कांग्रेस को भारी पड़ रही है कॉरपोरेट इंडिया की 'नाराज़गी'

राहुल गांधी, सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह इमेज कॉपीरइट Reuters

भारत के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस के लिए चुनावी मैदान बेहद मुश्किल दिख रहा है. इस बात की संभावना काफ़ी अधिक है कि इस बार पार्टी का चुनावी आंकड़ा अब तक के सबसे निचले स्तर पर होगा.

ज़ाहिर तौर पर कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के दौरान हुई क़ीमतों में बढ़ोत्तरी, भ्रष्टाचार, घोटाले और विवाद चुनाव परिणामों के लिहाज़ से महत्वपूर्ण होंगे.

इस बारे में काफ़ी कुछ कहा और लिखा जा चुका है. हालांकि, कुछ दूसरे कारण भी हैं, जिन्हें वर्तमान राजनीतिक विमर्श में उचित जगह नहीं मिल सकी है.

इस सरकार के अच्छे कामों को उसके नकारात्मक कामों ने पूरी तरह से ढक दिया है.

भोजन का अधिकार या शिक्षा का अधिकार जैसे अधिकार आधारित क़ानूनों के ज़रिए लोगों के सशक्तिकरण के कांग्रेस पार्टी के एजेंडे को इस बार वैसी लोकप्रियता नहीं मिली जैसी साल 2009 के चुनावों में राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी क़ानून को मिली थी.

यह सही है कि कांग्रेस पार्टी ने यूपीए सरकार के अधिकार आधारित सशक्तिकरण के नज़रिए को अपना पूरा समर्थन दिया.

एक समावेशी समाज बनाने में इन फ़ैसलों की महत्वपूर्ण भूमिका लंबे समय तक रहेगी, लेकिन ज़ाहिर तौर पर सत्ताधारी पार्टी को अपनी प्रतिबद्धताओं पर डटे रहने की एक भारी क़ीमत चुकानी पड़ी है.

कॉरपोरेट दुनिया

इमेज कॉपीरइट AP

अधिकार आधारित क़ानूनों का कॉरपोरेट दुनिया ने ज़ोरदार ढंग से विरोध किया.

ज़्यादातर व्यापार और उद्योग संगठनों ने भोजन का अधिकार जैसी योजनाओं का विरोध किया.

उनका मानना था कि ऐसी योजनाएं न सिर्फ़ वित्तीय तौर से अव्यावहारिक हैं, बल्कि सरकारी ख़ज़ाना भी लंबे समय तक इनका भार नहीं उठा सकेगा.

इस वर्ग ने कहा कि ऐसी लोकलुभावन योजनाओं से सरकार पर निर्भरता की आदत बढ़ेगी और लोग काम नहीं करना चाहेंगे.

इसी तरह ज़मीन अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन क़ानून में उचित मुआवज़े और पारदर्शिता का अधिकार दिए जाने को भी कारोबारी प्रमुखों ने सही नहीं माना क्योंकि इससे नए उद्योगों की स्थापना के लिए ज़मीन ख़रीदना बेहद मुश्किल हो गया था.

इस क़ानून के बाद ज़मीन की क़ीमतें भी काफ़ी बढ़ गईं, जिसका कारोबार पर विपरीत असर पड़ा.

ऐसे में कॉरपोरेट दुनिया और सरकार के बीच संबंधों में तनाव आ गया.

हालात उस समय और भी बुरे हो गए जब सुप्रीम कोर्ट ने काफ़ी हद तक सरकार को फ़ैसले करने से रोक दिया.

मीडिया का रुख़

प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर आमतौर पर बड़े औद्योगिक घरानों का स्वामित्व और नियंत्रण है.

उन्होंने विपरीत भूमिका निभाने का फ़ैसला किया और सरकार की नकारात्मक बातों का प्रचार किया जबकि सकारात्मक बातों को कम महत्व दिया गया.

ऐसे नकारात्मक और उदासी भरे माहौल में नेहरू-गांधी परिवार के राहुल गांधी को आम चुनावों में पार्टी की अगुवाई करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई.

यह फ़ैसला काफ़ी देर से और ग़लत समय पर लिया गया.

राहुल गांधी ने सरकार में शामिल नहीं होने का फ़ैसला किया था और उन्होंने अपना समय पार्टी के संगठन को मज़बूत करने में लगाया.

वो पार्टी में अपने विज़न और एजेंडे को आक्रामक ढंग से आगे नहीं बढ़ा सके. उन्हें पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को नाराज़ किए बिना संतुलित तरीक़े से आगे बढ़ना था.

राहुल गांधी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को बढ़ावा देना चाहते हैं, लेकिन एक ऐसी पार्टी जो दशकों से हाई कमान वाले अंदाज़ में काम कर रही थी, उसमें पार्टी नेतृत्व का एक हिस्सा उनकी इन कोशिशों के पक्ष में नहीं था.

पार्टी के कामकाज को अधिक लोकतांत्रिक बनाने और पार्टी की निर्णय लेने की प्रकिया में अधिक लोगों के शामिल करने की कोशिशों के नतीजे देर से दिखेंगे, लेकिन इसने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के एक हिस्से में डर और आशंकाओं को तुरंत जन्म दे दिया.

महंगाई का असर

इमेज कॉपीरइट AP

इसमें कोई शक नहीं कि महंगाई और ख़ासतौर से खाद्य वस्तुओं की क़ीमतों में हुई बढ़ोतरी से न सिर्फ़ शहरी मध्य वर्ग को नाराज़ किया बल्कि समाज में हाशिए पर रहने वाले कांग्रेस के परंपरागत मतदाता का भी उससे मोहभंग हुआ है.

राष्ट्रमंडल खेल, कोल ब्लॉक आवंटन, टूजी स्पेक्ट्रम आवंटन और अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलिकॉप्टर सौदे जैसे घोटालों और विवादों के सामने आने और मीडिया में उन पर हुई चर्चा के चलते कांग्रेस विरोध का माहौल बना है.

यहां तक कि यूपीए के साझेदारों के भ्रष्टाचार और ग़लतियां भी कांग्रेस के खाते में शामिल हो गई हैं.

इन नकारात्मक छवियों का मुक़ाबला करने के लिए सरकार और मीडिया के पास कोई भी प्रभावशाली मीडिया रणनीति नहीं थी, जबकि अदालत और कैग जैसे संस्थानों ने इन मुद्दों को चर्चा में बनाए रखा.

सच्चाई यही है कि कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी एक नई राह नहीं खोज पाए. वो अपनी पार्टी और सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा नहीं ले पाए. ऐसे में उन्हें सरकार विरोधी भावना का सामना करना ही होगा.

उन्हें पार्टी और सरकार की सभी कमियों और ग़लतियों का बोझ अपने कंधे पर उठाना होगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार