मोदी बनाम केजरीवालः काशी में जीत या मोक्ष?

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एक दिन पहले भारतीय जनता पार्टी ने अपने उम्मीदवारों की लंबी सूची जारी की जिसमें नरेंद्र मोदी के वाराणसी सीट से लड़ने की अटकलों पर विराम लग गया. पार्टी ने बाक़ायदा घोषणा कर दी कि मोदी वाराणसी से मैदान में होंगे.

(बनारस का खेल कितना तगड़ा?)

वाराणसी सीट बेहद दिलचस्प होने वाली है क्योंकि एक दिन बाद ही आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी नरेंद्र मोदी को टक्कर देने का एलान किया है.

बेंगलोर में एक रैली में उन्होंने इस बारे में घोषणा की. केजरीवाल ने वाराणसी से चुनाव लड़ने की बात तो कही, लेकिन ये भी जोड़ दिया कि यदि वहां की जनता उन्हें टिकट देती है तब वो लड़ेंगे. बहरहाल कितना दिलचस्प होगा इस सीट पर होने वाला चुनाव जहां एक पार्टी के प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार का सामना एक अन्य पार्टी के पीएम पद के अघोषित उम्मीदवार से हो रहा है.

बहुकोणीय संघर्ष

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इस सवाल पर उत्तर प्रदेश की राजनीति पर लंबे समय से नजर रखते आ रहे वरिष्ठ पत्रकार अतुल चंद्रा कहते हैं, "मुकाबला तो पूरी तरह से दिलचस्प होगा. क्योंकि केजरीवाल खुद में बहुत विवादास्पद हो गए हैं. वे दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे हैं और मोदी को चुनौती देने के लिए बनारस ये सोच कर आ रहे हैं कि वे दिल्ली का इतिहास यहाँ भी दोहरा पाएंगे."

(मोदी के खिलाफ चुनौती स्वीकारः केजरीवाल)

"हालांकि ये हो पाएगा कि नहीं, ये समय ही बताएगा. कांग्रेस अगर ठीक ठाक उम्मीदवार दे देती है तो मुकाबला रोचक हो जाएगा. एक बात और है कि कुछ ही दूरी पर आजमगढ़ की सीट से मुलायम सिंह यादव चुनाव लड़ेंगे इससे पूरा क्षेत्र ही रोचक हो गया है."

हालांकि मैदान में मोदी और केजरीवाल के अलावा समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी भी वाराणसी के चुनावी मैदान में हैं, और भी उम्मीदवार हैं और चुनावी संघर्ष बहुकोणीय दिखाई देता है. ज्यादातर उम्मीदवार भी वाराणसी के निवासी नहीं हैं जिन्हें अक्सर 'बाहरी' भी कहकर बुलाया जाता है.

इस पर अतुल चंद्रा का कहना है, "सपा के प्रत्याशी कैलाश चौरसिया मिर्ज़ापुर से हैं, सपा, बसपा, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, मुख्तार अंसारी, मुकाबला छह कोणीय तो साफ़ दिखाई देता है. देखना ये है कि केजरीवाल नुकसान किसको पहुँचाते हैं, नरेंद्र मोदी को या कांग्रेस को."

वाराणसी का महत्व

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और जहां तक सपा या बसपा के उम्मीदवारों का सवाल है तो अतुल चंद्रा का कहना है कि सपा के उम्मीदवार चौरसिया मिर्ज़ापुर से विधायक हैं और राज्य सरकार में मंत्री भी हैं लेकिन मोदी के सामने कमज़ोर हैं. बसपा के उम्मीदवार का हाल भी कुछ ऐसा ही है.

(मोदी की वाराणसी से उम्मीदवारी पर लगी मुहर)

अतुल चंद्रा कहते हैं, "बसपा के प्रत्याशी वीपी जायसवाल भी बनारस के लिए एक तरह से अजनबी हैं. हालांकि ये सुना जा रहा है कि कि बसपा अपना उम्मीदवार बदल भी सकती है. लेकिन इस बारे में अभी पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है."

दूसरी ओर वाराणसी से नरेंद्र मोदी के प्रत्याशी बनाए जाने के बाद भाजपा के कार्यकर्ताओं में एक नया जोश नज़र आ रहा है. धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से वाराणसी का महत्व तो है ही, ये शहर एक ख़ास अंदाज़ के लिए भी जाना जाता है. तो नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी को लेकर एक आम बनारसी क्या सोचता है?

राष्ट्रीय राजनीति

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इस बारे में वरिष्ठ साहित्यकार काशीनाथ सिंह कहते हैं, "70 के दशक के पंडित कमलापति त्रिपाठी के बाद नरेंद्र मोदी के रूप में बनारस को ऐसा कोई नेता मिला है जो इस नगर को राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय पहचान दे या इस नगर के विकास के लिए कुछ करे. त्रिपाठी कांग्रेस से थे. 1990 के बाद वाराणसी से ज्यादातर भाजपा के सांसद रहे हैं."

(मोदी, भाजपा और वाराणसी का त्रिकोण)

"लेकिन नगर का न कोई विकास हुआ है और न ही देश या विदेश में इसकी कोई छवि बन पाई है. बनारस बिहार और उत्तर प्रदेश का 'लाइन ऑफ़ कंट्रोल' है. एक केंद्र है जहाँ से बिहार भी प्रभावित होता है और उत्तर प्रदेश भी. बनारस की एक छवि है और इस छवि के नाम पर और राष्ट्रीय राजनीति में पहचान के लिए इस शहर में एक छटपटाहट रही है."

काशीनाथ सिंह कहते हैं, "मोदी बाहरी जरूर हैं लेकिन बनारस के लोगों को ये लग रहा है कि उनके आने से शहर का विकास होगा." लेकिन सवाल उठता है कि क्या खांटी बनारसी अंदाज वाले इस शहर के लोग मोदी को आत्मसात कर पाएंगे और खुद मोदी किस हद तक बनारस के लोगों से जुड़ पाएंगे.

मतों का ध्रुवीकारण

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इस पर वे कहते हैं, "इसमें एक चीज है कि बीजेपी का नेटवर्क दूसरी पार्टियों की तुलना में अधिक मजबूत है. काम करने वाले लोग ज्यादातर संघ के हैं. पिछले 40 सालों में ऐसी कोई शख्सियत बनारस लड़ने नहीं आई जिससे कहा जाए कि कांटे का मुकाबला होगा. केवल यहाँ धार्मिक और जातीय आधार पर ध्रुवीकरण होता था."

(मोदी और संघ में मतभेद?)

"मुझे लगता है कि बनारस के लोग इस बार धर्म और जाति को ठेंगा दिखाएगी. गंगा जिस तरह से मैली होती जा रही है, शहर जिस तरीके से जाम में फंसा हुआ है और लोगों को उम्मीद है कि इसी बहाने इस शहर का विकास तो होगा."

लेकिन जहाँ तक ध्रुवीकरण का सवाल है तो नरेंद्र मोदी की वजह से ही पूरे देश में ये आशंका जताई जा रही है कि ऐसा होगा और इसी ध्रुवीकरण के केंद्र बिंदु मोदी ही बनारस से चुनाव लड़ रहे हैं.

इस पर काशीनाथ सिंह कहते हैं, "मतों का ध्रुवीकरण तो होगा. इसमें दो राय नहीं है और इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर बीजेपी ने मोदी को बनारस भेजा है क्योंकि पूर्वांचल और पश्चिमी बिहार की स्थिति बहुत अच्छी नहीं रही है और मोदी यहाँ पार्टी के हालात सुधारने में प्रभावी हो सकते हैं."

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