औंधे मुंह गिरकर भी खड़े होने वाले मुलायम के पास है सत्ता की चाबी?

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अंक-एक, दृश्य-चार, स्थान-सैफ़ई. मुख्य पात्र-मुलायम सिंह यादव, सह अभिनेता-अखिलेश.

कथा- नहुष के पुत्र ययाति की कहानी महाभारत और पुराणों में दो बार आई है. पहले, आदि पर्व में, संक्षेप में. बाद में, विस्तार के साथ, भागवत पुराण के 19वें अध्याय में.

ययाति की पत्नी असुरों के गुरू शुक्राचार्य की बेटी देवयानी थीं जिनकी बचपन की संगी शर्मिष्ठा उनके साथ ययाति के महल में चली आईं थीं. इस अति-परिचित और बहुपठित कथा का विस्तार छोड़ दें तो इतना काफ़ी होगा कि अतीव सुंदरी शर्मिष्ठा पर मोहित ययाति की शिकायत देवयानी ने शुक्राचार्य से की.

शुक्राचार्य ने उन्हें भरी जवानी जालपा होने का श्राप दे दिया और वो बूढ़े हो गए. शुक्राचार्य ने बड़ी मिन्नतों के बावजूद अपना श्राप वापस नहीं लिया लेकिन इतनी मोहलत ज़रूर दे दी कि वो चाहें तो अपने पुत्र पुरु से उसका यौवन ले सकते हैं.

क्षेपक- आगरा की एक जनसभा में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी ने मुलायम सिंह यादव को ‘बुढ़ऊ’ कह दिया. पचहत्तर साल के होने जा रहे मुलामय सिंह को ख़ुद को बुढ़ऊ कहा जाना अखर गया. प्रतिक्रिया फ़ौरन हुई और आगरा के प्रत्याशी और उनकी पत्नी को समाजवादी पार्टी से निकाल दिया गया.

उन्होंने बस इतना कहा था कि बुढ़ऊ को प्रधानमंत्री बनवाना है इसलिए मुझे वोट देना.

कैसे बनती है छवि

मूल कथा के अंत में ययाति स्वीकार करते हैं कि तीन लालसाओं का कोई अंत नहीं होता. हज़ार साल बाद भी नहीं. ये लालसाएं हैं- भोजन, सत्ता और शय्या-सुख.

इसका पश्चाताप नहीं हो सकता क्योंकि मानसिक अपराध केवल सज़ा से नहीं बदलता.

समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव न ययाति हैं, न हो सकते हैं. लेकिन उम्र को लेकर वो बहुत संवेदनशील लगते हैं. अपने पुत्र और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से वो कुछ मांगते नहीं पर अक्सर उन्हें सार्वजनिक रूप से डांटते रहते हैं.

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कहते हैं कि अखिलेश को ‘सर’ सुनने की आदत हो गई है जिससे पार्टी की छवि ख़राब हो रही है. वो चापलूसों से घिर गए हैं और इसका अंजाम अच्छा नहीं होगा.

इटावा ज़िले के गांव सैफ़ई के अखाड़ों से मुलायम सिंह ने सबसे बड़ा सबक़ यही सीखा है कि ‘गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में.’

बचपन के पहलवान ने बाद के राजनीतिक अखाड़े में भी साबित किया कि गिर पड़ने में कोई दिक़्क़त नहीं है. ऐसा होता रहता है. लेकिन जो मिट्टी झाड़कर खड़ा नहीं हो पाता, अंत में मिट्टी हो जाता है.

पिछले आम चुनाव में पार्टी अखाड़े में औंधे मुंह गिरी थी बावजूद इसके 22 सीट के साथ वो पंद्रहवीं लोकसभा में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बाद तीसरा सबसे बड़ा राजनीतिक दल थी.

मुलायम सिंह, ज़ाहिर है इस प्रदर्शन से संतुष्ट नहीं थे. वो ज़्यादा नहीं तो कम से कम 2004 वाला प्रदर्शन दोहराना चाहते थे. उस साल मुलायम सिंह यादव को 36 सीटें मिली थीं. 35 उत्तर प्रदेश से और एक उत्तराखंड से.

