आम चुनाव: क्या है मायावती की रणनीति?

  • 1 अप्रैल 2014
इमेज कॉपीरइट PTI

बहुजन समाज पार्टी की मुखिया और 'बहनजी' के नाम से संबोधित की जाने वाली मायावती ने लगता है इस बार के आम चुनावों के लिए कुछ ख़ास रणनीति तैयार की है.

उत्तर प्रदेश मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी का गढ़ रहा है, लेकिन 'बहनजी' प्रदेश के चुनावी समर में अभी पूरी तरह सक्रिय ही नहीं हुई हैं.

तकरीबन रोज़ ही भारत के किसी दूसरे प्रदेश में मायावती की एक बड़ी रैली होती है जहाँ वह अपने उम्मीदवार के लिए वोट मांगती हैं और दूसरे राजनीतिक प्रतिद्वंदियों पर कटाक्ष करती हैं.

मायावती के क़रीबी समझे जाने वालों का कहना है कि 'बहनजी' एक राष्ट्रीय नेता हैं इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है.

बसपा सरकार में मंत्री रहे और मायावती के अटूट समर्थक राम अचल राजभर ने ज़्यादा खुल कर बात की.

बड़े पैमाने पर तैयारी

उन्होंने कहा, "हमारी तैयारी बड़े पैमाने पर है जिससे हमारे अधिक से अधिक सांसद जीतें. इसीलिए बहनजी अभी भारत भर के दौरे पर पार्टी को मज़बूती प्रदान कर रहीं हैं. तीन अप्रैल से उनका उत्तर प्रदेश का चुनावी दौरा शुरू होगा."

इमेज कॉपीरइट FACEBOOK

गौर करने की ज़रूरत है कि उत्तर प्रदेश की जिन 20 से अधिक सीटों पर 10 अप्रैल और 17 अप्रैल को मतदान होना है उनमे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुछ अहम सीटें शामिल हैं.

पहली बात तो ये ऐसे इलाक़े हैं जहाँ पिछले साल मुज़फ्फरनगर और शामली में हुए सांप्रदायिक दंगों की गूँज मतदान में सुनाई पड़ सकती है.

और दूसरी ये कि दंगों के बाद से विश्लेषक पश्चिमी उत्तर प्रदेश को मायावती की पार्टी का 'तुरुप का पत्ता' भी बताते रहे हैं.

हैरानी की बात है कि इन दिनों मायावती देश भर के अपने चुनावी दौरे पर अपनी एक राष्ट्रीय छवि बनाने में जुटी हुईं हैं. बसपा नेता राम अचल राजभर इस सवाल का जवाब तुरंत ही दे देते हैं.

उन्होंने बताया, "हमारी पार्टी दूसरों की तरह भविष्यवाणी नहीं करती. अख़बारों और मीडिया में तो मोदी को जगह दी जा रही है. लेकिन समय बताएगा कि अगला प्रधानमंत्री कौन बनता है".

मतलब साफ़ समझ में आता है. मायावती और उनकी पार्टी की नज़र निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री पद पर है.

प्रधानमंत्री पद पर नज़र

लेकिन कैसे? निवर्तमान लोक सभा में तो बसपा के पास 21 सीटों का आंकड़ा था, लेकिन उत्तर प्रदेश में उनका विश्वसनीय दलित वोट बैंक हमेशा से उनके साथ ही रहा है.

वैसे पिछले लोकसभा चुनाव में 47 सीटों पर बसपा के उम्मीदवार दूसरा स्थान पाने में सफल रहे थे. 'हिंदुस्तान' अख़बार के कार्यकारी सम्पादक नवीन जोशी को लगता है कि निश्चित तौर पर मायावती किसी योजना के तहत ही तैयारी कर रहीं हैं.

उन्होंने कहा, "मायावती की एक ख़ास बात है कि वो एक महीने में ही पूरे प्रदेश को कवर लेती हैं. उनका एजेंडा साफ़ रहता है क्योंकि न तो उनका कार्यकर्ता सड़कों पर निकलेगा, न तो माइकों पर दहाड़ के वोट मांगे जाएंगे. उनका दलित वोट बैंक उनके साथ रहता है, चुनाव हो या न हो."

राम अचल राजभर की बातों से भी साफ़ हो जाता है कि मायावती अपने पहले से मौजूद दलित वोट बैंक के आगे की सोच रहीं हैं. शायद यही वजह है कि हाल ही में अपनी एक चुनावी रैली में मायावती ने सवर्णों के लिए भी नौकरियो में आरक्षण दिए जाने का मुद्दा उठाया था.

राम अचल राजभर ने बताया, "हमारी प्रदेश सरकार के दौरान एक भी सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए. हाल के दंगों में हिंदू-मुसलमान दोनों हताहत हुए. रहा सवाल बहनजी की रणनीति का तो हमने तो पिछली विधानसभा चुनावों में मिली पराजय से ही अपना काम शुरू कर दिया था और संगठन को मज़बूती प्रदान कराने का दम भरा था. इसीलिए लोकसभा चुनावों के लिए हमने अपने उम्मीदवार भी सबसे पहले ही घोषित कर दिए थे".

जानकारों का ये भी मत है कि मायावती का कार्यकर्ता इन चुनावों की तैयारी बहुत सलीके से और दबे स्वर में करता रहा है. नवीन जोशी इस बात से सहमत है कि मायावती की शक्ति को कम से कम उत्तर प्रदेश में कम नहीं आँका जाना चाहिए.

नंबर 2 पर रहेगी बसपा?

उन्होंने कहा, "मायावती की जीत इस बात पर टिकी रहेगी कि मुस्लिम और सवर्ण उन्हें वोट देते हैं या नहीं. दूसरी जाति के लोग अगर उनके साथ आते हैं तो सभी समीकरण बदल जाएंगे जैसे 2007 में उन्हें ब्राह्मणों का समर्थन मिला और उन्हें बहुमत मिल गया. हालांकि 2012 में ब्राह्मणों ने उनका साथ नहीं दिया. बहुत से लोग ये मान रहे हैं और मुझे भी लगता है कि शायद प्रदेश में भाजपा के बाद बसपा दूसरे स्थान पर रहे. इनमें बुंदेलखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का हिस्सा अहम रहेगा".

Image caption राम प्यारे जौनपुर के बाहर एक गाँव में सब्ज़ी बेचते हैं और पिछले 14 वर्ष से बसपा समर्थक हैं

क्योंकि मायावती की बहुजन समाज पार्टी में सबसे कद्दावर नेता वे ख़ुद ही हैं इसलिए उन्होंने शायद एक सोची-समझी रणनीति के तहत ये फ़ैसला किया हो कि आख़िरी जान उन्हें उत्तर प्रदेश में ही फूंकनी है.

आख़िर उत्तर प्रदेश में मामला 80 सीटों का है. मायावती को तो यकीनन इस बात का एहसास होगा कि पिछले चुनावों में 21 सीट जीतना उनकी पार्टी का किसी भी लोकसभा में सबसे बेहतरीन प्रदर्शन था.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार