सागरनामा-5: दांडी, गांधी और स्मृतियां

भारत के आधुनिक इतिहास का सबसे चर्चित गाँव बेशक दांडी है. पिछले 85 बरस से दुनियाभर में उसकी एक ऐसी पहचान है, जो मिटना तो दूर कभी धूमिल भी नहीं पड़ी.

दांडी अब बदल गया है. लेकिन उसकी पहचान आज भी सन 1930 वाली है, जब महात्मा गाँधी ने उसके तट पर अंग्रेज़ों का बनाया नमक क़ानून तोड़ा था.

दांडी की शक्ल-सूरत बहुत बदल गई है, उसकी राहें पहले से जुदा हो गई हैं. शायद वह विकास की राह पर चल पड़ा है, जिसका झंडाबरदार गुजरात ख़ुद को मानता है.

बीस साल पहले एक कच्ची सड़क नवसारी को वहाँ से तक़रीबन बारह किलोमीटर दूर दांडी से जोड़ती थी. घुमावदार, सर्पीली और बीच-बीच में डामर वाली. कुछ हिस्से एकदम कच्चे. अब वह राष्ट्रीय राजमार्ग 228 है, संभवतः भारत का सबसे छोटा राजमार्ग.

सन 1995 में मैंने गाँधी के नक़्शे क़दम पर साबरमती आश्रम से दांडी की पैदल यात्रा की थी. दूरी लगभग 425 किलोमीटर. बाद में पता चला कि महात्मा गाँधी के बाद इस मार्ग पर पैदल यात्रा करने वाला मैं पहला भारतीय था. मुझसे पहले ऑस्ट्रेलिया के इतिहासकार थॉमस वेबर ने ये सफ़र तय किया था.

मुझे वेबर के अनुभवों का लाभ नहीं मिला क्योंकि उनकी किताब मेरी यात्रा के तीन साल बाद छपी. ग़रज़ ये कि मुझे सबकुछ ख़ुद तलाशना पड़ा.

ये यात्रा बीबीसी के लिए तैयार की जाने वाली एक रेडियो श्रृंखला के लिए थी, जिसका प्रसारण हर उस गाँव से रोज़ होता था जहाँ गाँधी रुके थे. बीबीसी हिंदी सेवा के पुराने श्रोताओं को शायद वो श्रृंखला याद हो क्योंकि स्मृतियाँ उस आसानी से नहीं मिटतीं, जिस आसानी से काग़ज़ पर लिखी इबारतें मिट जाती हैं.

Image caption बीबीसी के धारावाहिक हिस्ट्री ऑफ द वर्ल्ड से ली गई तस्वीर.

नक़्शे की त्रुटियां

दांडी कूच की पुरानी रिपोर्टों में मैंने कई जगह कहा था कि उस ऐतिहासिक यात्रा मार्ग का नक़्शा ग़लत है. अब वह थोड़ा और ग़लत हो गया है. तब मैंने इस बात का भी उल्लेख किया था कि सरकार द्वारा प्रकाशित 'कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ महात्मा गाँधी' में छपे दांडी कूच के नक़्शे में भी त्रुटियाँ हैं. आज तक उसमें सुधार नहीं हुआ बल्कि राष्ट्रीय राजमार्ग ने उसे कुछ और ग़लत कर दिया.

शायद सड़कें और पुल सहूलियत के हिसाब से बनाए जाते हैं, इतिहास से उनका ज़्यादा सरोकार नहीं होता.

दांडी कूच से जुड़ी एक और बड़ी ग़लती नमक उठाते हुए महात्मा गाँधी की तस्वीर को उस दिन का बताना है, जिस दिन उन्होंने नमक क़ानून तोड़ा था. सच्चाई ये है कि धोती लपेटे, चप्पल पहने गाँधी की वो तस्वीर दो या तीन दिन बाद की है और दांडी की नहीं है.

दांडी कूच के समय हिंदू-मुस्लिम विभेद की चर्चाएं आम होने लगी थीं. लेकिन उसी दौर में हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल विशाल सैफ़ी विला अब राष्ट्रीय धरोहर है और वहीं दांडी तट पर है. गाँधी नमक क़ानून तोड़ने इसी घर से गए थे.

यह अपने आलोचकों को गाँधी का जवाब था कि वे मुस्लिम गाँवों में नहीं जाते, नहीं ठहरते. ये भी कि वे हिंदू नेता हैं. अली भाइयों का क़िस्सा और गाँधी से उनकी ख़तो-किताबत तब तक आम हो चुकी थी.

