लालू-रामविलास की विरासतः मीसा और चिराग़ की रोशनी

मीसा भारती

सोलहवीं लोकसभा का चुनाव भारतीय राजनीति के लिए आश्चर्यजनक परिणाम देने वाला साबित हो सकता है.

लेकिन इसके साथ ही यह चुनाव बिहार में राजनीति के नए चेहरे गढ़ने वाला भी हो सकता है.

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद और लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के अध्यक्ष रामविलास पासवान अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते मालूम पड़ रहे हैं.

(बिहार के नए चाणक्य का दांव?)

लालू प्रसाद की डॉक्टर बिटिया मीसा भारती और रामविलास पासवान के स्टार लुक वाले पुत्र चिराग़ पासवान अपने-अपने पिता की राजनीतिक विरासत संभालने को मैदान में उतरे हैं.

दोनों पहली बार कोई चुनाव लड़ रहे है. दोनों की शुरुआत सीधे आम चुनाव से हैं. दोनों ही उम्मीद और आत्मविश्वास से भरे मालूम पड़ते हैं.

चुनाव में जीत के लिए दोनों के पास अपने-अपने पिता का नाम है और दोनों ही दुनिया के सबसे अधिक युवा मतदाता वाले देश भारत में युवाओं का भरोसा जीतने में सक्षम होने का दावा करते हैं.

मीसाः ऐसे पड़ा नाम

मीसा भारती को महिला होने का अतिरिक्त फ़ायदा मिल सकता है तो चिराग़ पासवान को भाजपा से गठबंधन और इसके प्रधानमंत्री प्रत्याशी नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से ताक़त मिलती दिख रही है.

मीसा और चिराग़ के व्यक्तित्व, प्रभाव और सोच के बारे में जानना बेहद दिलचस्प होगा.

मीसा राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के नौ बच्चों में सबसे बड़ी हैं. इनका जन्म आपातकाल के दौरान हुआ था.

(लालू की पत्नी और बेटी चुनाव मैदान में)

तब उनके पिता मेनटेनेंस ऑफ़ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (मीसा) के तहत जेल में बंद थे. वहीं बिटिया के जन्म की ख़बर मिली. पिता लालू प्रसाद ने पहली संतान की ख़बर जेल में बंद आंदोलनकारी साथियों से भी बांटी.

बात बिटिया के नाम रखने तक पहुंची और मीसा नाम पर आम सहमति बन गई. नाम मीसा रखा गया.

पहली मौजूदगी

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राजनीतिक माहौल में पली-बढ़ी मीसा पहले भी कई बार पिता लालू प्रसाद के अलग-अलग कार्यक्रमों में शिरकत कर चुकी हैं लेकिन राजनीति में पहली प्रत्यक्ष उपस्थिति मई, 2013 में परिवर्तन रैली के दौरान हुई.

माउंट कार्मेल स्कूल, पटना की छात्रा रहीं मीसा 38 साल की हैं. 16वीं लोकसभा में पाटलिपुत्र संसदीय क्षेत्र से राजद उम्मीदवार हैं. इसी संसदीय क्षेत्र के विक्रम में मीसा का ससुराल भी है.

भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम), लखनऊ से एमबीए कर चुके पति शैलेश समेत पार्टी के अन्य वरीय सदस्यों ने चुनाव की तैयारियों की ज़िम्मेवारी उठा रखी है.

(लालू कांग्रेस साथ साथ)

शैलेश कहते हैं कि मीसा में अद्वितीय नेतृत्व क्षमता है. उनका कहना है कि वह तो छह-सात लोगों के बीच ही असहज हो जाते हैं लेकिन मीसा तो हज़ारों की भीड़ से भी बड़ी आसानी से संवाद बना लेती हैं.

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राजनीति के महारथी लालू प्रसाद की बेटी होने का अपना नफ़ा-नुक़सान है. मीसा को पार्टी अध्यक्ष की बेटी होने से सीधे लोकसभा चुनाव का टिकट मिला तो उन्हें कड़े विरोध का सामना भी करना पड़ा.

उम्मीदवारी और विवाद

पिता लालू प्रसाद के क़रीब 30 वर्षों से सहयोगी रहे मीसा के मुंहबोले चाचा रामकृपाल यादव ने पार्टी छोड़ दी और भाजपा में जा मिले. मीसा नाराज़ चाचा को मनाने के लिए दिल्ली तक उनका पीछा किया लेकिन वो मिले नहीं.

