'महिलाएं वोट देने में आगे, टिकट पाने में पीछे'

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आगामी लोकसभा चुनावों में युवाओं को रिझाने के लिए राजनीतिक दलों की कोशिशों में कुछ भी ग़लत नहीं है, लेकिन यह दुःख की बात है कि वे महिला मतदाताओं का समर्थन पाने के लिए बहुत कुछ नहीं कर रहे हैं.

अगर युवा मतदाताओं की संख्या इन चुनावों में राजनीतिक दलों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है तो उनके पास महिला मतों को अपनी ओर मोड़ने और इसके लिए कोशिश करने की कई वजहें हैं. ज़्यादातर सीटों में महिला मतदाताओं की संख्या लगभग आधी या इससे थोड़ी ही कम है.

अगर मसला भागीदारी के स्तर का है तो वोट देने के मामले में महिलाएं युवाओं से आगे रहती हैं. इस तरह किसी राजनीतिक दल की चुनावी सफलता में युवाओं के बजाए महिला मतदाता अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं.

ऐसे में राजनीतिक दलों को महिला वोट पाने के लिए गंभीर प्रयास करने चाहिए, लेकिन वे टिकट बांटते समय महिला उम्मीदवारों को नज़रअंदाज करते हैं.

हिस्सेदारी

हालांकि राजनीतिक दल अप्रैल-मई में होने वाले चुनावों के लिए अपने उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप दे रहे हैं, लेकिन अभी तक टिकट वितरण के रुझानों को देखें तो ये साफ़ है कि किसी भी राजनीतिक दल में महिला उम्मीदवारों को सही हिस्सा नहीं मिला है.

दिल्ली की सात लोकसभा सीटों में तीन राजनीतिक दलों कांग्रेस, भाजपा और आम आदमी पार्टी ने केवल एक-एक महिला को टिकट दिया है. भाजपा ने मीनाक्षी लेखी को नई दिल्ली सीट से अपना उम्मीदवार बनाया है. कांग्रेस ने उत्तर पश्चिम दिल्ली से वर्तमान सांसद कृष्णा तीरथ को दोबारा मैदान में उतारा है जबकि आम आदमी पार्टी ने अपनी विधायक राखी बिड़लान को टिकट दिया है.

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2014 के लोकसभा चुनावों में केवल मुट्ठी भर महिलाओं का नामांकन कोई नई बात नहीं है. पिछले चुनावों में भी महिला उम्मीदवारों को टिकट देने के लिहाज से दलों का रुख़ काफ़ी संकीर्ण रहा था.

साल 2009 के लोकसभा चुनावों में राजनीतिक दलों ने केवल 349 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया था जबकि साल 2004 में यह आंकड़ा महज 238 था.

इसके लिए सभी राजनीतिक दल समान रूप से ज़िम्मेदार हैं. कांग्रेस ने साल 2009 में 43 और साल 2004 में 45 महिलाओं को टिकट दिया था जबकि भाजपा ने साल 2009 में 44 और साल 2004 के लोकसभा चुनाव में केवल 30 महिलाओं को टिकट दिया.

जीतने की संभावना

महिला उम्मीदवारों को टिकट नहीं देने के बारे में राजनीतिक दल कई कारण बताते हैं. वे कहते हैं कि इसमें सबसे प्रमुख यह है कि उनमें जीतने क़ाबिलियत कम होती है.

अगर साल 2009 और साल 2004 के लोकसभा चुनावों के परिणामों को देखें तो यह बात सही नहीं है. पुरुषों के मुक़ाबले महिला उम्मीदवारों में जीतने की क़ाबलियत अधिक रही है.

राजनीतिक दलों में महिला उम्मीदवारों को टिकट नहीं देने के पीछे प्रमुख वजह यह है कि वो महिलाओं को एक वोट बैंक की तरह नहीं देखते हैं. उनका मानना है कि शायद महिला उम्मीदवार भी पार्टी के पक्ष में महिलाओं का वोट हासिल न कर सके.

