मतदान नहीं करेंगे ओडिशा के डोंगरिया कोंध आदिवासी

कड़कार मांझी

ओडिशा में डोंगरिया कोंध आदिवासियों ने ब्रितानी कंपनी वेदांता की खनन परियोजना को पूरी तरह हटाने की मांग की है.

उन्होंने फ़ैसला किया है कि जब तक उनकी यह मांग पूरी नहीं होती वो चुनाव का बहिष्कार करेंगे.

आदिवासियों ने रायगढ़ा ज़िले में पड़ने वाले क्षेत्रों से सुरक्षा बलों को हटाए जाने और तलाशी अभियान को पूरी तरह रोकने की मांग भी की है.

यह निर्णय डोंगरिया कोंध आदिवासियों के 112 गांवों के प्रमुखों और आम लोगों ने कुछ दिनों पहले आयोजित अपनी एक बैठक में लिया.

रायगढ़ा ज़िले के आदिवासियों के विरोध और भारत के सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से वेदांता की खनन परियोजना पर रोक तो लग गई है लेकिन आदिवासियों का मानना है कि अगर कारख़ाना वहां से पूरी तरह नहीं हटाया जाता है तो उसे कभी भी शुरू किया जा सकता है.

वेंदाता की परियोजना में खनन का काम नियमगिरी की पहाड़ियों में भी होगा.

इस क्षेत्र के आदिवासी ख़ासतौर से डोंगरिया नियमगिरी को अपना देव मानते हैं और ज़ाहिर है कि वे किसी भी क़ीमत पर इसे खनिज के लिए खोदे जाने देने को तैयार नहीं हैं.

चुनाव का क्या हासिल?

डोंगरिया कोंध के सरदार लद्दो सिकोका ने कहा, ''लोगों में ये भावना है कि चुनाव प्रक्रिया में शामिल होने, वोट देने, और फिर सरकार चुनने का डोंगरिया आदिवासियों के जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है."

उन्होंने कहा, "कोई भी सरकार आदिवासियों की भलाई के लिए काम नहीं करती इसलिए चुनाव में शामिल होने का कोई मतलब नहीं होता.''

पूर्वी राज्य ओडिशा में लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा की 147 सीटों के लिए भी चुनाव होंगे. राज्य में लोकसभा की कुल 21 सीटें हैं.

ओडिशा में मतदान दो चरणों में 10 और 17 अप्रैल को होगा.

डोंगरिया हर एक गांव में पानी, स्कूल और शिक्षकों की लगातार मौजूदगी, बिजली और सभी के लिए घर की मांग भी कर रहे हैं.

पहाड़ों में बसे कई गांवों में स्कूल भवन तो हैं लेकिन शिक्षकों के अभाव में वो बंद पड़े हैं. पानी और बिजली की सुविधा तो कहीं भी नहीं दिखती.

दबाव में मांग

वरिष्ठ पत्रकार सीमांचल पांडा के मुताबिक़ लोगों का कहना है कि आदिवासी क्षेत्र से अर्धसैनिक बलों को हटाने की मांग वे माओवादियों के दबाव में उठा रहे हैं.

मगर आदिवासियों का कहना है कि क्षेत्र में गश्त कर रहे सुरक्षा बलों के जवान ग्रामीणों को ख़ासकर युवाओं को माओवादी होने या उनकी मदद करने के नाम पर न सिर्फ परेशान करते हैं बल्कि अक्सर उन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ती है.

डोंगरिया आदिवासी नेताओं का कहना है कि सुरक्षाबलों ने उनके बीच काम कर रहे तीन युवाओं को माओवादी बताकर कुछ दिनों पहले गिरफ़्तार कर लिया था और तमाम कोशिशों के बावजूद इन लोगों की ज़मानत तक होनी मुश्किल हो रही है.

नियमगिरी सुरक्षा समीति के सभापति बाड़ी पिड़िकाका कहते हैं कि चुनाव बहिष्कार का निर्णय डोंगरिया आदिवासियों ने पहली बार लिया है. इससे पहले वो हमेशा चुनाव प्रक्रिया में शामिल होते रहे हैं.

वोट नहीं देंगे

गोड़था ग्राम के कडकारा मांक्षी वोट न देने के फ़ैसले को सही ठहराते हुए कहते हैं, “राजनीतिक दल हमारा वोट लेकर जाते हैं, सरकार बनाते हैं और फिर हमारे पहाड़ों को बेच देते हैं इसलिए हमने फ़ैसला किया है कि हम वोट नहीं देंगे.”

बाड़ी पिड़िकाका कहते हैं कि अगर सरकार का कोई व्यक्ति या सांसद या विधायक आकर हमें हमारी सभी मांगों को पूरा करने आश्वासन दे तो फिर हम चुनाव प्रक्रिया में शामिल होने के फ़ैसले पर पुनर्विचार कर सकते हैं.

हालांकि अनुसुचित जनजाति के लिए आरक्षित रायगढ़ा सीट में आदिवासियों की तादाद कुल आबादी का 30-35 फ़ीसदी है.

यहां सिर्फ़ डोंगरिया कोंध आदिवासियों का चुनावी बहिष्कार राजनीतिक समीकरणों में शायद कोई फ़र्क़ पैदा कर सकेगा लेकिन इसने एक नई चर्चा ज़रूर शुरू कर दी है कि वर्तमान परिवेश में आदिवासियों की ज़िंदगी में मुश्किलें इस क़दर बढ़ती जा रही हैं कि अब उन्हें भी राजनीतिक बहिष्कार का सहारा लेना पड़ रहा है.

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