ऑटो रेहड़ी वाले क्या अब भी हैं 'आप' के दीवाने?

ऑटो चालकों का समूह

“नमस्कार मैं अरविंद केजरीवाल बोल रहा हूं, हमारी पार्टी ने अभी दिल्ली में 49 दिन की सरकार बनाई थी...” अगर आप रेडियो सुनते हैं या फ़िर आप मोबाईल फ़ोन का इस्तेमाल करते हैं तो आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल का ये रेकॉर्डेड संदेश आपने जरुर सुना होगा.

ऐसे संदेशो के माध्यम से अरविंद केजरीवाल आजकल पिछले विधानसभा चुनाव में बनी अपनी सरकार के 49 दिनों के कार्यकाल का ब्यौरा देते सुनाई पड़ रहें हैं.

मुफ्त बिजली, पानी, भ्रष्टाचार में कमी, रेहड़ी और खुदरा व्यापारियों के हितों का ख्याल, ऑटो वालो की मदद और पुलिस के रवैये में बदलाव ऐसे ही कुछ मुद्दे हैं जिनके आधार पर अरविंद जनता से और खासतौर पर अपनी पार्टी के वोट बैंक ऑटो और रेहड़ी चालकों को लोकसभा चुनाव में उनको वोट देने की अपील कर रहे हैं.

लेकिन जिन ऑटो वालो और रेहड़ी पर सब्ज़ी बेचने वालो की वो बात कर रहें हैं क्या वो भी उनकी बात से सहमत हैं? या फ़िर अचानक इस्तीफ़ा देकर उन्हें मंझधार में छोड़ देने वाली सरकार से नाखुश हैं.

इसी सवाल का जायज़ा लेने हम दिल्ली की सड़को पर निकले. सबसे पहले हमने बात की दिल्ली में आम आदमी पार्टी के बड़े वोट बैंक यानि ऑटो चालकों से कि क्या 49 दिनों के दौरान उन्हें दिल्ली के प्रशासन में कुछ फ़र्क लगा.

आम आदमी का ऑटो

10 साल से ऑटो चला रहे चालक शाक़िब ने बताया “पहले बिना बात के पुलिस वाले तंग करते थे. कभी भी चालान काट देते थे. केजरीवाल आए तो पुलिस भी तमीज से बात करने लगी थी.”

25 साल तक ऑटो चलाने वाले मोहम्मद वसीम का कहना था, “10 साल तक कांग्रेस को वोट दिया साहब, किसी चीज़ की कोई सुनवाई नहीं थी, इस आदमी ने 49 दिनों में गैस के दाम 50-55 से 35 कर दिए ये छोटा काम है क्या? ”

ऑटो चालकों ने तो खुल कर केजरीवाल का समर्थन किया लेकिन पास ही खड़े कुछ पुलिसकर्मी शायद इस बात से सहमत नहीं थे. पहले तो उन्होनें ऑटो वालो को ऑटो ठीक से पार्क करने को कहा फ़िर हमसे मुखातिब होकर बोले “आप यहां भीड़ मत लगाओ.”

पुलिस की बेबसी

कुछ देर बाद नाम न बताने की शर्त पर वो बोले “ये ऑटो वाले अरविंद केजरीवाल का सरकार आने के बाद से काफ़ी बदल गए हैं. पुलिस को केजरीवाल के नाम की धौंस दिखाने लगे हैं.”

ये पूछे जाने पर की क्या पुलिस धौंस नहीं दिखाती तो उनका कहना था “पुलिस का काम है सख्त होना, गलती करें और हम सख्त भी न हों ये कहां कि बात हुई. रही पैसे लेने की बात मेरी 25 साल की नौकरी मैंने किसी से पैसे नहीं लिए और जो लेते हैं तो उनसे आप सारी पुलिस को भ्रष्ट मत बोलो”.

