किसका देश, किसका लोकतंत्र?

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16 मई को जब बहुत सारी मशीनें ताबड़तोड़ रफ़्तार से 120 करोड़ लोगों के देश की मर्ज़ी को गिन रही होंगी, पूरी दुनिया दम साधकर देखेगी कि शह और मात की बिसात किस तरह बिछने वाली है.

भारत की राजनीति नए सिरे से अपने पत्ते फेंटकर एक नए सिरे से तुरुप के पत्ते और जोकर तय करेगी, दिल्ली के नये दरबार के लिए.

पर देश दिल्ली से बड़ा है और लोकतंत्र संसद और सरकार से.

बहुत सारा हिंदुस्तान हाशिए पर और हाशिए से बाहर खड़ा है, महानगरों और शहरों और मीडिया की चकाचौंध, शोर से बाहर, ग्रोथ एंड डेवलपमेंट स्टोरी से उपेक्षित, संविधान से उपेक्षित और नागरिक अधिकारों से बेदखल, शोषण का शिकार और बदहाली का मारा.

आपके और मेरे फ़ेसबुक फ़्रेंड्स की लिस्ट और सियासी पोस्टरों पर छपे चेहरों, प्राइमटाइम बहसों की नूराकुश्ती से दूर और उदासीन. क़तार के आख़िरी लोग, जिनके बारे में आख़िरी बार साफ़-साफ़ जिसने कुछ कहा था, उसका नाम महात्मा गांधी था.

हालांकि ये भी भारत है. भारतवासी यहां भी हैं. जिनके अपने कथानक हैं, संघर्ष की अपनी गाथाएं.

कहानियां और चुनौतियां

इरोम शर्मिला, जो पिछले 13 साल से अनशन पर हैं. जैसे सोनी सोरी, जो पुलिस और माओवादी क्रूरता, दोनों का शिकार होने के बाद भी चुनावी मैदान में है. जैसे हेमंत गजभिए जिन्हें अपने मत का अधिकार तो इस्तेमाल करना है, पर किसी को जिताने के लिए नहीं.

जैसे बस्तर के जंगल से बेदखल आंध्र में रह रहे आदिवासी, जिन्हें न हैंडपंप मिलेगा न राशन कार्ड न वोटर लिस्ट में नाम. जैसे मणिपुर की विधवा सारा जो उस क़ानून के ख़िलाफ़ फौज के सामने खड़ी है, जिसके कारण उनके ऑटो रिक्शा ड्राइवर पति को अलगाववादी बताकर गोलियों से उड़ा दिया गया.

जैसे करगिल के उस गांव के लोग, जिन्होंने पिछली जंग में सबसे ज़्यादा गोलीबारी झेली और फिर भुला दिए गए. जैसे हरियाणा के नारनौल में रत्ना जिसे शादी के लिए ख़रीदकर त्रिपुरा से लाया गया. जैसे ओडिशा के कालाहांडी के कलिंग मांझी का गांव, जो हर साल सूखे, अकाल और भूख से लड़ता है और ज़िंदा रहता है.

जैसे नियमगिरि के आदिवासी बाड़ी पीड़िकाका जिन्होंने बहुराष्ट्रीय कंपनी वेदांता को अपनी पहाड़ी पर क़ब्ज़ा जमाने से नाकामयाब तो कर दिया, पर क्या वे बाक़ी चुनौतियों से भी आज़ाद हो सके. जैसे विदर्भ की विधवा इंदिरा केलकर जो क़र्ज़ में डूबे किसान पति की आत्महत्या के बाद ज़िंदगी की दूसरी ज़िम्मेदारियां ढो रही हैं.

जैसे देश के सबसे सूखे गांव की उर्मिला, जिनके दिन का बड़ा हिस्सा पानी को ढोने और मीलों चलने में निकलता है.

वो चाहते हैं..

वो ज़िंदा रहना चाहते हैं. कोई शादी करना चाहता है. कोई अपना जंगल बचाना चाहता है. कोई अपने जंगल में लौटना चाहता है. कोई अपनी कोख को गर्भपात से बचाना चाहता है. कोई अपने लोगों को निरंकुश क़ानूनों से बचाना चाहता है.

कोई चाहता है कि परिवार, गांव और धरती पर किसी को भूखा न सोना पड़े. कोई चाहता है जंग दोबारा न हो. कोई चाहता है बच्चे फिर से स्कूल जाने लगें.

कोई क़र्ज़ के शिकंजे से बाहर निकलना चाहता है. वे सांस लेना चाहते हैं. 67 साल के आज़ाद मुल्क में.

वे वोट भी देना चाहते हैं. वे चाहते हैं उनके भी दिन बदलें.

क़तार के आख़िरी...

बीबीसी हिंदी की टीम ने उन लोगों तक पहुंचने के लिए लंबे और दुर्गम रास्ते तय किए, जो चुनावी शोर और चौंध से बहुत दूर, बहुत बाहर, बहुत बेदख़ल, बहुत हाशिए पर हैं.

और कुछ उन लोगों तक भी, जो इस देश की विकासगाथा के हिस्से हैं, जिन्हें आर्थिक उदारीकरण, शिक्षा और खुले बाज़ार का फ़ायदा मिला. जो भारत से निकलकर चमकते इंडिया का हिस्सा बने. बदलते भारत की एक इबारत वे भी हैं.

क्या मतलब है उन लोगों के लिए तरक़्क़ी का, आज़ादी का, अधिकारों का और वोट का. सोमवार से आप देखेंगे वे चेहरे और उनके ज़रिए उन मुद्दों को समझने की हमारी कोशिश, जो इस जनतंत्र की ज़मीन पर सवालों की तरह खड़े हैं.

ये श्रृंखला हमारी छोटी सी लेकिन महत्वपूर्ण कोशिश है ज़मीनी पत्रकारिता की उस तंत्र के बारे में, जो भारत का जन-गण-मन है. इसीलिए हमने इसका नाम 'क़तार के आख़िरी...' रखा है.

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