इस बार चलेगा बिहार के नए चाणक्य का दांव?

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अंक-एक, दृश्य-पांच, स्थान-गांव बख़्तियारपुर, मगध. मुख्य पात्र-नीतीश कुमार.

प्रेम अकारण हो सकता है और जीवन भर रह सकता है. क्रोध और वितृष्णा अकारण नहीं होती और जीवन भर रहती है.

अपनी उन गहरी जड़ों के साथ जो अंदर ही अंदर फैलती चली जाती हैं. गो कि सतही दोनों नहीं होते- न प्रेम, न वितृष्णा लेकिन उनके होने की वजहें भिन्न होती हैं.

चाहे वह दक्षिण अफ्रीका में 1893 का पीटर मारित्ज़बर्ग रेलवे स्टेशन हो या मगध महाजनपद की कोसल के साथ अदावत. तय परिणति तक पहुंचना उनकी नियति है.

श्रीकांत वर्मा की दो कविताएं हैं, जिनमें से एक में वह कोसल को कोसते हैं, दूसरी में मगध को. कहते हैं, ‘कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता/कोसल में विचारों की कमी है' या फिर ये कि ‘यह वो मगध नहीं/ तुमने जिसे पढ़ा है/ किताबों में/ यह वो मगध है/ जिसे तुम/ गंवा चुके हो/ मेरी तरह.'

तो मगध नहीं बदला, ख़ुद को गंवा चुकने के बाद भी. बुद्ध के ढाई हज़ार बरस बाद वर्तमान पटना और गया वाले उसी इलाक़े में प्रेम और वितृष्णा का नया पाठ कविराज रामलखन सिंह ने पढ़ा. बिहार विभूति अनुग्रह नारायण सिन्हा के साथ.

मौक़ापरस्ती

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आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी तो चुनाव भी लड़ना चाहते थे पर कांग्रेस ने लोकसभा का टिकट नहीं दिया. कुछ साल ख़ामोश रहने के बाद कविराज ने कांग्रेस छोड़ दी और जनता पार्टी में चले गए.

सन् 1952 में, जब कविराज ने कांग्रेस पार्टी के टिकट के लिए पहली बार प्रयास किया था, उनका बेटा नीतीश एक साल का था. दूसरे प्रयास के समय, 1957 में, वह स्कूल जाने लगा था. लकड़ी की तख़्ती और खड़िया-मिट्टी की दवात लेकर.

वह ककहरा सीख रहा था. थोड़ा स्कूल में, उससे ज़्यादा घर में. दृढ़ प्रतिज्ञ और मेधावी नीतीश कुमार पर कुछ असर प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के नैकट्य का भी रहा हो तो आश्चर्य नहीं. बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में पढ़ाई तक उनके दिमाग़ की सांकलें खुलने लगी थीं. मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ते-पढ़ते उनका झुकाव सोशल इंजीनियरिंग की ओर होने लगा था.

तब तक वो अपने घर में और पड़ोसियों के लिए 'मुन्ना' ही थे पर 'सुशासन बाबू' बनने में उन्हें अधिक समय नहीं लगा.

पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने बिहार के मुख्यमंत्री पर लिखी अपनी किताब 'सिंगल मैन' में उनके इस कायांतरण को सहज-संभाव्य कहा है. जिसने अपना पाठ अनुग्रह बाबू, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया और कर्पूरी ठाकुर से पढ़ा हो, इसके अलावा और हो भी क्या सकता था.

नीतीश कुमार पर सबसे बड़ा आरोप अड़ियल और स्वार्थी होने का लगता है. कभी कभी मौक़ापरस्ती का भी.

कहा जाता है कि गायसल रेल हादसे के बाद उन्होंने रेल मंत्री का पद छोड़ दिया लेकिन गोधरा कांड के बाद भी वह भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार में बने रहे. दोनों घटनाएं उनके रेल मंत्री रहते हुए हुई थीं.

तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री और केंद्र में रेल, कृषि और परिवहन मंत्री रहे नीतीश कुमार को हर बार यह सफ़ाई देनी ही पड़ती है कि गोधरा के समय केंद्र में नरेंद्र मोदी की नहीं, अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, जो मोदी को 'राजधर्म' सिखा कर आए थे.

कांग्रेस को स्वीकार्य!

अड़ियल इतने हैं नीतीश कि बिहार के लिए विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग से टस से मस होने को तैयार नहीं होते. मोदी की मानें तो नीतीश की प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा की वजह से बिहार में दोनों दलों का गठबंधन टूटा.

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अड़ियल नीतीश मोदी को बर्दाश्त करने को कतई तैयार नहीं थे और जनता दल यूनाइटेड को भी अतंत: उनकी बात माननी पड़ी. राजनीतिक फ़िकरेबाज़ी में भी नीतीश कम नहीं हैं. चुटकी लेते हुए एक दिन उन्होंने अपना ज़्यादा अनुभवी होने का जुमला उछाल दिया तो चोट सही जगह लगी.

केंद्र और राज्य दोनों जगह व्यापक अनुभव की कमी पर मोदी ख़ेमा बौखला गया, हालांकि नीतीश ने उनका नाम नहीं लिया था.

बिहार की राजनीति के नए चाणक्य कहे जाने वाले नीतीश कुमार के लिए तात्कालिक और सबसे बड़ी चुनौती लोकसभा में अपनी पार्टी की बड़ी सदस्य संख्या सुनिश्चित करने की है. अब तक उन्होंने राज्य में हर चुनाव भारतीय जनता पार्टी के साथ लड़ा था और पहली बार दोनों आमने-सामने होंगे.

जनता दल यूनाइटेड के लिए राहत की बात यह है कि 40 सांसदों वाले बिहार में उसकी सीटों की संख्या और मत प्रतिशत हमेशा भाजपा से ज़्यादा रहा है और सन् 2004 से लगातार बढ़ता गया है.

अगर सन् 2010 के विधानसभा चुनावों को कोई संकेत माना जाए तो संभव है कि नीतीश क़रीब 25 फ़ीसदी वोटों के साथ 25 सीटें निकाल लें.

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किसी केंद्रीय महत्वाकांक्षा के लिए ऐसा परिणाम नीतीश की सबसे बड़ी आवश्यकता है. क्षेत्रीयता पर ज़ोर के इस दौर में बिहार का प्रधानमंत्री होने की संभावना भी सदस्य संख्या को थोड़ा ऊपर ठेल सकती है. चिन्नी दाढ़ी वाली मुस्कुराहट इस संभावना से आधा इंच और बढ़ जाती है.

यह कहकर कि वो बिहार की मिट्टी में दफ़न हो जाएंगे पर एनडीए में नहीं लौटेंगे, नीतीश ने कांग्रेस पार्टी के दरवाज़े अपनी ओर खुलने की संभावना बढ़ा ली है.

कांग्रेस पहले से संकेत देती रही है कि राज्यों के क्षत्रपों में उसे नीतीश सहज स्वीकार्य हो सकते हैं.

राजनीति में प्रेम अगर स्थायी भाव नहीं है तो वितृष्णा भी नहीं हो सकती. और अगर तृष्णा होगी तो कहीं पानी भी होगा.

एक शेर है- हस्बे मामूल बात में दम है, तिश्नगी जो न कराए कम है.

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