23 बार ज़मानत ज़ब्त पर प्रधानमंत्री बनने का भरोसा

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लगातार सात-आठ और यहाँ तक कि नौ बार चुनाव जीतने के क़िस्से भारतीय चुनावी इतिहास में कई मिलेंगे. फिर भी लगातार 23 बार हारने के बावजूद किसी उम्मीदवार का बार-बार चुनावी मैदान में उतरते रहने का उदाहरण बमुश्किल मिलेगा.

ओडिशा के बेरहामपुर शहर के निवासी के. श्याम बाबू सुबुद्धि ने अरसे तक चुनाव लड़ने का जो कीर्तिमान बनाया, उसकी मिसाल कम से कम भारत में दूसरी नहीं मिलेगी.

वैसे हरियाणा के काका जोगिंदर सिंह 'धरतीपकड़' और कर्नाटक के होत्ते पक्ष रंगास्वामी ने उनसे ज़्यादा चुनाव लड़े हैं.

लेकिन इन दोनों में से किसी ने सुबुद्धि की तरह लगातार 57 साल तक हर चुनाव नहीं लड़ा. चूँकि इन दोनों का अब निधन हो चुका है, इसलिए सुबुद्धि का कीर्तिमान तोड़ना अब असंभव है.

पेशे से होम्योपैथी डॉक्टर 78 साल के सुबुद्धि का चुनाव लड़ने के सिलसिला साल 1957 में शुरू हुआ, जो आज तक जारी है.

अब तक 23 चुनाव

अब तक वह निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में 13 बार लोकसभा और दस बार विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं और हर बार उनकी ज़मानत ज़ब्त हुई है. मगर इससे उनके चुनाव लड़ने का जुनून कम नहीं हुआ.

इस बार वह दो लोकसभा क्षेत्रों बेरहामपुर और अस्का से चुनाव लड़ रहे हैं. मज़े की बात यह है कि चुनावी मैदान में अपने पिछले रिकॉर्ड के बावज़ूद उन्हें पूरी उम्मीद है कि इस बार वह दोनों लोकसभा क्षेत्रों से जीतेंगे.

सुबुद्धि ने बीबीसी से कहा, "लोग राजनीतिक पार्टियों और नेताओं से तंग आ चुके हैं और परिवर्तन चाहते हैं. दल-बदलुओं के कारण इन पार्टियों से लोगों का विश्वास उठ गया है. इसलिए जनता ने इस बार मुझे दोनों ही सीटों से जिताने का मन बना लिया है."

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सुबुद्धि उनसे मिलने वाले हर आदमी को एक पर्चा देते हैं जो उनका परिचयपत्र भी है और चुनावी इश्तहार भी. इस कागज़ की मानें तो इस बार वह न केवल चुनाव जीतेंगे बल्कि उनके प्रधानमंत्री बनने की भी 'काफ़ी सम्भावना' है!

अपनी लंबे चुनावी सफ़र की शुरुआत को याद करते हुए सुबुद्धि बताते हैं कि बेरहामपुर में एक स्कूल की स्थापना को लेकर उनकी तत्कालीन मंत्री बृंदाबन नायक के साथ ठन गई, जिसके बाद उन्होंने पहली बार चुनावी अखाड़े में उतरने का निर्णय लिया.

1957 में हुए विधानसभा चुनाव में उन्होंने हिंजली विधानसभा क्षेत्र (जो साल 2000 से मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का चुनाव क्षेत्र रहा है) से चुनाव लड़ा और नायक से पराजित हुए.

व्यवस्था बदलने की सोच

इसके बाद सुबुद्धि ने मुड़कर पीछे नहीं देखा. 1957 के बाद से 1980 तक उन्होंने हर विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़ा और हर बार हारे.

1980 के बाद उन्होंने केवल लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया और आज तक वही करते आ रहे हैं. इस दौरान उनकी जिन राजनीतिक हस्तियों से भिड़ंत हुई, उनमें पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव (साल 1996) और पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक और जे बी पटनायक शामिल रहे हैं.

1980 के बाद विधानसभा चुनाव न लड़ने के अपने फ़ैसले के बारे में वे बताते हैं, "वह चुनाव मैंने इसलिए लड़ा क्योंकि मैं कुछ साबित करना चाहता था. मुख्यमंत्री बनने के बाद जानकी बल्लभ पटनायक ने बेगुनिया से उपचुनाव लड़ने घोषणा की, तो मैंने उनके ख़िलाफ़ लड़ने का निर्णय लिया. मैं साबित करना चाहता था कि 'पीछे के रास्ते' से विधानसभा में घुसने की प्रथा गणतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है. उस चुनाव के बाद मैंने तय किया कि अब मैं केवल लोकसभा चुनाव ही लड़ूंगा क्योंकि मुझे लगा कि अगर व्यवस्था बदलनी है तो पार्लियामेंट में जाना ज़रूरी है."

