तेंदुए का ख़ौफ़, तो चुनाव से तौबा

भारत नेपाल सीमा पर बसे लौकी कला गाँव के बच्चे

भारत-नेपाल सीमा पर बसे लौकी कला गाँव में अजब सा माहौल है.

झोपड़ी में बनी चाय की एक दुकान के भीतर गांव के छह लोग बैठे हैं. अवधी में चुनाव पर चर्चा हो रही है और बाहर बच्चे गुल्ली-डंडा खेल रहे हैं.

(घर में घुसा तेंदुआ)

लेकिन दुकान के मालिक के चेहरे पर मातम छाया हुआ है और उसे इस बहस में कोई दिलचस्पी नहीं है.

42 वर्षीय श्याम प्रकाश ने चार महीने पहले ही अपनी चार वर्षीय बेटी का अंतिम संस्कार किया है.

उनकी बेटी लीला देवी को घर के ठीक सामने से एक तेंदुआ उठा कर ले गया था और दो दिन बाद जंगल में उसके शव के कुछ हिस्से मिले थे.

श्याम प्रकाश ने बहुत आग्रह करने पर हमसे बात की.

छह बच्चों की मौत

Image caption श्याम ने चार महीने पहले चार साल की बच्ची का अंतिम संस्कार किया था.

उन्होंने कहा, "चुनाव की छोड़िए साहब, हम लोग दिन-रात तेंदुए के हमलों के साये में जी रहे हैं. अब मेरे तीन बच्चे बचे हैं, उन्हें मैं घर से बाहर नहीं जाने देता."

श्याम प्रकाश के अनुसार उनकी बेटी शाम छह बजे के आस-पास घर के दरवाज़े तक ही निकली थी कि पास खेत में घात लगाए तेंदुए ने उसे पकड़ लिया और जंगल की ओर ले गया.

(तेंदुए के डर से मेरठ में स्कूल बंद)

उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती-बलरामपुर ज़िलों के अंतर्गत आने वाले सुहेलदेव वन्य-जीव अभयारण्य में क़रीब 100 गांवों में पिछले छह महीने से ज़्यादा समय से तेंदुए का ख़ौफ़ छाया हुआ है.

भारत और नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र के इर्द-गिर्द लगभग 300 वर्ग मील वाले इस इलाक़े में क़रीब 75,000 लोग बसते हैं और यहाँ छह महीने के अंदर तेंदुए के हमले से छह बच्चों की मौत हो चुकी है और उतने ही गम्भीर रूप से घायल हुए हैं.

ज़िले के वन विभाग अधिकारी एसएस श्रीवास्तव के अनुसार पिछली गणना तक जंगल में दूसरे जानवरों के अलावा क़रीब 70 तेंदुए मौजूद थे.

चुनाव का बहिष्कार

उन्होंने बताया, "हमने एक तेंदुए को पकड़ा भी था क्योंकि उसने दो दिन के भीतर ही दो बच्चों पर जानलेवा हमला किया था. उसे कानपुर के चिड़ियाघर में भेज दिया गया है. लेकिन ये सही है कि हमले रुके नहीं हैं."

(क्यों तेंदुओं से परेशान हैं लोग?)

इलाक़े के लोगों में सरकार की कथित नाकामी को लेकर रोष है और इसीलिए हज़ारों गाँव वालों ने आगामी संसदीय चुनाव के बहिष्कार का निर्णय लिया है.

लौकी कला से सटे एक दूसरे गाँव की रहने वाली भैरवी देवी इन दिनों अपने पांच-वर्षीय पोते को गोद से उतारने में डरतीं हैं.

उन्होंने बताया, "मेरा पोता इसलिए बच पाया क्योंकि जैसे ही एक शाम तेंदुए ने इस पर हमला किया आस-पास के लोगों ने शोर मचाना शुरू कर दिया. तेंदुआ तुरंत जंगल की तरफ भाग गया. मेरे इलाक़े में कम से कम 50 गांवों में बिजली का नामोनिशान नहीं है. इसीलिए हमले बढ़ते जा रहे हैं. नेता लोग आते हैं, वादे करते हैं और चले जाते हैं. लेकिन हम अब वोट नहीं देंगे."

बड़ा चुनावी मुद्दा

इलाक़े में गाँव वाले इस बात से भी डरते हैं कि अगर उन्होंने किसी तेंदुए और दूसरे जानवर को मारने या पकड़ने की कोशिश भी की तो उन पर जुर्माना हो सकता है और सज़ा भी हो सकती है.

रोष इस बात पर भी है कि अधिकारी और नेता कार्रवाई और मुआवज़े का वादा करने के बाद भी उसे पूरा नहीं करते.

(देखा है हिम तेंदुओं को...)

श्रावस्ती-बलरामपुर संसदीय चुनाव क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या क़रीब 15 लाख है.

इस बार एक आम चुनाव में हिस्सा ले रहे ज़्यादातर उम्मीदवार इस बात से वाक़िफ़ हैं कि तेंदुए के बढ़ते हमले एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुका है.

52 वर्षीय रिज़वान ज़हीर इलाक़े से दो बार सांसद रह चुके हैं और इस बार भी मैदान में हैं.

उन्होंने कहा, "यकीनन, तेंदुए के हमले बढे हैं और हज़ारों लोग इससे प्रभावित हो रहे हैं. बिजली और सड़क की खस्ता हालत के बीच इस तरह के मामले बढ़ने ही वाले हैं. हम लोगों ने इससे निजात पाने का वादा किया है अगर हम चुने गए तो."

सुविधाओं का अभाव

सरकारी आंकड़ों के अनुसार इसी इलाक़े में वर्ष 2001-2003 के बीच जंगली भेड़ियों के हमलों में क़रीब 100 बच्चों की जाने पहले ही जा चुकी हैं.

(पकड़ा गया 'आदमखोर' तेंदुआ)

इस क्षेत्र से लगभग एक घंटे की दूरी पर बलरामपुर शहर के निवासियों को भी गाँव वालों के कष्ट का आभास है.

लेकिन साथ ही वे भगवान का धन्यवाद भी देते हैं कि शहर के इलाक़ों में तेंदुए के हमले कम ही होते हैं.

इस इलाक़े में मूलभूत सुविधाओं और ढाँचे का अभाव इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि नेपाल की सीमा इलाक़े से सटी है.

अपनी बात ख़त्म करने से पहले ज़िले के वन विभाग अधिकारी एसएस श्रीवास्तव ने कहा, "ये ख़तरनाक तो है ही. हम क्या, कोई भी नहीं चाहता कि एक दशक पहले भेड़िए के हमलों वाली कहानी फिर से दोहराई जाए."

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