राहुल, मोदी, केजरीवाल होंगे आमने-सामने?

  • 3 अप्रैल 2014
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राजनीतिक पार्टियों के दिग्गज नेता इन दिनों हर तरफ़ रैलियों में व्यस्त हैं लेकिन हज़ारों की भीड़ को भाषणों से संबोधित कर क्या कोई नेता जनता में भरोसा जगा सकता है?

चुनाव में नेताओं की दावेदारी को खंगालने और घोषणापत्र में किए गए वादों को परखने के लिए अब एक ऑनलाइन याचिका शुरु की गई है. ‘कॉल फ़ॉर डिबेट 2014’ नाम की इस 'ऑनलाइन पिटीशन' के ज़रिए प्रधानमंत्री पद के दावेदारोंके बीच बहस को चुनाव प्रणाली का हिस्सा बनाने की बात कही गई है.

'प्राइमिनिस्टीरियल डिबेट'

इस याचिका कि शुरुआत करने वाली शामोली खेरा कहती हैं, ''कुछ दिनों में वोटिंग शुरु हो जाएगी और हम सब अपने-अपने हिसाब से अपने वोट का इस्तेमाल करेंगे, लेकिन क्या वाक़ई हमें पता है कि तथ्यात्मक रुप से किस मुद्दे पर किस पार्टी की क्या राय है और हम उन्हें किसलिए वोट दे रहे हैं? यहां तक कि जो दावे पिछले सालों में उन्होंने किए उनमें से कितने पूरे हुए? चुनाव की पूरी बहस सीटों के गठजोड़ और आरोप-प्रत्यारोप पर केंद्रित लगती है.''

भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी, कांग्रेस नेता राहुल गांधीऔर आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को संबोधित इस याचिका में चुनावी बहस के बड़े मुद्दों और इन नेताओँ के लिए आम लोगों के मन में उठने वाले सवालों का ज़िक्र है. जैसे,

1) भारतीय जनता पार्टी का चुनाव प्रचार नरेंद्र मोदी और गुजरात के विकास मॉडल पर केंद्रित है, लेकिन उन्होंने अभी तक ये नहीं बताया है कि उनका ये मॉडल अलग-अलग राज्यों में कैसे काम करेगा जहां मुद्दे और ज़रूरतें दूसरी हैं.

2) कांग्रेस के प्रचार का नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे हैं और उन्होंने बदलाव और भ्रष्टाचार को हटाने की बात की है, लेकिन उन्होंने अभी तक ये साफ नहीं किया है कि नई सरकार मौजूदा सरकार से अलग कैसे होगी.

3) अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी ने राजनेताओं और कॉरपोरेट घरानों की मिलिभगत के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला है लेकिन आम जनता को अभी तक ये नहीं पता कि अगर वो चुन कर आए तो देश चलाने को लेकर उनकी क्या नीति-रणनीति होगी.

शामोली के मुताबिक़ ये 'डिबेट' ज़रूरी है क्योंकि, ''चुनाव के दौरान टेलिविज़न चैनलों पर होने वाली बहस को नेता वैचारिक अखाड़ा समझते हैं और चीख़ने-चिल्लाने के अलावा कोई बात सामने नहीं आती. मुश्किल सवाल न पूछे जाते हैं न उनके जवाब देने के लिए नेताओं को कोई मजबूर कर सकता है.''

70 हज़ार हस्ताक्षर

इस ऑलनाइन याचिकापर अबतक 70 हज़ार से ज़्यादा लोग हस्ताक्षर कर चुके हैं और वो चाहते हैं कि चुनाव आयोग इस बहस को चुनाव प्रणाली का हिस्सा बनाए. कई लोगों ने इसके हक़ में अपनी राय भी ज़ाहिर की है.

याचिका पर हस्ताक्षर करने वाली सोहरा भुजवाल कहती हैं, ''प्राइमिनिस्टीरियल डिबेट एक बेहतरीन आइडिया है. अफ़सोस ये है कि मोदी जैसे नेता तो मीडिया से भी बात करने को तैयार नहीं होते. क्या उन्होंने कभी भी टीवी पर एक निष्पक्ष साक्षात्कार के लिए हामी भरी है? मोदी मीडिया में छाए हुए हैं और भाषण देकर ख़ुश हैं.''