लेकिन अब वह क्यों चुनाव लड़ रहे हैं? इसके जवाब में वे कहते हैं, "मैं देश से भ्रष्टाचार समाप्त करना चाहता हूँ."

निर्दलीय उम्मीदवार होने के नाते अगर वह चुनाव जीत गए तो इस दिशा में क्या करेंगे? इसका भी उनके पास जवाब है, "मुझे पूरा विश्वास है कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक सशक्त क़ानून पारित कराने में मुझे पूरा समर्थन मिलेगा."

ख़ास चुनावी वादों पर भरोसा

मज़े की बात यह कि 78 साल की उम्र में दो चुनाव क्षेत्रों से लड़ रहे सुबुद्धि के दो प्रमुख चुनावी वादे हैं- 60 साल से अधिक उम्र के लोगों के चुनाव लड़ने और एक उम्मीदवार के दो या अधिक चुनाव क्षेत्रों से लड़ने पर प्रतिबंध लगाना.

इस विरोधाभास के बारे में सुबुद्धि कहते हैं, "हमारी पार्टियां और हमारे नेता तो ऐसा क़ानून कभी पारित नहीं करेंगे. इसके लिए मुझे संसद में जाना ही पड़ेगा."

सुबुद्धि का चुनाव प्रचार का तरीक़ा उनकी ही तरह अनोखा है. न कोई तामझाम, न बाजा-गाजा. बस इक्के-दुक्के राह चलते लोगों से बातचीत. कभी-कभार शहर के किसी कोने में एक मेगाफ़ोन लेकर भाषण. सुबुद्धि ज़्यादातर पैदल ही चलते हैं. कभी साइकिल तो कभी बैलगाड़ी पर.

इसके बावज़ूद चुनाव में पैसे तो ख़र्च होते ही होंगे. इस पर उन्होंने बताया, "हाँ, पैसे तो ख़र्च होंगे लेकिन मेरी प्रचार शैली इतनी महँगी नहीं इसलिए मैं दूसरों के मुक़ाबले काफ़ी कम पैसे ख़र्च करता हूँ. फिर भी दोनों लोकसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ने में क़रीब पांच लाख रुपए तो ख़र्च हो ही जाएंगे. वैसे इसका बड़ा हिस्सा मेरे चाहने वाले देते हैं."

पैसे की कमी नहीं

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एक मध्यम वर्ग के परिवार के लिए यह कोई छोटी रकम तो है नहीं. इसलिए स्वाभाविक ही मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या इस बात को लेकर सुबुद्धि के परिवार वालों को नाराज़गी नहीं होती होगी? इस बारे में सुबुद्धि की बहू रश्मिता कहतीं हैं, "बिल्कुल नहीं. क्योंकि वह हमसे एक पैसा नहीं मांगते. अपने ही पैसे ख़र्च करते हैं."

होम्योपैथी से होने वाली कमाई के अलावा सुबुद्धि पुश्तैनी संपत्ति के मालिक भी हैं. मगर पैसे की कमी कभी उनके चुनाव लड़ने के शौक के आड़े नहीं आई.

बेरहामपुर शहर में शायद ही कोई होगा, जो सुबुद्धि को न जानता हो. वैसे भी वह उनके निराले लिबास के चलते उनकी तरफ़ हर किसी की नज़र चली जाती है. वकीलों की तरह 12 महीने कोट, सिर पर टोपी और हाथ में एक बड़ा काला बैग जिसमें उनके तमाम दस्तावेज़ होते हैं.

ज़्यादातर लोग उन्हें ऐसी नज़र से देखते हैं जैसे चिड़ियाघर में पशुओं को देखते हैं, उन्हें पागल समझते हैं या फिर रिकॉर्ड का भूखा.

लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उन्हें काफ़ी गंभीरता से लेते हैं. ऐसे ही एक शख़्स हैं 72 साल के वेंकट बिहारी प्रहराज जो सुबुद्धि के राजनीतिक विचार और सूझबूझ की काफ़ी कद्र करते हैं.

वह कहते हैं, "सुबुद्धि जी काफी गुणवान आदमी हैं लेकिन समस्या यह है कि लोग आमतौर पर पार्टियों को वोट देते हैं किसी व्यक्ति को नहीं. "

लोग भले ही अपना वोट पार्टियों को देते हों लेकिन प्रहराज साफ़ कहते हैं कि वह अपना वोट सुबुद्धि को ही देंगे.

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