दिल्लीः विदेशियों को लुभा रहे हैं स्वाद के ठिकाने

  • 11 मार्च 2014
बत्तख की फार्मिंग इमेज कॉपीरइट

स्वादिष्ट और रुचिकर भोजन न मिले, तो अपना फ़ार्म खोलने का ख़्याल शायद ही किसी को आता होगा. मगर भारत में रहने वाले फ्रांसीसी मूल के रोजर लंगबोअर को जब मनचाहे भोजन और स्वाद के लिए भटकना पड़ा, तो उन्होंने अपना फार्म खोलने की ठान ली.

रोजर लंगबोअर को दिल्ली में अच्छे मासांहारी भोजन के लिए भटकना पड़ा, तो उन्होंने अपना ही 'ऐनिमल फ़ार्म' खोल लिया.

उन्होंने दूसरे देशों से पेकिंग बत्तख, गिनी मुर्गी और टर्की (एक प्रकार का पक्षी) आदि आयात कर अपना फ़ार्म शुरू किया. दिल्ली के पांच सितारा होटलों और कुछ ख़ास रेस्तरां को मांस की आपूर्ति करने लगे.

दो दशक पहले शुरू हुई इस पहल ने ऐसी शक्ल इख़्तियार की, जो दिल्ली में रहने वाले खाने-पीने के शौकीन विदेशियों के लिए महत्वपूर्ण ज़रिया बन गया.

बाज़ार

दिल्ली से बाहर कुछ किलोमीटर दूर दिल्ली-जयपुर हाईवे के नज़दीक स्थित इस फ़ार्म में सैंकड़ों की संख्या में बत्तख, मुर्गी और सुअर सहित कई जानवरों का पालन होता है.

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Image caption रोजर कार्बनिक जड़ी-बूटी और सब्ज़ियां उगाते हैं और उन्हें दिल्ली और आसपास के इलाक़ों में भेजते हैं.

फ़ार्म के हरे-भरे इलाकों से गुज़रते हुए आपको आवारा घूमते चूज़े और खरगोश मिल जाएंगे. इसके अलावा यहां टर्की, सुअर के बच्चे और बत्तख भी देखे जा सकते हैं.

जानवरों के अलावा इस फ़ार्म में बड़े पैमाने पर उन जैविक सब्जियों और विदेशी प्रजाति की असाधारण जड़ी बूटियों को उगाया जाता है जो भारत में मुश्किल से मिलती हैं. इनमें फ्लोरेंस की सौंफ़, रॉकेट लीफ़, सलाद पत्ते, सुगंधित अजवायन, पुदीना आदि शामिल हैं.

रोजर लांगबोअर के फ़ार्म से रोज अलग-अलग स्टोरों में मांस और सब्ज़ियों की आपूर्ति की जाती है.

वे कहते हैं, "दिल्ली में दूसरे देश से आए काफी लोग रहते हैं. इसलिए ये कारोबार खूब फल-फूल गया है."

उन्होंने आगे कहा, "लोग समझ गए हैं कि यदि उन्हें उनके स्वाद वाली सब्जियां और मांस चाहिए तो इसके लिए एक क़ीमत चुकानी पड़ेगी. ये काम अब इतना फैल गया है कि इसे अकेले संभालना अब मुश्किल हो रहा है."

महंगाई

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Image caption दिल्ली के आईएनए मार्केट में विदेशियों के उपलब्ध सास, सब्जियां और मीट अपेक्षाकृत महंगे हैं.

दिल्ली की बात करें, तो यहां चिकेन दो डॉलर प्रति किलो मिलता है लेकिन फ़ार्म के चिकेन के लिए आपको चार गुना ज़्यादा क़ीमत अदा करनी पड़ती है.

मुख्य दिल्ली के स्थानीय बाजार आईएनए मार्केट में जो मांस और सॉस उपलब्ध हैं, वे अपेक्षाकृत महंगे हैं.

आईएनए मार्केट में स्विस प्रजाति के कुकुरमुत्ते और स्मोक्ड सालमन (एक प्रकार की मछली) से लेकर शुद्ध ऑलिव ऑयल और योर्कशायर पुडिंग सब मिलता है.

लेकिन यहां पहुंचने के लिए संकरी गलियों से होकर गुज़रना पड़ता है. दूसरी तरफ़ लोगों को काफी भीड़ और बदबू का भी सामना करना पड़ता है.

गुणवत्ता

सवाल ये भी है कि क्या विदेशी उपभोक्ता उत्पादों की किस्मों और गुणवत्ता से खुश हैं?

इसाक नाईजीरिया से हैं. उन्होंने मार्केट से सालमन खरीदा है, लेकिन वे इसकी क्वालिटी से संतुष्ट नहीं हैं.

