सियासी मैदान में 'नामों की जादूगरी'

  • 31 मार्च 2014
भारतीय राजनीतिक दल का नाम इमेज कॉपीरइट

अप्रैल में होने वाले 16वें आम चुनाव में 81 करोड़ 40 लाख मतदाता हिस्सा लेने वाले हैं. इसके लिए अब तक करीब 1,600 राजनीतिक पार्टियां अपना पंजीकरण करवा चुकी हैं. इनमें से कुछ पार्टियों के नाम बेहद दिलचस्प और मज़ेदार हैं.

बी कुमार श्री श्री ने साल 2008 में वेलेंटाइन डे के दिन 'इंडियन लवर्स पार्टी' बनाई. पार्टी के हल्के गुलाबी रंग के पोस्टर पर लिखा है कि वह अलग-अलग जाति और धर्म से आने वाले उन प्रेमी-प्रेमिकाओं के लिए आवाज़ उठाएगी जिनके परिजन उनके रिश्ते के लिए तैयार नहीं होते.

'इंडियन लवर्स पार्टी' बनाने वाले बी कुमार तमिलनाडु से अपना उम्मीदवार खड़ा कर रहे हैं. उन्हें पूरा भरोसा है कि आगामी लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को 40-50 हज़ार वोट मिलेंगे, जो 2011 में हुए विधानसभा चुनाव में मिले 3,000 वोट के मुकाबले काफ़ी अधिक हैं.

वैसे तो 'इंडियन लवर्स पार्टी' तमिलनाडु में पहले से ही पंजीकृत है लेकिन चुनाव के बाद उनकी योजना पार्टी का पंजीकरण केंद्रीय स्तर पर कराने की है. पार्टी के संस्थापक बी कुमार पार्टी का चुनाव चिह्न, दिल के भीतर जड़ा ताजमहल, चाहते हैं.

जातिगत या धार्मिक संदर्भ

चुनाव आयोग में किसी दल को अपना पंजीकरण कराने के लिए पता, नाम, दल की सदस्य संख्या (कम से कम 100), उद्देश्य और ढांचा सहित कई जानकारियां मुहैया करानी होती हैं. इसके बाद पंजीकरण शुल्क के रूप में 10,000 रुपए भी देने होते हैं.

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Image caption बी कुमार चाहते हैं कि उन्हें ख़ास तौर पर बनाया गया यही चित्र चुनाव चिन्ह के रूप में मिले.

दिल्ली के 'जनतांत्रिक सुधार संगठन' के प्रमुख अनिल वर्मा कहते हैं कि सारी प्रक्रिया पूरी करने के बाद "पार्टी राजनीतिक दलों की फेहरिस्त में शामिल हो जाती है."

चुनाव आयोग खास शर्तों को पूरा नहीं किए जाने की स्थिति में किसी दल के आवेदन को अस्वीकार कर सकता है.

वह कहते हैं कि यदि पार्टी का नाम किसी खास जाति या धार्मिक संदर्भों की ओर इशारा करता है तो चुनाव आयोग की ओर से उसे ख़ारिज कर दिया जाता है.

हालांकि 'रिलीजन ऑफ मैन रिवॉल्विंग पॉलिटीकल पार्टी ऑफ इंडिया' को चुनाव आयोग ने अपनी स्वीकृति दे दी है. इसके संस्थापक ब्लॉगर सौम्यदीप हैं.

'एडोल्फ हिटलर'

पत्रकार सौम्यादीप चौधरी अपने ब्लॉग में लिखते हैं, "राजनीतिक दलों के किसी भी नाम में इंसान, धर्म, जाति, राजनीतिक रुझान, दल, भारत और सबसे महत्वपूर्ण 'विचार' शामिल होते हैं.

लीक से हटकर नाम रखने वालों में चौधरी अकेले नहीं हैं. वह कहते हैं कि ऐसे नाम पूर्वोत्तर भारत में आमतौर पर दिखाई देते हैं.

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Image caption आगामी लोकसभा चुनाव में 'पुअर मैन्स पार्टी' का नाम भी शामिल है.

वह खुद भी पूर्वोत्तर भारत के हैं. उनका कहना है, "हमारे यहां एक मंत्री का नाम 'एडोल्फ़ हिटलर' था. इससे आपको काफी कुछ समझ में आ जाएगा."

उनका कहना है, "आमतौर पर बड़ी बड़ी पार्टियां अपना नाम तय करते समय काफी सोचती-विचारती हैं. राजनीतिक दलों के एक से एक नीरस और ऊबाऊ नामों के बीच मजेदार नाम लोगों के बीच काफी प्रचलित हो जाते हैं."

अनोखे नामों वाले दूसरे दलों में, कम से कम अंग्रेजी नामों में, 'पुअर मैन्स पार्टी' और ' योर्स-माइन पार्टी' का नाम शामिल किया जा सकता है. इनमें दिल्ली चुनाव जीतने वाली 'आम आदमी पार्टी' का नाम भी है.

'योर्स-माइन' की वेबसाइट के अनुसार यह दल राष्ट्रीयता, भारतीयता और एक-वाद का समर्थन करता है.

'दि इंडियन ओशिएंटिक पार्टी' की नींव साल 2010 में रखी गई थी. इसकी वेबसाइट के अनुसार यह दर्शन का सागर है, ईमानदार लोगों का सागर है, समृद्ध भारत बनाने वाली शक्ति का सागर है.

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मगर ये बात अलग है कि पार्टी का चिह्न समंदर की लहरों की बजाय एक फोन है, जो लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने का संकेत देता है.

जागते रहो!

1999 में बनी 'पिरामिड पार्टी ऑफ इंडिया' विचारों में शाकाहार और ध्यान को प्रमुखता देती है.

'स्टे अवेक' पार्टी अपने नाम के अनुरूप ही ये संदेश देती है कि जिस तरह श्मशान में चौकीदार डंडा पीटते हुए लोगों को चौकन्ना करता है, जागते रहो! उसी तरह 'स्टे अवेक' पार्टी संभावित चोरियों के प्रति सतर्क रहने का संदेश देती है.

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Image caption स्टे अवेक पार्टी का चुनाव चिन्ह एक फ़ोन है.

पार्टी के संस्थापक, भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता प्रफुल्ल देसाई का कहना है, "चौकीदार तो केवल छोटे इलाके की पहरेदारी करते हैं, मगर हमारी पार्टी पूरे देश की भ्रष्टाचार के खिलाफ निगरानी करेगी."

अनिल वर्मा कहते हैं कि सैद्धांतिक रूप से यदि एक पार्टी लगातार छह साल तक चुनाव नहीं लड़ती तो उसे पंजीकृत सूची से बाहर मान लिया जाता है, लेकिन आमतौर पर कुछ पार्टियों को इससे खास फर्क नहीं पड़ता.

वह आगे कहते हैं, "लोग अक्सर अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा और ताकत बढ़ाने के लिए पार्टी बनाते हैं. कई बार तो वह कर में छूट पाने के लिए भी ऐसा करते हैं."

अनिल वर्मा का कहते हैं,"विडंबना ये है कि ऐसी ही बहुत सारी पार्टियां हैं जो पंजीकरण तो करवा लेती हैं मगर चुनाव कभी नहीं लड़तीं."

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