पूर्व भाजपाई, राहुल गांधी के 'साथी', अब नरेंद्र मोदी से टक्कर

  • 26 मार्च 2014
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गुजरात इन दिनों भारतीय राजनीति का सबसे अहम केंद्र बन चुका है. स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है जब भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस, भारत के दो बड़े राजनीतिक दलों के बड़े फ़ैसलों के पीछे गुजरात 'कनेक्शन' काम कर रहा है.

चौंकने की बात नहीं है, ये मौजूदा भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी यही हक़ीक़त है.

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं. उनके बढ़ते दबदबे के सामने पार्टी के दूसरे तमाम दिग्गज जैसे छोटे हो गए हैं.

वहीं कांग्रेस की कमान भले सोनिया गांधी और राहुल गांधी के हाथों में है, लेकिन इन दोनों के सबसे विश्वस्त सलाहकार बताए जाने वाले अहमद पटेल और मधुसूदन मिस्त्री गुजरात के ही हैं.

गुजरात कनेक्शन

अहमद पटेल सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव हैं और उनकी हैसियत कांग्रेस के तमाम मंत्रियों से भी ज्यादा की है. वहीं पिछले कुछ सालों में मधुसूदन मिस्त्री राहुल गांधी के सलाहकार के तौर पर देखे जाते हैं.

कांग्रेस पार्टी के अंदर उन्हें राहुल के आधिकारिक राजनीतिक सलाहकार के तौर पर देखा जाता है.

राहुल पर उनका भरोसा किस कदर मज़बूत है, यह मधुसूदन मिस्त्री के मिले दायित्वों से बखूबी समझा जा सकता है.

वे कांग्रेस पार्टी के महासचिव हैं. उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे बेहद अहम राज्य का प्रभार मिला हुआ है. इतना ही नहीं वे कांग्रेस पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति में शामिल हैं.

राहुल गांधी ने उन्हें 'वन मैन मिशन' के तौर पर पूरे देश में भर में लोकसभा उम्मीदवारों के चयन की जिम्मेदारी भी दी हुई थी.

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कभी इन्हीं मधुसूदन मिस्त्री पर बाहरी नेता होने का आरोप लगा, कभी उनकी एनजीओ टाइप झोलावाला कहकर खूब खिंचाई भी हुई.

लेकिन कुर्ता और चूड़ीदार पायजामे के साथ हमेशा कोल्हापुरी चप्पल पहनने वाले मिस्त्री ने तमाम आलोचनाओं के बीच कांग्रेस के अंदर धीरे-धीरे ही सही अपने काम के अंदाज़ से मज़बूत क़द बना लिया है.

संघ से पुराना नाता

हालांकि यह जानना दिलचस्प है कि मिस्त्री की राजनीतिक शुरुआत कांग्रेसी से नहीं हुई थी. कांग्रेस और मिस्त्री का नाता महज तेरह-चौदह साल पुराना है.

अहमदाबाद के कपड़ा मिल में काम करने वाले मज़दूरों के बीच अपना राजनीतिक जीवन शुरू करने वाले मिस्त्री 1995 तक भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुए थे. इस दौरान वे भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन नेता शंकर सिंह वाघेला के साथ मिलकर काम करते रहे थे.

जब शंकर सिंह वाघेला ने राष्ट्रीय जनता पार्टी बनाई तो मिस्त्री उनके साथ चले गए. वाघेला ने जब 2001 में अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया उसके बाद ही मिस्त्री कांग्रेसी बने. 2001 में ही उत्तर गुजरात के साबरकंठा से वे पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए.

जहां वाघेला गुजरात की राजनीति भी अपनी जगह ठीक से मज़बूत नहीं कर पा रहे हैं, वहीं मिस्त्री देखते ही देखते कांग्रेस के अंदर पावरफुल बनते चले गए.

इसकी सबसे बड़ी वजह क्या है?

कांग्रेस पार्टी के अंदरूनी मामलों पर नज़र रखने वाले लोगों के मुताबिक़ मधुसूदन मिस्त्री की अपनी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है. पार्टी नेतृत्व जो भी फ़ैसले करता है, उसमें अगर-मगर जोड़े बिना चुपचाप काम करना शुरू कर देते हैं.

मोदी को चुनौती

यह अंदाज़ मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव मैदान में उतरने के दौरान में क़ायम रहा. जब वहां के पहले से तय उम्मीदवार नरेंद्र रावत ने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया तो कहा जाता है कि राहुल गांधी ने उन्हें चुनाव मैदान में उतरने को कहा और मिस्त्री झटपट तैयार हो गए.

इतना ही नहीं मिस्त्री का दावा है कि वे वडोदरा में मोदी को हराकर दम लेंगे.

उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा भी है, "मैं अहमदाबाद से दिल्ली सिर्फ एक बैग के साथ आया था और पार्टी मुझे जाने को कहेगी तो मैं अपने बैग के साथ ही वापस लौटना चाहूंगा."

इसके अलावा मिस्त्री के काम करने का अंदाज़ भी एकदम अलग है. ग़ैर-सरकारी संगठन चलाने के अपने अनुभव के चलते वे हमेशा आम लोगों के बीच काम करते रहे.

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आम लोगों से सहज जुड़ाव के चलते ही वे कांग्रेस हाईकमान और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच सेतु बन गए. बताया जाता है कि यही बात राहुल गांधी को सबसे ज़्यादा पसंद आई.

मिस्त्री उत्तरी गुजरात में 'दिशा' नामक ग़ैर-सरकारी संगठन चलाते रहे हैं, जिसकी दलित और आदिवासी समुदाय के बीच अच्छी पैठ है.

इस ग़ैर-सरकारी संगठन के चलते ही मिस्त्री के गुजरात के अंदर ईसाई मिशनरियों से भी अच्छे तालुक़्क़ात रहे हैं.

राहुल के भरोसेमंद

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान मिस्त्री की तैयारी ऐसी थी कि उन्होंने एक-एक सीट के लिए चार-चार उम्मीदवार तय किए थे. कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस की जीत का सारा श्रेय उन्हें ही जाता है. उन्हें रणनीति और योजना बनाने में माहिर समझा जाने लगा.

लेकिन जब श्रेय लेने की बारी आई तो उन्होंने इसे राहुल गांधी की जीतबताया.

इसके बाद कांग्रेस पार्टी के अंदर उनका क़द तेज़ी से बढ़ा. वे उत्तरी गुजरात के साबरकंठा से दो बार लोकसभा के सांसद चुने गए. 2009 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद 2013 में कांग्रेस ने उन्हें राज्य सभा का सदस्य बनाया.

लेकिन इन सबके बाद भी मिस्त्री वडोदरा में मोदी को चुनौती दे पाएंगे इसमें संदेह है. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह तो यही है कि मिस्त्री का वडोदरा में अपना ख़ास प्रभाव नहीं है.

लेकिन मिस्त्री को वडोदरा से मोदी के सामने चुनाव मैदान में उतारकर कांग्रेस हाईकमान ने अपने दो लक्ष्य तो पूर कर ही लिए हैं. एक तो पार्टी ने साफ़ कर दिया कि वे मोदी के सामने एक मज़बूत उम्मीदवार उतार रहे हैं.

वहीं दूसरी राहुल गांधी ने बिना कहे अपने पार्टी के नेताओं को संकेत दे दिया है कि जब तमाम जिम्मेदारियों के बीच मिस्त्री चुनाव लड़ सकते हैं तो दूसरे नेता बहाना क्यों ढूंढ रहे हैं.

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