मुंबई से बसित मोहम्मदी का कहना है, ''भारत में मीडिया के बिकाऊ होने और पैसे लेकर नेताओं के समर्थन की बात लगातार सामने आती रही है ऐसे में आम लोग मीडिया के भ्रम का शिकार हुए बग़ैर ख़ुद नेताओं की बात सुनकर फ़ैसला करना चाहते हैं.''

कानपुर से काजल मिश्रा कहती हैं, ''नेताओं के बीच होने वाली बहस एक दूसरे ज़रिए उनकी कलई खोलेगी और वो जवाब देने को बाध्य होंगे. मैं इस याचिका का समर्थन करती हूं.''

चुनावी बहस का चलन

अमरीका में होने वाली 'प्रेज़िडेंशियल डिबेट' की तर्ज पर इस तरह की बहस भारतीय चुनाव प्रणाली का कभी हिस्सा नहीं रही है और इसके कई कारण हैं. अमरीका में जहां केवल दो पार्टियां हैं जिनके चुने हुए दो उम्मीदवार प्रेज़िडेंशियल डिबेट में हिस्सा लेते हैं वहीं भारत में बहु-पार्टी व्यवस्था है. दिक्क़त है कि भारत की छोटी बड़ी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों के कितने नेताओं और ख़ेमों के बीच ये बहस कराई जाएगी.

एक अरब की जनसंख्या वाले देश भारत में भाषा, क्षेत्र, जलवायु, धर्म और सांस्कृतिक विविधता के चलते किसी भी पार्टी के लिए अर्थव्यवस्था, समाज कल्याण, विकास, सुरक्षा जैसे मुद्दों पर एक समान आर्थिक-सामाजिक नितियों का होना संभव नहीं. ऐसे में प्रधानमंत्री पद के दावेदार क्या एक बहस के ज़रिए हर मुद्दे पर अपनी राय ज़ाहिर कर पाएँगें.

भारत में लागू हो सकता है ये फ़ार्मूला?

लेकिन ऐसा नहीं कि प्रधानमंत्री पद के दावेदारों के बीच बहस को चुनाव आयोग हरी झंडी नहीं दे सकता.

चुनाव विश्लेषक और सेंटर फ़ॉर स्टडीज़ ऑफ़ डेवेलपिंग सोसायटीज़ से जुड़े प्रोफेसर संजय कुमार के मुताबिक़, ''चुनावी बहस और भारतीय राजनीति में 'मेनिफ़ेस्टो' कहीं पिछड़ गए हैं. घोषणापत्र जारी होने के बाद कोई उनकी बात नहीं करता. अगर छह महीने बाद इन पार्टियों के दफ़्तरों में आप जाएं तो कई दफ़्तरों में मेनिफ़ेस्टो की कॉपी भी नहीं मिलेगी. ऐसे में इस तरह बहस की शुरुआत की कोशिश की जा सकती है. लेकिन ऐसी कोई भी बहस तभी कारगर होगी जब इसकी शुरुआत चुनाव आयोग की तरफ़ से की जाएगी ताकि उम्मीदवार इसके लिए बाध्य हों.''

इस बीच अरविंद केजरीवाल ने इस ऑनलाइन याचिका पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज की है. उन्होंने लिखा है, ''मैं इस पिटीशन का स्वागत करता हूं. आम लोगों और देश से जुड़े अहम मुद्दों पर बहस लोकतंत्र को मज़बूत बनाती है. मैं नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के साथ बहस में हिस्सा लेने के लिए तैयार हूं. उम्मीद करता हूं उन्होंने भी इस याचिका को देखा होगा.''

बीबीसी पर इससे पहले भी हमने मीडिया से कतराते दिग्गज नेताओं पर एक रिपोर्ट की थी. इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक कांग्रेस या नरेंद्र मोदी की तरफ़ से इस याचिका पर फ़िलहाल कोई प्रतिक्रिया दर्ज नहीं हुई है.

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