हमने जिन ऑटो वालो से बात की थी वो हमें मीटर से यमुना विहार ले जाने को तैयार हो गए जहां दिल्ली की नार्थ ईस्ट लोकसभा सीट से आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी प्रो. आनंद कुमार रैली के लिए आने वाले थे. रैली स्थल से कुछ दूर पर रेहड़ी पर छोले कुल्चे बेचने वाले पवन मौजूद थे जो आम आदमी पार्टी से नाखुश नज़र आए “क्या आम आदमी पार्टी साहब, इतने बड़े बड़े वादे किए और फ़िर इस्तीफ़ा दे दिया. क्या फ़ायदा हुआ इनको वोट देने का इससे अच्छा फूल पर बटन दबाते.”

पवन को बीबीसी हिंदी को से बात करते देख भीड़ जुटने लगी और लोग बातें करने लगें. लाल मोहम्मद, जो यमुना विहार और आसपास के ईलाके में कनस्तर की फेरी लगाते हैं उनके अनुसार अरविंद का इस्तीफा सही था “वो बड़े चुनाव की तैयारी में हैं. इसके लिए छोटा पद तो छोड़ना था न. अब फ़िर आएंगे.”

लेकिन जब हम यहां से यमुना विहार के अंदरुनी ईलाकों में आगे बढे तो ऐसा लगा जैसे अरविंद केजरीवाल को कोई पसंद नहीं करता और पूरा इलाका भारतीय जनता पार्टी का गढ़ है.

हर हर मोदी

घोंडा क्षेत्र में लक्ष्मी इलेकट्रिकल्स के नाम से अपनी दुकान चलाने वाले विकास तोमर ने कहा “ अरविंद अच्छे थे लेकिम मोदी जी ने बहुत विकास किया है गुजरात में. वो देश को भी वैसा ही बना देंगे.”

लेकिन ये पूछे जाने पर कि क्या वो कभी गुजरात गए हैं जवाब ‘न’ में था “ अरे हमने टीवी में देखा था वहां खूब विकास हुआ है.”

विकास की दुकान के बाहर भी माईक देख के भीड़ लग गई और भीड़ में से निकल कर आए चाय की दुकान चलाने वाले लीलू जिन्होने जोरों शोरों से मोदी के नाम के नारे लगाने शुरु कर दिए.

“मोदी जी के लिए मैं अपने बच्चे, अपना परिवार भी कुर्बान कर सकता हूं. 49 दिन तो क्या 49 सालों में भी कोई केजरीवाल वो नहीं दे सकता जो हमारे भाई मोदी से मिलेगा.” और फिर हर हर मोदी के नारे लगाने लगे.

लेकिन बार बार ये पूछने पर भी भीड़ में से कोई भी ये नहीं बता सका कि नार्थ ईस्ट से भाजपा प्रत्याशी हैं कौन? “जो भी हों, मोदी को लाना है!” और फ़िर मोदी के नारों का दौर शुरु हो जाता है.

हम वैसे तो आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी प्रो. आनंद कुमार की रैली के शुरु होने के इंतजार में खड़े थे लेकिन रैली आयोजक शायद हमारे जाने और भाजपा समर्थकों के हटने के इंतजार में खड़े थे. सो हमने वहां से चलना ही मुनासिब समझा.

कुछ दूर जाते ही भाजपा के नारे लगाते लीलू ने हमें रोका और कहा “ इस बार मेरा टिकट पक्का था आम आदमी से पर पता नहीं किसे दे दिया. अब तो अगला विधानसभा चुनाव निर्दलीय ही लड़ूंगा.”

सारा दिन घूमने के बाद यही समझ आया कि अरविंद की 49 दिन की सरकार को कोई भले ही कोई भूला नही हैं लेकिन उनके अचानक इस्तीफ़े को लोगों ने एक्सेपट भी नहीं किया.

भले ही अरविंद अपने रेकॉर्डेड मेसेज से 49 दिन के काम याद दिलाए लेकिन लोगों को उनसे ज्यादा उम्मीदें थी और उनके अचानक दिए इस्तीफ़े ने लोगों की उम्मादों पर पानी फ़ेर दिया. अब जनता उनका भी विकल्प ढूंढती नज़र आ रही है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार