''मैंने सोचा था कि फिर जापान नहीं आऊंगा''

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आज से तीन साल पहले जापान का फ़ुकुशिमा परमाणु संयंत्र भूकंप के बाद आई सुनामी का शिकार हो गया था. इस दुर्घटना में हज़ारों लोगों की जान गई थी. भारत के भूपेंद्र सिंह उस दौरान जापान की राजधानी टोक्यो में थे.

बीबीसी ने उनसे जाना कि भूकंप के बाद हुए उस परमाणु संयंत्र में हुई दुर्घटना के दौरान क्या बीता उनके साथ.

फुकुशिमा मानव निर्मित त्रासदी थी: जांच समिति

उत्तर प्रदेश के मथुरा के रहने वाले भूपेंद्र 2011 में पहली बार जापान गए थे. आईआईटी दिल्ली से एमटेक करने के बाद उन्हें पहली नौकरी जापान की एक आईटी कंपनी में मिली.

भारत से जापान की राजधानी टोक्यो में जाते हुए भूपेंद्र को अंदाज़ा भी नहीं था कि तीन महीने बाद उन्हें एक बड़ी परमाणु दुर्घटना का सामना करना पड़ेगा.

'ट्रेनिंग का आख़िरी दिन'

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Image caption सुनामी के कारण फुकुशिमा दाइची परमाणु संयंत्र को नुकसान पहुंचा था.

भूपेंद्र 11 मार्च 2011 का वह दिन याद करते हुए कहते हैं,"यहाँ पर भूकंप के हल्के-फुल्के झटके आते रहते थे. मेरे साथ 16 और भारतीय थे. वे भी पहली बार जापान आए थे."

वे कहते हैं, "वो मेरी ट्रेनिंग का आख़िरी दिन था. दोपहर के लगभग तीन बजे थे कि अचानक भूकंप के तेज़ झटके आने लगे. हमें बहुत डर लग रहा था. ये झटके जापान में आने वाले सामान्य झटकों से ज़्यादा तेज़ थे."

टोक्यो फ़ुकुशिमा से लगभग 300 किमी दूर है. फ़ुकुशिमा में रिक्टर पैमाने पर नौ की तीव्रता वाला भूकंप आया था. इसका असर टोक्यो तक था, जहाँ रिक्टर पैमाने पर सात की तीव्रता का भूकंप आया था.

भूपेंद्र बताते हैं, "फ़ुकुशिमा दाइची परमाणु संयंत्र को नुकसान पहुंचा है, इस बारे में मुझसे पहले भारत में मौजूद मेरे परिवार को टीवी चैनलों से पता चल गया था. मेरे पास बार-बार उनके फ़ोन आ रहे थे."

तेज़ भूकंप के बाद उठी सुनामी के कारण फ़ुकुशिमा दाइची परमाणु संयंत्र को नुकसान पहुंचा था और रेडियोएक्टिव रिसाव शुरू हो गया था.

जापान की नेशनल पुलिस एजेंसी के अनुसार भूकंप और सुनामी के चलते 15850 लोग मारे गए थे.

उन्होंने बताया,"इसके बाद जापान सरकार ने सभी ट्रांसपोर्ट सेवाएं बंद कर दीं थीं. ऑफ़िस से मेरा घर सात किलोमीटर दूर था. मैं पैदल चलकर घर पहुंचा. रास्ते में हज़ारों लोग सड़कों पर मिले. सभी पैदल ही जा रहे थे. उस दिन कुछ लोगों ने ऑफ़िस में ही रात बिताई."

'सुरक्षित स्थान'

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Image caption परमाणु रिसाव की वजह से फुकुशिमा के आसपास का इलाक़ा खाली करवाया जा रहा था.

भूपेंद्र कहते हैं, "घर पहुँचने के बाद मैंने टीवी और ऑनलाइन पर फ़ुकुशिमा की तस्वीरें देखीं. तब मैं और मेरे साथी भारतीय थोड़ी बहुत ही जापानी भाषा जानते थे. हम सबने मिलकर और जानकारी जुटानी शुरू की. जितनी हमें जानकारी मिलती जा रही थी, उतना ही हमारा डर बढ़ता जा रहा था."

परमाणु रिसाव की वजह से फ़ुकुशिमा के आसपास का इलाक़ा खाली करवाया जा रहा था. और ऐसी ख़बरें मिल रहीं थीं कि परमाणु रिसाव का असर टोक्यो तक भी पहुँच सकता है. भारतीय दूतावास की वेबसाइट पर भी संदेश जारी कर कहा जा रहा था कि अगर आप टोक्यो छोड़कर जा सकते हैं तो किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँच जाएं.

भूपेंद्र कहते हैं, "फ़ुकुशिमा की स्थिति ख़राब हो रही थी. मेरे घर से भी बार-बार फ़ोन आ रहे थे. वो लोग कह रहे थे कि कुछ समय के लिए ही भारत वापस आ जाओ. वो लोग मुझसे भी ज़्यादा परेशान हो रहे थे. "

'कभी जापान नहीं'

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Image caption भूपेंद्र की अब शादी हो चुकी है और वो अपने परिवार के साथ जापान में ही बस गए हैं.

भूपेंद्र और उनके साथी कुछ दिनों के लिए जापान के ही ओसाका चले गए थे.

इस बीच परमाणु रिसाव की स्थिति नियंत्रण से बाहर होने लगी और हज़ारों लोगों के मरने की ख़बरें आने लगीं. उस दौरान भारत और दूसरे देशों की सरकारों ने अपने नागरिकों को वापस बुलाने के लिए विशेष विमान सेवाएं शुरू की थीं. उनमें से एक विमान से भूपेंद्र भारत आ गए.

वह बताते हैं, "भारत आते समय मैंने सोचा था कि बस एक बार सुरक्षित अपने देश पहुँच जाऊं तो फिर कभी जापान नहीं आऊँगा. जिस पल मैं अपने परिवार से मिला, उसे शब्दों में बयां करना मुमकिन नहीं है. इतनी बड़ी तबाही से बचकर घर आया था. माँ मेरे गले लगकर रो रही थीं. मुझे भी रोना आया, लेकिन रोता तो उन्हें चुप करना मुश्किल हो जाता."

इस घटना के एक महीने बाद तक रात को सोते समय उन्हें जापान की परमाणु दुर्घटना डराती थी.

वह कहते हैं, "मैं लगभग एक महीने बाद फिर जापान काम पर लौटा. क्या करें नौकरी है, मजबूरी होती है."

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