सागरनामा-17: ओडिशा की राजनीति नवीन पर ठहरी?

  • 7 अप्रैल 2014
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ओडिशा को कभी नितांत पिछड़ा और ग़रीब राज्य माना जाता था. कई मापदंडों पर वह आज भी पिछड़ा हुआ है लेकिन ये तस्वीर अब उसका स्थायी भाव नहीं है.

अब वह ख़बरों में सिर्फ़ इसलिए नहीं आता कि कालाहांडी में लोग भूख से मर जाते हैं या खैरियार के एक बड़े हिस्से में मौसम की वजह से फ़सलें नहीं होतीं.

कालाहांडी का अध्ययन करने वाले कहते हैं कि वह दरअसल वैसा है नहीं, जैसी उसकी तस्वीर बना दी गई है. यहां कृषि उपज कम नहीं होती, पानी ठीक-ठाक मिलता है और सरकारी ख़रीद के आंकड़े देखें तो उपज पूरे राज्य के औसत के बराबर ही होती है.

(बीजद का बागियों से मुक़ाबला)

प्रकृति की मेहरबानी कालाहांडी क्षेत्र पर कुछ कम है पर इतनी भी कम नहीं है कि पूरे ओडिशा को देश के नक़्शे पर धब्बे की तरह दिखाया जाए.

जमाख़ोरों, बिचौलियों और सामंती प्रवृत्ति का लंबे समय तक शिकार रहा ये इलाक़ा भी बदल रहा है. यहां कई स्कूल खुले हैं, डिग्री कॉलेज हैं, सड़कें पक्की हैं. बिजली की कमी है और कटौती होती है पर क़रीब-क़रीब हर इलाक़े में लोग कहते हैं कि ऐसा तो हर जगह होता है.

करोड़ों का निवेश

ओडिशा के बारे में जो प्रचारित है वह कालाहांडी या नियमगिरि खानें हैं लेकिन अप्रचारित तथ्य यह है कि राज्य विकास के कई मापदंडों पर आगे बढ़ा है और पिछले दस वर्षों में उद्योग घरानों ने यहां एक लाख करोड़ रुपए से अधिक का निवेश किया है.

(नवीन का दावा किसी से कम नहीं)

अगर लोकसभा चुनावों के प्रत्याशियों की घोषित संपत्ति को ही राज्य की समृद्धि नापने का पैमाना मान लिया जाए तो इस बार 21 सीटों पर 36 उम्मीदवार करोड़पति हैं.

राज्य के सबसे अमीर प्रत्याशी पुरी में बीजू जनता दल के पिनाकी मिश्रा हैं और भुवनेश्वर में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार की संपत्ति 64 करोड़ रुपए है. 147 सदस्यों वाली विधानसभा में भी यही हाल है, जिसके चुनाव लोकसभा के साथ हो रहे हैं.

सिर्फ़ और सिर्फ़ नवीन

सागरनामा की टीम ने राज्य के दक्षिणी सिरे पर स्थित गांव गिरिसोला से लेकर गंजम, बरहामपुर, खोरदा और पुरी में समृद्धि सड़क के किनारे नहीं देखी पर चिलका झील के किनारे बरकुल गांव तक उसे मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के कई प्रशंसक मिले.

(नवीन निवास में सियासत की बिसात)

भुवनेश्वर से बरकुल आए कुछ पर्यटकों ने ज़रूर भारतीय जनता पार्टी का ज़िक्र किया. लेकिन कांग्रेस पार्टी का कोई नाम नहीं लेना चाहता.

गिरिसोला में मोबाइल की छोटी दुकान चलाने वाले एक व्यक्ति ने कहा, "बाहर जाकर कांग्रेस बोल दीजिए, फिर देखिए आपका क्या हाल होता है. यहां सिर्फ़ और सिर्फ़ नवीन पटनायक हैं और कहीं-कहीं भाजपा."

स्पष्ट बहुमत

राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि साल 2009 का असर राज्य की राजनीति पर अब भी है. उस साल बीजू जनता दल ने भाजपा से नाता तोड़ लिया था. नतीज़ों से साफ़ था कि राज्य में भाजपा की स्वीकार्यता नवीन पटनायक की वजह से थी क्योंकि उसे लोकसभा में एक भी सीट नहीं मिली थी.

(ओडिशा में राजनीति में सितारों का जमघट)

बीजू जनता दल की सीटें 11 से बढ़कर 14 हो गईं, कांग्रेस को छह सांसद मिले जबकि एक सीट कम्युनिस्ट पार्टी के खाते में गई. विधानसभा में भी उसने 103 सीटें जीतकर शानदार प्रदर्शन किया.

ओडिशा की राजनीति के जानकारों के मुताबिक विधानसभा में बीजू जनता दल को एक बार फिर स्पष्ट बहुमत मिल सकता है और मुमकिन है कि वह लोकसभा के आंकड़े में भी सुधार कर ले.

फ़ाइलिन तूफान

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कांग्रेस को ले-देकर तीन सीटों- कोरापुट, नवरंगपुर और कालाहांडी से कुछ उम्मीद है और भारतीय जनता पार्टी भी हो सकता है कि अपने दम पर एक या दो सीट हासिल कर ले. बीजू जनता दल से नाता टूटने के बाद कमज़ोर पड़ी भाजपा के लिए ये कम बड़ी उपलब्धि नहीं होगी.

(नवीन ने तीसरे मोर्चे से झाड़ा पल्ला)

यानी कि कुल मिलाकर राजनीति नवीन पटनायक के आसपास केंद्रित रहेगी. ये पूछने पर कि जब अंदरूनी सड़कें ख़राब हैं, कुछ इलाक़ों में बिजली कटौती होती है और पीने के पानी की समस्या है, लोग नवीन पटनायक को क्यों पसंद करते हैं, जबाव मिलता है, "नवीन बाबू ईमानदार हैं और काम करते हैं."

वे कहते हैं कि राज्य में फ़ाइलिन तूफ़ान आया तो जानमाल का बहुत कम नुकसान हुआ. बड़ा हादसा होने से बच गया. मुख्यमंत्री ने घर बनवाने से लेकर भोजन और कपड़े तक घर-घर पहुंचाए. लोग पलटकर सवाल पूछते हैं, "ऐसा किस और मुख्यमंत्री ने किया है?"

कांग्रेस का हाल

कुछ अतिउत्साही नवीन समर्थक यहां तक कहते हैं कि उनके मुख्यमंत्री देश में सबसे लंबे समय तक लगातार मुख्यमंत्री रहने का ज्योति बसु का रिकॉर्ड तोड़ देंगे. इस बार का चुनाव जीतने पर वे अगले चुनाव तक सत्ता में 20 वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लेंगे.

(36 घंटे में नौ लाख निकाले)

नवीन पटनायक की इस छवि से टकराना कांग्रेस के लिए संभव नहीं दिख रहा है और भारतीय जनता पार्टी शायद इसी को अपनी कामयाबी मानकर खुश हो ले कि विधानसभा में वह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी हो जाएगी.

ओडिशा के गठन के समय से आज तक कांग्रेस तीसरे नंबर पर कभी नहीं रही. उसका ऐसा हाल कभी नहीं हुआ. वक़्त के साथ चलने या पीछे छूट जाने का फ़र्क संभवतः इसी तरह दिखता है.

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