कांग्रेस के नक़्शेक़दम पर मोदी की बीजेपी

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एक ज़माना था जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दावा करती थी कि वो व्यक्तिवाद नहीं मूल्यों पर विश्वास करती है. वो कहती थी कि वो कांग्रेस से अलग है क्योंकि उसमें आंतरिक लोकतंत्र है. एक हद तक ये बात ठीक भी थी.

अस्सी के दशक में कांग्रेस में पहले इंदिरा गांधी और फिर उनके पुत्र राजीव गांधी की बादशाहत थी. अगर पार्टी में कोई उनके ख़िलाफ़ बोलता था, तो वो बाहर कर दिया जाता था.

जबकि उसी दशक में भाजपा के पहले और दूसरे अध्यक्ष, क्रमश: अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी, अपना कार्यकाल पूरा करके अगले को कमान देकर कम से कम औपचारिक तौर पर पीछे हट गए थे.

तब भी भाजपा के नेताओं में मतभेद होते थे. लेकिन किसी को निकालना तो दूर पार्टी की बैठकों और फ़ैसलों से भी दूर नहीं रखा जाता था. इसके पीछे कोई साधु भाव नहीं बल्कि अलग-अलग गुटों का बराबर का वज़नदार होना था.

यूँ तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से उपजे भाजपा के पूर्व अवतार, भारतीय जनसंघ के नेताओं ने जनता पार्टी में शामिल होकर 1977 में पहली बार सत्ता का मज़ा ले लिया था. लेकिन अपने दम पर भाजपा सत्ता में पहली बार 1990-91 में आई जब चुनाव जीतने के बाद उसने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में सरकारें बनाईं. वहीं से उसका कांग्रेसीकरण शुरू हो गया.

भाजपा में गुटबाज़ी

भाजपा में मारकाट की राजनीति पहले प्रादेशिक इकाइयों के स्तर पर शुरू हुई. उस वक़्त के मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा, राजस्थान के मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री शांता कुमार के विरोधी गुट झट से खड़े हो गए.

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उत्तर प्रदेश में तो एक नहीं कई गुट बन गए. हिंदुत्व और धर्म की राजनीति करने वाली पार्टी जाति के आधार पर बँटने लगी. जैसे कांग्रेस में कहीं के भी विरोधी गुटों की अलग-अलग डोर इंदिरा गांधी के हाथ ही होती थी ठीक वैसे ही इन राज्यों में भाजपा के विरोधी गुटों की अलग-अलग डोर भी आरएसएस के ही हाथ थी. उसके ही इशारे पर सुलह होती थी, और सुलह हो भी जाती थी.

भाजपा से बड़े नेताओं के निकाले जाने का दौर साल 1999 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के निष्कासन से शुरू हुआ. मध्य प्रदेश की धाकड़ पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को भी साल 2005 में बाहर किया गया. इन दोनों ने अपनी पार्टियाँ खड़ी कीं, लेकिन वो नाक़ामायाब रहीं.

पूर्व वित्त मंत्री जसवंत सिंह ने इससे सबक़ सीखा और जब पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना पर क़िताब लिखने के बाद उन्हें पार्टी से निकाला गया, तो उन्होंने इंतज़ार किया जिससे कुछ साल में उनकी घर वापसी हो पाई. कल्याण सिंह ने दोबारा पार्टी छोड़ी थी पर वो एक बार फिर भाजपा लौट आए हैं.

मोदी से टकराने की क़ीमत

गुटबाज़ी और निष्कासनों में कांग्रेस की हमशक्ल हो जाने के बावजूद भाजपा फिर भी एक लक्षण में कांग्रेस से अलग दिखती थी. 34 साल की उम्र में अब तक भाजपा पर किसी एक व्यक्ति का एकाधिपत्य नहीं हो पाया था.

लेकिन अब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की भाजपा पर बादशाहत क़ायम हो चुकी है और भाजपा का कांग्रेसीकरण संपूर्ण हो चुका है.

आडवाणी या जसवंत सिंह सरीखे नेता को मनचाहा टिकट न मिल पाए और इस पर कोई बातचीत तक न हो सके ऐसा पहले भाजपा में सोचा नहीं जा सकता था. लेकिन अब भाजपा का मतलब है मोदी और सिर्फ़ मोदी. जो मोदी से टकराएगा वो चूर-चूर हो जाएगा.

विडंबना यह है कि भारत को कांग्रेस मुक्त कराने का सार्वजनिक तौर पर बीड़ा उठाने वाले व्यक्ति ने ही भाजपा को कांग्रेसी बना दिया है. अगर मोदी पुराने भाजपाई होते तो वो जसवंत सिंह को राजस्थान के बाड़मेर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने देते.

तीसरे लोकसभा चुनाव से बाड़मेर कांग्रेस के हाथ रहा है. तबसे कांग्रेस वहाँ सिर्फ़ तीन बार हारी है.

दिग्गज धराशायी

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राजस्थान में भाजपा ने अपनी पकड़ 1989 के लोकसभा चुनाव से बनानी शुरू कर दी थी, लेकिन बाड़मेर हाथ न आया था. पहली बार वहाँ जसवंत के बेटे मानवेंद्र साल 2004 में बतौर भाजपा उम्मीदवार जीते. उन्होंने कांग्रेसी नेता कर्नल सोनाराम को हराया जो लगातार तीन बार वहाँ से सासंद थे.

2009 में हुए पिछले लोकसभा चुनाव में मानवेंद्र हारे थे लेकिन फिर भी लगभग तीन लाख वोट ले गए थे. वो हार भाजपा की ज़्यादा और मानवेंद्र की कम थी क्योंकि राजस्थान भर में भाजपा की बुरी हार हुई थी.

इस बार जसवंत सिंह जीत के दावेदार हो सकते थे क्योंकि दिसंबर के राजस्थान विधानसभा चुनाव में भाजपा की भारी-भरकम जीत हुई है और उसका असर लोकसभा चुनाव में ज़रूर पड़ सकता है. और क्या मोदी को प्रधानमंत्री बनने के लिए अधिक से अधिक सांसदों की ज़रूरत नहीं है?

फ़िलहाल मोदी मग्न हैं कि उनकी दादागिरी के सामने पार्टी के सभी दिग्गज धराशायी हैं. जो टूटे नहीं हैं वो झुक गए हैं.

मोदी के सच्चे सलाहकारों का अब फ़र्ज़ यह है कि वो मोदी को कांग्रेस की पूरी कहानी बताएँ. बताएँ कि किस तरह से व्यक्तिवाद ने कांग्रेस को कई राज्यों में सिफ़र बना दिया है जिसके चलते आज कांग्रेस महज़ वजूद बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है.

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