चुनावों में मुसलमानों के रुख़ पर कयास

  • 5 अप्रैल 2014
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लोकसभा चुनावों के लिए मतदान शुरू होने में महज़ दो दिन बाकी हैं. लेकिन यह बहस एक बार फिर गर्म है कि मुसलमान मतदाता किसके पक्ष में झुकेंगे. असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, केरल, दिल्ली जैसे कई राज्यों में मुसलमान मतदाता महत्वपूर्ण स्थिति में हैं.

देश की 83 लोकसभा सीटों पर मुसलमान मतदाता 20 फ़ीसदी से ज़्यादा हैं. इनमें से 25 सीटें उत्तर प्रदेश, 19 पश्चिम बंगाल, आठ-आठ केरल और असम में और छह-छह बिहार और जम्मू-कश्मीर में हैं.

कुछ लोगों का मानना है कि भाजपा को रोकने के लिए मुसलमान मतदाता कई सीटों पर कांग्रेस के पीछे लामबंद हो सकते हैं.

हम नहीं जानते कि आखिर मुसलमान किसे वोट देंगे. वह कांग्रेस को एकमुश्त वोट देंगे या पिछले चुनावों की तरह विभिन्न क्षेत्रीय पार्टियों को वोट देंगे- जैसे कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव को और लालू या नीतीश को बिहार में.

सीएसडीएस के सर्वेक्षण बताते हैं कि कांग्रेस को नुक़सान सिर्फ़ सत्ता विरोधी भावना से ही नहीं होगा बल्कि मुसलमान मतदाताओं के आम आदमी पार्टी की ओर जाने की संभावना से भी होगा.

'सपा-बसपा को भी नुक़सान'

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कांग्रेस को नुक़सान उन सीटों पर हो सकता है जहां कांग्रेस भाजपा और आप के साथ द्विपक्षीय संघर्ष में उलझी हुई थी और 'आप' वहां एक सक्षम राजनीतिक विकल्प के रूप में सामने आई. दिल्ली और हरियाणा में अपनी मज़बूत स्थिति के अलावा 'आप' ने मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और छत्तीसगढ़ में भी बहुत से उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं.

इन राज्यों में बड़ी संख्या में मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देते और इस बार के लोकसभा चुनावों में यहां परिणाम अलग हो सकते हैं. इसकी वजह यह है कि अब से पहले यहां चुनावों में भाजपा और कांग्रेस ही आमने-सामने होती थीं जबकि अब 'आप' भी मुसलमान मतदाताओं के लिए एक विकल्प के रूप में सामने है.

जिस तरह से 'आप' और इसके नेता अरविंद केजरीवाल मुसलमानों में प्रचार कर रहे हैं उससे मुसलमान मतदाताओं के दिमाग में असमंजस तो ज़रूर पैदा होगा कि वह भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस को वोट दें या 'आप' को.

हो सकता है कि 'आप' प्रत्याशी जीतने की स्थिति में न हों लेकिन कांग्रेस और 'आप' दोनों को उम्मीद होगी कि मुसलमान मतदाताओं को अपने पक्ष में लाकर वह ज़्यादा से ज़्यादा चुनावी फ़ायदा ले सकें.

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इससे आखिर दोनों पार्टियों में मुसलमान मतों का बंटवारा होगा जिससे भाजपा को फ़ायदा मिलेगा. मुसलमान मतों के बंटवारे से पहले ही कई राज्यों में जर्जर हो चुके कांग्रेस के मुसलमान वोट आधार को भारी धक्का लगेगा.

जिन 83 सीटों पर मुसलमान मतदाता उल्लेखनीय संख्या में हैं उनमें से 30 पर कांग्रेस ने जीत हासिल की है तो 14 में भाजपा जीती है. कांग्रेस के लिए 2009 में जीती इन सीटों में से बहुत सी सीटों को फिर से जीतना काफ़ी मुश्किल होगा.

मुसलमान वोटों के विभाजन से कांग्रेस की यह सीटें जीतने की संभावना को धक्का लगेगा और वह कई सीटें गंवा सकती है. कांग्रेस को यह नुक़सान विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश में हो सकता है जहां उसने 25 फ़ीसदी मुसलमान वोटरों वाली सात सीटें हासिल की थीं.

सात सीट जीतने वाली बसपा और पांच सीटें जीतने वाली सपा को भी तीन पार्टियों के बीच मुसलमान मतों के विभाजन से नुक़सान हो सकता है. मुसलमान वोटों में इस स्वतः विभाजन का मतलब होगा भाजपा को फ़ायदा.

'आप' की ओर झुकाव

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कांग्रेस की चुनौती उन राज्यों में और ज़्यादा है जहां मुसलमान वोटर उल्लेखनीय संख्या में हैं और क्षेत्रीय दल काफ़ी मजबूत हैं. कांग्रेस पहले ही क्षेत्रीय दलों के सामने बड़ी संख्या में मुसलमान वोट गंवा चुकी है.

बड़ी तादाद में मुसलमान वोटर पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के हक़ में (52%), उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के हक़ में (27%), बीएसपी के पक्ष में (18%), बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के पक्ष में (30%) मतदान कर चुके हैं. इसके साथ ही जिन सीटों में जनता दल यूनाइटेड और राजद के बीच मुकाबला हुआ है उनमें राजद या जनता दल यूनाइटेड के पक्ष में या लोक जनशक्ति पार्टी के पक्ष में मतदान किया है.

जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और असम में एयूडीएफ़ को पिछले कुछ चुनावों में उल्लेखनीय मुसलमान वोट मिले हैं.

सिर्फ़ मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात और दिल्ली में मुसलमानों ने उल्लेखनीय संख्या में कांग्रेस को वोट दिया है, लेकिन आने वाले चुनावों में उस पर भी ख़तरा है. इन सभी राज्यों में 75 फ़ीसदी मुसलमान वोटरों ने कांग्रेस को वोट दिया था.

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सीएसडीएस के हालिया सर्वेक्षणों से भी कांग्रेस के लिए अच्छी ख़बर नहीं आई है. दिल्ली में बड़ी संख्या में मुसलमान मतदाताओं ने 'आप' को वोट देने का रुझान दिखाया है जो कांग्रेस के लिए बड़ा धक्का है. 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने दिल्ली की सभी सातों लोकसभा सीटें जीती थीं और 78 फ़ीसदी मुसलमानों ने उसे वोट दिया था.

हाल ही में दिल्ली में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और 'आप' के बीच मुसलमान वोटों के विभाजन से कांग्रेस को भारी नुक़सान हुआ. हालांकि मध्य प्रदेश, राजस्थान या गुजरात जैसे राज्यों में मुसलमान बड़ी संख्या में नहीं हैं फिर भी कांग्रेस के लिए इन राज्यों में मुसलमानों के समर्थन को बनाए रखना एक चुनौती है.

(संजय कुमार सीएसडीएस में प्रोफ़ेसर हैं और युवा मतदाताओं पर आधारित पुस्तक 'इंडियन यूथ एंड इलेक्टोरल पॉलिसी: एन इमर्जिंग इंगेजमेंट' के लेखक हैं)

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