'मोदी विवादास्पद, लेकिन पेरिस में भी उनके क़िस्से'

  • 2 अप्रैल 2014

भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने वाराणसी को अपना चुनाव क्षेत्र बनाया है. हालांकि वह साथ ही वडोदरा से भी चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन इन दिनों वाराणसी 'हॉट सीट' बन चुका है.

काशी नगरी में चुनावी मंज़र की टोह लेते समय मेरी मुलाक़ात एक नामचीन लेखक और फ़्रांसीसी नागरिक पैट्रिक लेवी से हुई.

पैट्रिक लेवी हर वर्ष कम से कम चार हफ़्ते इस नगरी में बिताते हैं और यह उनकी 16वीं भारत यात्रा है.

तपाक से पूछ बैठे, "आप मुझसे मेरी किताबों के बारे में बात करने आएं है या फिर धार्मिक उपदेश लेने?"

लेवी अब तक 'डज़ गॉड बिलीव इन गॉड' और 'द कब्बालिस्ट' जैसी छह नामचीन किताबें लिख चुके हैं.

मैंने पूछा, "आपको पता है भारत में चुनाव होने वाले हैं और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से चुनाव लड़ रहे हैं?"

पेरिस में मोदी

जवाब मिलता है, "बिलकुल. सुना भी है और पढ़ा भी है. मैं फ़्रांस में रहता हूँ और वहाँ भारतीय दुकानों से इंडिया टुडे और अन्य समाचार पत्रिकाएं ज़रूर ख़रीद कर पढ़ता रहता हूँ. मैंने पढ़ा है कि भारत में मोदी को विवादास्पदराजनेता कहा जाता है. लेकिन अगर वो विवादास्पद भी है, तब भी पेरिस में उनके क़िस्से है और लोग जानते हैं कि वह प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं."

पैट्रिक दो हफ़्ते पहले ही भारत पहुंचे हैं और उन्हें इस बात की हैरानी भी है कि देशभर की मीडिया में इन दिनों सिर्फ़ प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों के बीच बहस छापी जा रही है.

उन्होंने बताया कि उनकी नई किताब का नाम 'साधूज़' है जिसमे उन्होंने माया, कर्म और आश्रम जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की है.

हालांकि पैट्रिक लेवी को इस बात की भी पूरी जानकारी है कि गुजरात में वर्ष 2002 में क्या हुआ था.

उन्होंने कहा, "मैंने पढ़ा है कि नरेंद्र मोदी पर आरोप लगे थे कि जब उनके राज्य में सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे तो उनकी सरकार चुप रही थी. ये सही है या ग़लत मुझे नहीं पता, लेकिन ये ज़रूर पता है कि मोदी विवादास्पद अपने विपक्षियों के लिए हैं और शायद भाजपा के लिए कारगर".

बाहरी उम्मीदवारों का डर

इत्तेफ़ाक़ ऐसा भी रहा कि पैट्रिक से बात होने के दौरान ही हमारे बग़ल से निकल रहे दो व्यक्ति ठिठक कर रुक गए. उनमें से एक फ़हीम अख़्तर वाराणसी में ही जन्मे और व्यापार करते हैं.

मैंने उन्हें भी बहस में शामिल किया, तो कहते हैं, "मैं जो कहूंगा उसे तो आप मीडिया वाले चलाएंगे नहीं".

मेरे दिलासे के बाद उनका जवाब था, "देखिए यहाँ चुनाव नहीं होता, यहाँ पर जाति के आधार पर वोट दिए जाते हैं. अगर सारे मुसलमान तय कर लेंगे तो फिर वोट एक ही आदमी को मिलेगा. लेकिन हमारी विडंबना ये है कि चाहे मोदी हो या केजरीवाल हों, सभी बनारस के बाहर से हैं और ज़ाहिर है शहर के लिए उनकी मोहब्बत कम ही होगी".

मुझे पता ही नहीं लगा कब काशी नगरी के दशाश्वमेध घाट पर पैट्रिक लेवी और फ़हीम अख़्तर साहब के साथ बातचीत करते पूरे दो घंटे बीत गए.

बहरहाल, मैंने पैट्रिक से एक वादा लेने के बाद ही विदा ली. अगली बार जब वह दिल्ली आएँगे तो बीबीसी के दफ़्तर में हमारे साथ अपनी मनपसंद ब्लैक कॉफ़ी ज़रूर पिएंगे!

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