मीसा कहती हैं कि चाचा ने कभी भी इस लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने की इच्छा नहीं जताई थी. उनका राज्यसभा में 20 महीने से अधिक का कार्यकाल शेष है. फिर मेरी उम्मीदवारी से ही नाराज़गी क्यों?

क्या चाचा यह कहने को तैयार हैं कि उनके परिवार का कोई सदस्य किसी चुनाव में हिस्सा नहीं लेगा. मीसा का राजनीतिक जीवन शुरू हो चुका है, इसलिए वह अपने विरोधी से सवाल करना भी सीख गई हैं.

मीसा का कहना है कि जो लोग उनकी उम्मीदवारी को वंशवाद के आईने से देख रहे हैं, वो भूल कर रहे हैं. उन्होंने कहा, "मेरी उम्मीदवारी सत्ता नहीं बल्कि पिताजी के संघर्ष और सेवा का वंशवाद है. इसे मैं जारी रखूंगी. मैं एक युवा महिला हूं.

(लालू के राजनीतिक समीकरण में 'सेंध की कोशिश')

मीसा ने कहा, "मेरे सारे प्रतिद्वंदियों का अनुभव ही उनकी कमज़ोरी है. क्षेत्र में रोज़ घूम रही हूं, लोगों से मिल रही हूं. अनुभवी और वरिष्ठ प्रतिद्वंदियों के काम की रिक्तता का आभास बड़ी आसानी से हो रहा है. क्षेत्र के लिए बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है. मैं करूंगी."

चिराग़: सिनेमा से सियासत में

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बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से कंप्यूटर इंजीनियरिंग में बीटेक चिराग़ पासवान बॉलीवुड में भी अपनी क़िस्मत आज़मा चुके हैं.

फ़िल्म 'मिले न मिले हम' में कंगना रानावत के साथ काम किया. फ़िल्म कोई ख़ास नहीं चली और चिराग़ राजनीति की तरफ़ बढ़ने लगे.

बिहार के महाराजगंज लोकसभा उपचुनाव-2013 में चिराग़ की पहली सक्रिय उपस्थिति ने बहुत कुछ साफ़ कर दिया था.

अब चिराग़ को लगने लगा था कि बॉलीवुड नहीं बल्कि राजनीति ही उनका कम्फ़र्ट ज़ोन है, असली रास्ता है.

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बिहार के जमुई(सुरक्षित) लोकसभा क्षेत्र से लोजपा उम्मीदवार चिराग़ का कहना है कि राजनीति उनकी रगों में बहती है.

(रामविलास पासवान को मोदी क़बूल)

बचपन से ही घर में अलग-अलग राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों से मिलते रहे है.

अब पार्टी के उम्मीदवार हुए तो दल पर वंशवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया.

चिराग़ कहते हैं अगर क़ाबिल हैं तो आप कहीं भी अपनी जगह बना सकते हैं. उपनाम के भरोसे आप एक हद तक ही जा सकते हैं.

उन्होंने कहा, "लोगों को मेरी योग्यता पर पूरा भरोसा है. मैंने तो ऐसे लोकसभा क्षेत्र का चयन किया है जिस पर पार्टी के किसी भी सदस्य की कभी कोई दावेदारी नहीं थी."

भाजपा-लोजपा के सेतु

आमतौर पर ऐसा कहा जाता है कि लोजपा और भाजपा के बीच समझौता कराने में चिराग़ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

पिता रामविलास पासवान शुरू में इस गठबंधन के लिए तैयार नहीं थे. उनकी अपनी वैचारिक सीमाएं थीं.

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लेकिन चिराग़ का मानना है कि मोदी के पास विज़न और युवा सोच है. इस मुद्दे पर पिता-पुत्र में कई बार बातें भी हुई.

(चिराग पासवानः यह पार्टी के अस्तित्व की लड़ाई है)

चिराग़ कहते हैं, "यह सही है कि गठबंधन को अंतिम रूप देने में मेरी महत्वपूर्ण भूमिका रही है, क्योंकि मोदी देश की समसामयिक ज़रूरत हैं."

पिता ने भी 'राष्ट्रहित और पार्टी हित' में भाजपा के साथ जाने पर सहमति दी है.

बॉलीवुड की ओर फिर से रुख़ करने की संभावना से इनकार करते हुए चिराग़ ने कहा है कि राजनीति बड़ी ज़िम्मेवारी भरा क्षेत्र है.

इसमें हॉफ़ टाइम या पार्ट टाइम की गुंजाइश नहीं. अभी तो प्रारंभिक राजनीतिक की ही शुरुआत हुई है. आगे बहुत कुछ करना है.

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