चुनावी सर्वेक्षणः कितनी हक़ीकत, कितना फसाना?

  • 10 अप्रैल 2014
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चुनाव सर्वेक्षणों को लेकर तरह-तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं.

एक तरफ इसके वैज्ञानिक होने का दावा किया जा रहा है तो दूसरी तरफ सर्वेक्षण करने वाले की नीयत पर ही शक़ किया जा रहा है.

सामाजिक विषयों के अध्ययन के काम में आने वाली विधा अचानक से मीडिया की बहस मुबाहिसों में विवाद का मुद्दा बन गई है.

(चुनाव सर्वेक्षणों पर पाबंदी से क्या मिलेगा?)

कल तक बाज़ार में उपभोक्ताओं के रुझान जानने के लिए सर्वेक्षण के जिन तौर तरीक़ों का इस्तेमाल किया जा रहा था, वे आज चुनावी लोकतंत्र से जुड़ी बातों को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण हो गए हैं.

लेकिन चुनावी सर्वेक्षणों को दी जा रही अहमियत के पीछे वैज्ञानिक आधार कम और बाज़ार की भूमिका अधिक है.

भले ही चुनावी सर्वेक्षणों को अहमियत दी जा रही हो लेकिन इनका इतिहास कोई बहुत अच्छा नहीं रहा है. भारत में चुनावी सर्वेक्षण ग़लत परिणाम देने के लिए मशहूर रहे हैं. मसलन साल 2004 और 2009 के चुनावों को ही लें.

लगभग सभी चुनावी सर्वेक्षणों ने साल 2004 में घोषित किया था कि भारतीय जनता पार्टी और उनके सहयोगियों को मिलाकर 240 से 280 के बीच में सीट मिलेंगी.

लेकिन उन्हें केवल 180 सीटें ही मिलीं. इसी तरह साल 2009 में कहा गया कि कांग्रेस और उसके सहयोगियों को 200-225 तक सीटें मिलेंगी लेकिन उन्हें 262 सीटें मिलीं.

सैद्धांतिक आधार

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इसी तरह हाल में संपन्न हुए दिल्ली के विधानसभा चुनावों ने तो सर्वेक्षणों की पोल ही खोल कर रख दी. वैज्ञानिकता का दवा करने वाले चुनावी सर्वेक्षणों की बोलती आम आदमी पार्टी ने फिर एक बार बंद कर दी थी. लेकिन सवाल उठता है कि आख़िर ऐसा क्यों है? सबसे पहले इसके पीछे का वैज्ञानिक आधार देखें.

(आंकड़ों का पहाड़)

सर्वेक्षण तकनीकों का सैद्धांतिक आधार विज्ञान के जिस मॉडल पर टिका है उसकी मान्यता अब लगभग ख़त्म सी हो गई है. ऑब्जेक्टिव नॉलेज़ या वस्तुनिष्ठ ज्ञान का दावा तो अब विज्ञान में भी नहीं किया जा रहा है फिर सामाजिक विषयों के अध्ययन में इसे कैसे इसे महत्व दिया जा सकता है.

क्या किसी व्यक्ति की सामाजिक और राजनीतिक सोच या व्यवहार को संख्या में बदला जा सकता है? और यदि कर भी दिया जाए तो क्या उसके पूर्वाग्रह से मुक्त होने का दावा किया जा सकता है? और सवाल ये भी है कि क्या इस दावे के आधार पर देश में होने वाले चुनावी सर्वेक्षणों को सही माना जा सकता है?

विशालता और विविधता

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यदि थोड़ी देर के लिए हम इस तकनीक को सही मान भी लें तो फिर भी भारत जैसे देश के लिए इसकी सीमाओं को समझना ज़रूरी है. जिस देश में विविधताएँ कम हों वहां तो शायद ऐसे नमूने लेना संभव है जो कि किसी समूह की नुमाइंदगी करते हों. लेकिन जहाँ तरह-तरह की विविधताएँ हैं, वैसे समाज में इसकी संभावना बहुत कम है.

('नेतृत्व में बदलाव चाहते हैं भारतीय')

भारत की विशालता और विविधता को देखते हुए चुनावी सर्वेक्षणों में नमूनों की जितनी बड़ी संख्या ली जा रही है, उस आधार पर आँकड़ों के गणितीय अध्ययन की शाखा सांख्यिकी के नियमों के आधार पर भी उसे स्टैंडर्ड या पर्याप्त मानना उचित नहीं हो सकता है. और उस आधार पर चुनाव के संभावित परिणाम पर बात करना मुश्किल है.

कोई सामाजिक शोध संस्थान यदि चुनाव के दरम्यान सामाजिक अध्ययन के लिए इस सांख्यिकीय तकनीक का उपयोग करे तो इसे समझा जा सकता है लेकिन यदि पार्टियों के जीत हार की संभावनाओं पर बात करे तो ये अनुचित होगा. यदि नमूने इकट्ठा करने की बात को छोड़ भी दें तो एक बात और ग़ौर करने लायक है.