वे अपनी निराशा ज़ाहिर करते हुए कहते हैं, "हमारे देश में जिस किस्म की सब्ज़ियां और फ़ूड मिलते हैं वैसी सब्ज़ियां और फ़ूड यहां खरीदना हमें काफ़ी महंगा पड़ता है. हमें तो यहां के लोगों का स्थानीय खाना खाकर ही काम चलाना पड़ता है."

दक्षिण अफ्रीकी गेविन को अपने देश के ताज़े और स्थानीय उत्पादों की कमी खलती है. वे कहते हैं, "वे सुविधाएं, ताज़ा दूध, ताज़ा मीट ये सब यहां नहीं मिलता. यहां सब एकदम अलग है."

इंडोनेशिया के ट्रिओना इस बात से दुखी हैं कि जब अंतरराष्ट्रीय स्तर के व्यंजनों की बात आती है, तो दिल्ली जैसे बड़े शहर में बेहद कम विकल्प मौजूद हैं.

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Image caption विदेशी ग्राहकों को ध्यान में रखते हुए दिल्ली में छोटे छोटे स्टोर खुल गए हैं.

वे बताती हैं, "मैं काफ़ी देर से अच्छी झींगा मछली ढूंढ़ रही हूं. इसी तरह दूसरे प्रकार के सी-फ़ूड भी यहां बहुत कम मिलते हैं."

इन सबकी एक ही राय है और वो यह कि यह बाज़ार बेकार है.

भारत के दुकानदार

विदेशी भोजन से जुड़े उत्पाद के बाज़ार के लिए भारत में अच्छी-खासी संभावनाएं मौजूद हैं. इन संभावनाओं को देखते हुए स्थानीय स्तर पर कई स्टोर खुलते जा रहे हैं.

'ली मार्क' वैसे ही कई स्टोर में से एक है. यहां रोज़मर्रा के इस्तेमाल वाले तरह-तरह के उत्पाद उपलब्ध हैं.

पूरी दिल्ली में 'ली मार्क' के सात स्टोर हैं. इसका कारोबार लगभग एक अरब 50 करोड़ डॉलर तक पहुंच चुका है.

यहां आपको ख़ासतौर पर विदेशी खान-पान का सामान मिल जाएगा. इसमें देश-विदेश के सॉस, नूडल्स, पाश्ता और मसाले शामिल हैं.

भारत के स्थानीय आहार चावल और दालों सहित यहां विदेशी प्रसाधन के सामान, डिटर्जेंट और यहां तक कि टॉयलेट रॉल्स भी खरीदा जा सकता है.

अपने कोल्ड कट्स, चीज़, पाश्ता, ऑयल और सॉस के लिए यह शुरू-शुरू में 'ली मार्क' विदेशियों में काफी लोकप्रिय हुआ. अब यहां देशी शहरी ग्राहक भी खूब आने लगे हैं.

पुरानी पीढ़ी के विपरीत भारत की नई पीढ़ी तरह-तरह के खाने और स्वाद आज़माना पसंद करती है. इसलिए यहां युवा पीढ़ी के ग्राहक ज़्यादा दिखाई देते हैं.

'ली मार्क' के मालिक मिनी यादव कहते हैं, "मेरे स्टोर में बराबर की संख्या में भारतीय और विदेशी खरीददारी करने आते है. काफ़ी भारतीय विदेश भ्रमण करते हैं. इसलिए वे भारत जब वापस आते हैं, तो विदेशी खानपान का आनंद लेना चाहते हैं."

आयात की चुनौती

आयात किए हुए खाद्य-उत्पादों को बेचना आसान नहीं है. इस क्षेत्र के अनुभवी बताते हैं कि इन्हें संरक्षित रखना सबसे बड़ी समस्या होती है.

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Image caption पास्ता की खपत के हर साल 25-30 फीसदी बढ़ने की संभावना है.

आजकल फ़ूड आयात करने के लिए कई तरह के लाइसेंस लेने पड़ते हैं और सीमा पर जाँच से गुज़रना पड़ता है. इनमें समय और पैसे दोनों खर्च होते हैं.

यादव का कहना है कि प्रतिबंध संबंधी क़ानूनों के कारण उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. वे बताते हैं, "इससे आयातक इतने परेशान हैं कि हमारे चीज़ और मीट काउंटर आपको लगभग खाली ही मिलेंगे."

इन्हीं वजहों से भारत के खुदरा विक्रेता मांग करते आए हैं कि सरकार आयात कानूनों में थोड़ी ढील दे ताकि अधिक किस्मों का आयात किया सके.

चाहे विदेशी फ़ार्म, बिज़नेस हो या भारतीय, अंतरराष्ट्रीय स्वाद की खोज में आने वाले ग्राहकों के कारण वे फ़ायदे में हैं.

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