'वोट का क्या करें जब सब ही लुट गया'

रेहाना

दोपहर के एक बज रहे हैं और मुज़फ़्फ़रनगर के शाहपुर गाँव में दूर मस्जिद से अज़ान की आवाज़ आ रही है.

शाहपुर नगरपालिका से भीतर जाने वाली सड़क पर बच्चे कंचे खेल रहे हैं और कुछ पतंगबाज़ी में व्यस्त हैं.

एकाएक मेरे सामने मैदान सा दिखता है, जिसमें नीली प्लास्टिक के करीब 80 टेंट गड़े हैं.

पहला छोड़, मैं दूसरे वाले में दाखिल होता हूँ तो आँखें फटी की फटी रह जाती हैं.

क़रीब आठ वर्ग फुट जगह में एक चारपाई पड़ी है. उस पर तीन बच्चे सो रहे हैं, एक महिला कोने में मिट्टी के चूल्हे पर खाना बना रही है और दो जवान लड़कियां मुझे देख अपने चेहरे पर पर्दा डाल लेती हैं.

चुनाव और दर्द

बाहर निकलने की कोशिश करता हूँ तो खाना बनाने वाली महिला, जिनका नाम रेहाना है, रोक देती हैं.

कहती हैं, "कहीं आप मुआवज़ा लेकर तो नहीं आए हो? अगर लाए हो, तो अल्लाह आपको लंबी उम्र दे!"

बातचीत शुरू होती है छह महीने पहले हुए दंगे पर.

रेहाना को बस इतना याद है कि शाम के समय वे घर पर खाना पका रही थीं कि पड़ोस से आवाज़ आई कि एक भीड़ आ रही है, जल्दी भागो.

अपने बच्चों को किसी तरह लेकर खेतों में निकल गईं रेहाना और तन पर जो कपड़े थे उसी से एक महीने काम चलाया.

"चुनाव आ चुके हैं", याद दिलाया हमने.

जवाब मिलता है, "चुनाव और वोट का क्या करें जब सब कुछ लुट गया हमारा”.

उन्होंने बताया, "हमारी तो सुध किसी ने न ली. वोट तो हम बीसों साल से डालते आए थे, लेकिन जब मुसीबत फट पड़ी, तब कहाँ रहे हमारे नेता लोग. अगर यहाँ गाँव वाले भाईचारे में शरण नहीं देते, तो हमारा परिवार तो ख़त्म हो गया था समझिए".

विस्थापितों का दर्द

रेहाना की तरह लगभग ढाई सौ परिवार आज भी पांच किलोमीटर दूर स्थित अपने पुश्तैनी घरों को जाने के लिए तैयार नहीं हैं.

कुछ को मुआवज़ा मिल चुका है और कइयों को अब भी इसकी आस है.

हालांकि ज़िला प्रशासन का दावा है कि उन्होंने ऐतिहासिक तौर पर काम करते हुए ज़्यादा से ज़्यादा विस्थापितों को मदद पहुंचाई है.

ज़िलाधिकारी कौशलराज शर्मा के मुताबिक़, "मृतकों के आश्रितों को पहले ही मुआवज़ा और नौकरी दे दी गई थी. प्रशासन ने सामाजिक संगठनों के सहयोग से पीड़ितों को गाँव लौटने की अपील भी की है."

गणित

सितंबर, 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर और आसपास हुई सांप्रदायिक हिंसा में क़रीब 65 लोग मारे गए थे और दसियों हज़ार विस्थापित हुए थे, जिनमें ज़्यादातर मुसलमान थे.

राज्य और केंद्र सरकार की ओर से मुआवज़े की घोषणा हुई और नौकरियां दिए जाने की भी.

लेकिन अब भी त़करीबन 2,000 परिवार ऐसे हैं, जो पूरे इलाक़े में फैले हुए शरणार्थी शिविरों में अपना गुज़ारा कर रहे हैं.

इस बीच पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आम चुनाव का बिगुल भी बज चुका है.

10 अप्रैल, 2014 को इलाक़े की दस प्रतिष्ठित सीटों पर मतदान होना है. इनमें मुज़फ्फरनगर, शामली, सहारनपुर और बागपत की सीटें शामिल हैं.

लेकिन इस चुनाव में मुज़फ़्फ़रनगर और आसपास के इलाक़ों का मंज़र बदला हुआ है.

अहम बात यह भी है कि मुज़फ़्फ़रनगर संसदीय क्षेत्र से पिछले तीनों सांसद कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से रहे हैं, जो मुसलमान भी थे.

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