'किसानों पर भारी न पड़ जाए आचार संहिता'

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भारत के अलग-अलग इलाकों में हुई बेमौसम बरसात ने फसलों को तबाह कर दिया है, लेकिन चुनाव के इस माहौल में क्या किसानों की सुध लेने वाला कोई है? किसानों को नुकसान से उबारने के लिए क्या होनी चाहिए सरकार की रणनीति और किन दिक्कतों से जूझ रहे हैं किसान. इस मुद्दे पर बीबीसी हिंदी फेसबुक चैट में भाग लिया कृषि मामलों के जानकार देवेंद्र शर्मा ने. जानिए इस चैट में क्या बातें सामने आईं.

बेमौसम बारिश और ओले गिरने से बड़े पैमाने पर फसलें तबाह हो चुकी हैं. नुक़सान ख़ासा ज़्यादा हुआ है. इसके बावजूद अनाज के दामों में अभी बढ़ोतरी शायद ही हो, क्योंकि चुनाव के मौके पर कोई भी सरकार ऐसा नहीं चाहेगी.

हमारे पास अनाज का पर्याप्त स्टॉक है लिहाजा खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा.

मुझको लगता है कि सरकार को इसे 'कृषि आपातकाल' घोषित करना चाहिए. ऐसी आपदाओं के बाद सुनिश्चित हो कि फसलों का बीमा हो, जिस पर कोई प्रगति नहीं हो पाई है.

हर किसान के लिए फसल का बीमा होना चाहिए. उसके प्रीमियम का दो तिहाई हिस्सा सरकार चुकाए. अमरीका में यही होता है. दो राज्यों ने फसल को हुए नुक़सान के लिए 18,000 करोड़ रुपए मांगे हैं. इतने में तो सरकार प्रीमियम चुका सकती है.

साल 1979 से साल 1984 तक पायलट फसल बीमा योजना शुरू हुई थी जिसके अंतर्गत 6.32 लाख किसानों को फ़ायदा मिला. इसी तरह साल 1985 से लेकर साल 1999 तक व्यापक बीमा योजना लाई गई थी जिसमें 7.6 करोड़ किसान आए.

'सब्सिडी का सच'

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साल 1999 से साल 2011 तक राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना शुरू की गई जिसके अंतर्गत 1.7 करोड़ किसान आए. जिसके अलावा देश में मौसम आधारित फसल बीमा योजना भी शुरू की गई है लेकिन अब तक मौसम आधारित बीमा का खाका नहीं बनाया जा सका.

यह भी देखना होगा कि किसानों को तुरंत राहत मिले अन्यथा बहुत से किसान मनरेगा में मज़दूरी करने को बाध्य हो जाते हैं.

अक्सर कहा जाता है कि सरकार किसानोंकी मदद करती है, दरअसल क़र्ज़ का ऐलान सरकार हर बजट में करती है. इस बार 8 लाख करोड़ का प्रावधान है.

लेकिन सरकार ये नहीं बताती कि वह चार फ़ीसदी ब्याज पर है. सिर्फ़ छह फ़ीसदी क़र्ज़ किसानों को मिलता है, 94 फ़ीसदी एग्री बिज़नेस उद्योग को मिलता है. इससे लगता ऐसा है कि सरकार किसानों की मदद कर रही है जबकि यह एक बहुत बड़ा घोटाला है.

दिल्ली, चंडीगढ़ में फ़ार्म क्रेडिट लेने वालों की संख्या, झारखंड और बिहार से ज़्यादा है. यह किसानों के साथ धोखा है.

'आंकड़ों में गड़बड़ी'

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हमारे युवाओं को यह सिखाने की ज़रूरत है कि अच्छी खेती कैसे की जाए. देश में कृषि विश्वविद्यालयों की कमी नहीं हैं. लेकिन गांवों में जो लोग खेती कर रहे हैं वे इन विश्वविद्यालयों तक आकर प्रशिक्षण नहीं ले सकते.

साथ ही सरकार किसानों को मंडियां भी मुहैया कराए. पंजाब और हरियाणा के किसानों की संपन्नता की एक वजह यह भी है.

सरकारी दावे हैं कि देश में खेती का रकबाबढ़ता जा रहा है. वहीं रियल एस्टेट, एसईज़ेड का भी इलाक़ा बढ़ रहा है. ये दोनों चीजें कैसे संभव हैं? इसका मतलब है कि कहीं न कहीं आंकड़ों में गड़बड़ है. किसानों को ज़मीन बेचनी नहीं चाहिए. कुछ और पूरक तरीक़े सोचने चाहिए.

हाल ही में एक संस्था ने अध्ययन किया है कि साल 2007 से साल 2013 तक 3.2 करोड़ लोगों ने खेती छोड़ी और ये लोग शहरों में आए. उसी दौरान अर्थव्यवस्था धीमी पड़ी और 1.5 करोड़ लोग वापस चले गए.

सच ये है कि किसान अपने इलाक़े में शेर हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनकी ताक़त नहीं है. इस चुनाव में भी किसानों के अलावा सब की बात हो रही है. नेतृत्व की कमी है. उन्हें नेतृत्व पर सोचना होगा.

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