मुलायम सिंह और उनकी पार्टी पर आरोप कम नहीं हैं और आलोचनाओं से उनका चोली-दामन का साथ है. मुज़फ़्फ़रनगर दंगे, सैफ़ई महोत्सव, गुंडई, दबंगई के आरोप और सबसे ऊपर भाई-भतीजावाद.

हालत ये है कि साइकिल सवार मुख्यमंत्री ख़ुद मानते हैं कि चाचा-ताऊ मिलाकर उनके राज्य में साढ़े पांच मुख्यमंत्री हैं.

अपने दम पर पूर्ण बहुमत से बनी सरकार चलाने वाले अखिलेश अकेले मुख्यमंत्री होते तो शायद उनका प्रदर्शन बेहतर होता लेकिन बात केवल उत्तर प्रदेश की नहीं है, दिल्ली की भी है. और छवियां अकेले में कुछ नहीं होतीं. उनका असल स्वरूप हमेशा तुलनात्मक होता है.

आगे की राह के लिए मुलायम की छवि बड़ी होनी ही चाहिए इसलिए अखिलेश की छवि छोटी पड़े तब भी चलेगा.

कांग्रेस-सपा गठजोड़

'नेताजी' जिस तरह 2014 के नतीजे देखते हैं, उसमें बहुमत किसी को नहीं मिलेगा. उस स्थिति में कांग्रेस संभवत: उनके साथ खड़ी होगी क्योंकि पिछले आम चुनाव की तरह इस बार भी पार्टी ने कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के ख़िलाफ़ उम्मीदवार नहीं उतारने का फ़ैसला किया है.

अखिलेश यादव कई बार कह चुके हैं कि कांग्रेस के साथ उनका सहजीवन एक मिसाल है. बक़ौल उनके जब कांग्रेस पार्टी की स्थिति देश में सबसे ख़राब होगी तब भी समाजवादी पार्टी उसके साथ खड़ी होगी.

इस वाक्य का दूसरा हिस्सा अनकहा है. कि बाद में कांग्रेस भी उनकी पार्टी के साथ, उम्मीद है, वैसा ही व्यवहार करेगी.

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समाजवादी पार्टी को लगता है कि विधानसभा की तरह लोकसभा में भी इस बार पार्टी को ख़ूब सीटें मिलेंगी. इसके तर्क भी हैं. जैसे यह कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, अयोध्या की घटना से बड़ी घटना और अटल बिहारी वाजपेयी से बड़े व्यक्तित्व नहीं हो सकते.

पिछली बार राज्य की 80 में से 70 सीटें भारतीय जनता पार्टी और सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ गईं थीं. वे पूछते हैं कि भाजपा अगर सुधरी भी तो कितना सुधरेगी. वोट प्रतिशत के मामले में भी उत्तर प्रदेश का खेल बाक़ी देश के मुक़ाबले थोड़ा अलग है.

पिछले दो आम चुनाव ही देख लीजिए. सन् 2009 में समाजवादी पार्टी को सवा तेईस फ़ीसदी वोट और कुल 22 सीटें मिली थीं जबकि 2004 में मात्र तीन प्रतिशत ज़्यादा वोट उसे 13 और सीटें दे गए थे.

राज्य में कांग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़ने की फ़िलहाल कोई संभावना नहीं दिखती और ये उम्मीद तो बिल्कुल बेमानी है कि उसके वोट सीधे भाजपा या बहुजन समाज पार्टी को चले जाएंगे.

तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और संयुक्त मोर्चा सरकार में रक्षा मंत्री रहे मुलायम सिंह यादव को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तरह केंद्र और राज्य दोनों सरकारों का अनुभव है.

चौथी बार मुख्यमंत्री न बनने को मुलायम समर्थक उनका 'राजनीतिक त्याग' क़रार देते हैं ताकि मई के मध्य तक उनकी स्पष्ट उपलब्धता हो और सत्ता की चाभी उनके बगुलपंखी कुर्ते की जेब में रहे.

लालसा तो यही है. ययाति लालसा-मुक्त नहीं हुए तो सैफ़ई का पहलवान कैसे होगा?

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