेकिन क्या आधार कार्ड एक कमज़ोर मुद्दा नहीं है क्योंकि अब तक इसे लेकर संशय है कि क्या इसे गैस या राशन कार्ड के लिए सब्सिडी के सीधे कैश ट्रांस्फर के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है? ख़ासतौर पर सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद?

नीलेकणी को नहीं लगता कि कहीं किसी प्रकार का भ्रम है. वह यह भी नहीं मानते कि यह एक कमज़ोर मुद्दा है.

वह कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट ने बस यह कहा है कि किसी को भी किसी सुविधा से इसलिए इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि उसके पास आधार कार्ड नहीं है. यह एक अंतरिम आदेश है. आदेश अभी आना है. यह मामला अभी अदालत में है. लेकिन आधार भारत के इतिहास में बदलाव लाने वाला सबसे बड़ा अभियान है. यह विधेयक संसद में पेश किया जा चुका है."

तो क्या युवा मतदाता, ज़्यादातर जो स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं, प्रभावित हुए हैं?

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हबीबा कहती हैं, "हां यह बहुत प्रेरणादायक था. हम युवाओं के लिए यह बहुत प्रोस्ताहन देने वाला था. उन्होंने अपनी कहानी बताई जो बहुत प्रेरक थी."

कविता ने कहा, "उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने आधार कार्ड के लक्ष्यों को हासिल किया. यह बहुत प्रेरणादायक भाषण था."

लेकिन क्या वह सही उम्मीदवार हैं? इस पर छात्रों के छोटे से समूह में ही राय बंटी हुई है.

हबीबा ने कहा, "हो सकता है. अगर मुझे लगता है कि वह बैंगलोर और देश में सुधार लाएंगे तो मैं उन्हें वोट दूंगी."

ग्नानस्री कहती हैं, "हो सकता है. बदलाव लाने वाले कदमों के लिए, मैं उन्हें वोट दूंगी."

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