दांडी कूच के पूरे रास्ते गाँधी ने इन आलोचनाओं का कोई जवाब नहीं दिया. सैफ़ी विला पहुँचकर उन्होंने कहा कि वे केवल उन्हीं गाँवों में गए, जिन्होंने उन्हें बुलाया. वे किसी के लिए मुसीबत खड़ा करना नहीं चाहते थे. किसी पर बोझ नहीं बनना चाहते थे.

सन 1995 में दांडी, गाँधी के 1930 के दांडी के मुक़ाबले विकसित गाँव बन चुका था. नए घर बन रहे थे. अब तो वहाँ हवेलियों जैसे बड़े-बड़े मकान हैं. एक क़तार से. दिक़्क़त ये है कि ज़्यादातर मकान घर नहीं हैं. उनमें कोई नहीं रहता. ताले पड़े हैं. लगता है लोग अपनी स्मृतियों को ताला लगाकर छोड़ गए हैं कि कभी लौटकर खोलेंगे और यादें लौट आएंगी. वहीं मिल जाएंगी.

बदलता हुआ दांडी

दांडी की कुल आबादी सरकारी आँकड़ों में 2800 है लेकिन वास्तविक आबादी आठ सौ भी नहीं है. दांडी के दो तिहाई से ज़्यादा लोग विदेश में रहते हैं. जाते समय शायद चाहते थे कि स्मृतियों के साथ गाँव भी ले जाएं पर ये मुमकिन नहीं था.

दांडी से छह किलोमीटर पहले का गाँव नानी पेथाण भी वहीं है, उसकी कहानी भी वही है. नानी पेथाण में पानी की टंकी है, सड़कें पक्की और साफ़-सुथरी हैं. बिजली का बंदोबस्त है, हर घर में पानी की पाइपलाइन है और 24 घंटा पानी आता है. ये सरकार ने नहीं किया, नानी पेथाण वाटर वर्क्स कमेटी ने किया है जिसका मुख्यालय लंदन में है. गाँव के लोग दशकों पहले वहाँ जाकर बस गए थे और केवल स्मृतियों से आगे निकलकर हक़ीक़त में अपने गाँव से जुड़े रहना चाहते थे.

इस बार दांडी जाने पर रास्ते में कराड़ी में अस्सी साल के मगन भाई मिले तो पता चला कि जैक भाई नहीं रहे. दक्षिण-अफ़्रीक़ा में गाँधी के मित्र और सहयोगी जैक भाई गाँधी से थोड़ा पहले भारत लौट आए थे और कराड़ी में बस गए थे. उसी कराड़ी में, जिसे गाँधी अपना स्थायी पता बताते थे.

कराड़ी में फूस और पत्तों की बनी बेहद साधारण झोपड़ी है, जहाँ गांधी नमक क़ानून तोड़ने के बाद और अपनी गिरफ़्तारी तक रहे. वो झोपड़ी अब भी है, बस पत्ते हर साल बदल दिए जाते हैं.

यहीं से आधी रात को गाँधी की गिरफ़्तारी हुई थी. फ्रंटियर मेल को दो स्टेशनों के बीच रोककर उन्हें उस पर चढ़ा दिया गया था. ये सब इसलिए कि गाँधी की गिरफ़्तारी की ख़बर लोगों तक पहुँचने से पहले उनको गुजरात से बाहर पहुँचा दिया जाए.

कराड़ी के जैक भाई की तरह कनु भाई भी नहीं रहे. मीठूबेन पेटिट पहले ही गुज़र गईं थीं. और नवसारी के महेश भाई कोठारी भी दो साल पहले चल बसे. लोग ऐसे ही चले जाते हैं. धीरे-धीरे.

दांडी कूच के समय गाँधी ने 11 नदियाँ पार की थीं. उनमें से दो नदियाँ भी हमारे बीच से चली गईं. पहले हमारी आँखों का पानी मरा, फिर नदियाँ मर गईं. उन पर अब रिहायशी बस्तियाँ बन गई हैं.

अगर विकास ऐसे ही नापा जाता हो और उसकी यही परिभाषा हो तो गुजरात में निश्चित तौर पर विकास हुआ है. देश के कई दूसरे हिस्सों की तरह. लेकिन ये पूछने का हक़ तो स्मृतियों को होना ही चाहिए कि क्या हम पहले अच्छे नहीं थे, जब नदियाँ हमारे साथ थी और आँखों में पानी था.

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