सागरनामा-2: गुजरात में राजनीति का मछली बाज़ार

गुजरात का जलजीव व्यापार

गुजरात भारत का अकेला राज्य है जिसके भूगोल को लेकर एक अजीब सा विवाद है.

सरकारी आँकड़े, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और गुजराती विद्वान इस बात पर एक राय नहीं है कि गुजरात का तटवर्ती क्षेत्र कितना लंबा है.

(सागरनामा-1: गुजरात जहां सड़कें हैं सड़कछाप)

सरकारी दस्तावेज़ों में यह 1248 किलोमीटर है जबकि लेखक चंद्रकांत बक्शी इसे 1640 किलोमीटर बताते हैं.

विज्ञान और उपग्रहों के दौर में यह विवाद होना नहीं चाहिए जहाँ एक-एक इंच ज़मीन को नापा जा सकता है.

कच्छ में लखपत से लेकर दक्षिण में कोलाक तक यह सीमा, ज़ाहिर है चार सौ किलोमीटर घट-बढ़ नहीं सकती.

जलजीव व्यापार

यह विवाद जहाँ हैं, हैं, लेकिन तटवर्ती लोगों, ख़ासकर मछुआरों और जलजीव व्यापार में लगे लोगों की समस्याओं पर कोई विवाद नहीं है.

(गुजरात का वाडिया)

वे क़रीब-क़रीब एक जैसी ही हैं. चाहे तट कच्छ या काठियावाड़ का हो या फिर सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात का.

सरकारी या ग़ैरसरकारी, कोई ठीक-ठीक नहीं जानता कि इस व्यापार में कुल कितने लोग लगे हैं.

एक अंदाज़ा इस बात से हो सकता है कि सवा लाख की आबादी वाले पोरबंदर में क़रीब 50 हज़ार लोग, जिस भी शक़्ल में हों, इस व्यापार से जुड़े हैं.

गाद निकालना

अपनी समस्याओं को लेकर उनके मन में क्षोभ है कि उनकी सुनवाई नहीं होती. हुक़ूमत किसी की भी हो, वे उनकी सियासत में फँस जाते हैं.

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गाद निकालना एक बड़ी समस्या है. न हटने पर बड़ी नावों का किनारे तक आना मुश्किल हो जाता है.

ट्रॉलर बनाने वाले नावों का आकार इसी हिसाब से छोटा करने लगते हैं कि मछुआरों की नाव और उनकी ज़िंदगी गाद में उलझकर न रह जाए.

पोरबंदर हो कि भरूच, सियासत के मारे मछुआरे कोशिश करते हैं कि चुप रह जाएं. उनकी ताक़त बहुत बड़ी है और विविधता उन्हें वोट बैंक होने नहीं देती.

क़दम-क़दम भ्रष्टाचार

पोरबंदर के तट पर गुजरात की दोनों बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के समर्थक थे, जो विरोध की भाषा नहीं बोलते.

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वे अपने पक्ष की तरफ़दारी ज़रूर करते हैं पर कोशिश रहती है कि आलोचना से बच जाएं.

आख़िर मछलियों को पानी से निकालने के बाद गंतव्य तक पहुँचाने के लिए जितनी सीढ़ियाँ तय करनी होती हैं, उनमें किसका हित कहाँ जुड़ा होगा पता नहीं चलता.

उसके लिए बड़े कंटेनर चाहिए, नमक और बर्फ़ चाहिए, दूसरे शहर यात्रा के लिए वाहन भी. हर क़दम पर भ्रष्टाचार है. कहीं छोटा, कहीं बड़ा.

कई बार बाहुबल

मसलन एक आम शिकायत यह है कि सरकारी लोग नावें चलाने के लिए दिए जाने वाले केरोसीन में धाँधली करते हैं.

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दस्तख़त 250 लीटर की पर्ची पर लेते हैं और तेल सिर्फ़ 100 लीटर देते हैं. नावों की तादाद इतनी है कि पार्किंग की समस्या खड़ी हो गई है.

उसके अलग से पैसे देने पड़ते हैं. और बात सिर्फ़ धन की ही नहीं रह जाती, कई बार बाहुबल तक आ जाती है.

कई बार पूछने पर एक मछुआरे ने क़रीब-क़रीब उलाहना देते हुए कहा कि हम करें क्या? मछली पकड़ें और किनारे लाकर उसे फिर समंदर में डाल दें?

इससे कम से कम उसका घर तो बचा ही रहेगा. हमारी फ़िक्र कौन करता है.

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