कोई पक्के तौर पर यह नहीं कह सकता है कि किसी ख़ास संसदीय क्षेत्र में अगर कोई महिला उम्मीदवार है तो महिलाएं बड़ी संख्या में उस महिला उम्मीदवार के लिए वोट करेंगी.

पिछले चुनावों को दौरान किए गए सर्वेक्षणों के आंकड़े बताते हैं कि महिला मतदाताओं ने उस पार्टी को वोट नहीं दिया जिसकी प्रमुख एक महिला था. न जयललिता, न ममता बनर्जी और न ही मायावती बड़े स्तर पर महिला मतों को अपनी ओर करने में कामयाब रहीं.

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मत प्रतिशत

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साल 2009 के लोकसभा चुनावों में जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके को तमिलनाडु में उसके सहयोगियों के साथ कुल 37 प्रतिशत वोट मिले. पुरुषों में उन्हें 37 प्रतिशत वोट मिले जबकि महिलाओं के बीच यह आंकड़ा 38 प्रतिशत रहा.

इसी तरह पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस गठबंधन को कुल 45 प्रतिशत वोट मिले. इसमें पुरुषों के 46 प्रतिशत और महिलाओं में 43 प्रतिशत वोट शामिल थे.

उत्तर प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनावों में मायावती की बसपा को 27 प्रतिशत वोट मिले. पार्टी को 28 प्रतिशत पुरुषों और 27 प्रतिशत महिलाओं के वोट मिले.

इन राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान भी ऐसे ही रुझान देखने को मिले. राज्यों में जहां भी किसी पार्टी की प्रमुख महिला हैं, वहां उस पार्टी के पक्ष में या उसके ख़िलाफ़ महिला मतों का कोई विशेष रुझान देखने को नहीं मिला.

यह सही है कि पिछले चुनावों के दौरान महिलाओं ने एक 'महिला वोटर' के रूप में वोट नहीं दिया, लेकिन अगर राजनीतिक दल इसके लिए कोशिश करें तो रुझान बदल सकते हैं.

पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान (ख़ासतौर से 1950 और 1960 के दशक में) महिलाओं के मतदान का प्रतिशत पुरुषों के मुक़ाबले काफ़ी कम था. ये अंतर दस प्रतिशत से अधिक रहा.

ज़्यादातर राज्यों में विधानसभा चुनावों के दौरान भी महिलाओं के मतदान का प्रतिशत कम रहा है. लेकिन पिछले कुछ सालों के दौरान हुए विधानसभा चुनावों में ये रुझान बदला है.

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महिलाओं का असर

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लगभग सभी राज्यों में न सिर्फ़ महिलाओं के मतदान का प्रतिशत बढ़ा है बल्कि महत्वपूर्ण बात ये है कि कई राज्यों में मतदान के लिहाज से महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया.

साल 2010 के बिहार विधानसभा चुनावों में महिलाओं के मतदान का प्रतिशत पुरुषों के मुक़ाबले 3.4 प्रतिशत अधिक था. ऐसे ही रुझान साल 2012 के विधानसभा चुनावों के दौरान उत्तराखंड में देखे गए.

उसी साल गोवा में हुए विधानसभा चुनावों में महिलाओं के मतदान का प्रतिशत पुरुषों के मुक़ाबले छह प्रतिशत अधिक रहा, जबकि हिमाचल प्रदेश में ये आंकड़ा सात प्रतिशत रहा.

कर्नाटक, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, पंजाब, पुडुचेरी, राजस्थान, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे कई दूसरे राज्यों में पिछले चुनावों में तो महिलाओं के मतदान का प्रतिशत कम था, लेकिन हाल में हुए विधानसभा चुनावों को दौरान वहां महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया.

कई राज्यों में अभी शुरुआत ही हुई है. चुनावों और चुनावी राजनीति में महिलाएं अधिक सक्रिय दिखाई दे रही है. अब समय आ गया है कि राजनीतिक दल बदलाव की पहल करें.

उन्हें टिकट वितरण में महिलाओं को अधिक हिस्सेदारी देने, राजनीति और ख़ासतौर से चुनावों में अधिक सक्रिय भागीदारी के लिए व्यवस्था बनाने के बारे में सोचने की ज़रूरत है.

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