सांख्यिकीय तकनीक

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अब विज्ञान में भी यह माना जाने लगा है कि कुछ प्राकृतिक व्यवस्थाएं भी सरल हो सकती हैं, कुछ जटिल और कुछ बहुत जटिल. सरल व्यवस्थाओं के लिए तो कुछ भविष्यवाणियाँ की जा सकती हैं लेकिन जटिल व्यवस्थाओं के लिए कुछ कहना मुश्किल है और बहुत जटिल व्यवस्थाओं के लिए तो भविष्यवाणियाँ नहीं की जा सकती हैं.

(क्या चल रहा है कांग्रेस के कैम्प में?)

व्यवस्थाओं की सरलता और जटिलता उन बातों पर निर्भर करती है जो कि बदलती रहती हैं. यदि परिवर्तनशील कारकों की संख्या कम है तो व्यवस्था में पेचीदगियां कम होगीं और स्थायित्व ज़्यादा होगा. समाज के बारे में यह माना जाता है कि इसमें परिवर्तनशील कारकों की संख्या ज़्यादा होती है और इसलिए इसे जटिल व्यवस्था के रूप में देखा जाना चाहिए.

जिस समाज में इनकी संख्या अपेक्षाकृत कम होती है तो उसे स्थिर समाज कहा जा सकता है और जिस समाज में इनकी संख्या ज़्यादा हों उन्हें अस्थिर या जटिल समाज कहा जा सकता है. अपेक्षाकृत स्थिर समाज के बारे में सांख्यिकीय तकनीकों के ज़रिए बहुत कुछ कहा जा सकता है क्योंकि उसमें बदलाव की रफ़्तार धीमी होती है.

तेज बदलाव

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लेकिन यदि समाज बहुत जटिल हो और उसमें बदलाव की रफ़्तार तेज़ हो तो किसी छोटी सी घटना के बड़े नतीजे हो सकते हैं. ऐसे में अस्थिरता ज़्यादा होगी और अनिर्णय की स्थिति बनी रहेगी, इसलिए सांख्यिकी से राजनीतिक परिणामों पर पहुँच पाना एक मुश्किल काम होगा.

(जनमत सर्वेक्षणों पर सवाल)

ज़्यादातर समाजशास्त्री इस बात से सहमत होंगे कि भारतीय समाज न केवल बहुत जटिल है बल्कि तेज़ बदलाव के दौर से गुजर रहा है. ज़्यादातर लोग चुनाव को लेकर अनिर्णय की स्थिति में हैं. शीर्ष नेतृत्व में भी भारी बदलाव हो रहा है. पार्टियों का आतंरिक कलह बढ़ गया है. चुनाव के पहले दलबदल की रफ़्तार को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि व्यवस्था अस्थिर है.

ऐसे में चुनावी सर्वेक्षण कहाँ तक हमें नतीजों के क़रीब पहुंचा सकता है, हम समझ सकते हैं. शायद यही कारण है कि ज़्यादातर मामलों में चुनावी सर्वेक्षण ग़लत होते हैं. इसके अलावा चुनावी सर्वेक्षण की इन विधियों में दो और बड़ी समस्याएं हैं: प्रश्न की भाषा और सवाल पूछने वाले की क़ाबिलियत.

सवालों की सूची को वस्तुपरक बनाने के चक्कर में मुश्किल सवालों को आसान कर दिया जाता है, फिर उसके वस्तुनिष्ठ उत्तर खोजे जाते हैं. नतीजतन जनमानस के तह तक पहुँचने के बदले वस्तुनिष्ठता ही उद्देश्य बन जाती है और लोग क्या चाहते हैं, यह सवाल कहीं खो जाता है. फिर शब्दों का चयन और विभिन्न भाषाओं में उसका अनुवाद भी इन चुनावी सर्वेक्षणों पर अपना असर छोड़ते हैं.

बाज़ारीकरण

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और सबसे ज़्यादा समस्या है सर्वेक्षण करने वालों की क़ाबलियत का. कई सर्वेक्षण कम्पनियां साबुन और चुनावी सर्वेक्षणों के लिए एक ही तरह के लोगों का उपयोग करती हैं.

सामान्य सर्वेक्षणों के लिए तो यह चल सकता है लेकिन चुनाव जैसे विवादास्पद सर्वेक्षण के लिए यह कहाँ तक उचित है कहना कठिन है.

कुछ सामाजिक शोध संस्थानों का दावा है कि वे राजनीति शास्त्र के छात्रों से सर्वेक्षण करवाते हैं.

(वामदलों का संकट)

लेकिन राजनीतिक रूप से विवादास्पद माहौल में जवाब देने वाला कितनी ईमानदारी से उत्तर देगा, यह तो शंका का विषय है ही.

कुल मिलाकर इतना कहा जा सकता है कि सर्वेक्षण सामाजिक शोध के लिए कुछ हद तक उपयोगी तरीक़ा हो सकता है या फिर उपभोक्ताओं की पसंद नापसंद को जानने का भी ये एक तरीक़ा भी हो सकता है लेकिन चुनावी परिणामों की पूर्व घोषणा के लिए यह उचित नहीं है.

सच तो यह है कि इसके द्वारा लोगों की उत्सुकता का बाज़ारीकरण किया जा रहा है. क्रिकेट मैच की तरह इसे भी लाभ कमाने का एक माध्यम बनाया जा रहा है. इसे यदि केवल मनोरंजन के लिए रखा जाए तो ठीक है लेकिन जब इसके वैज्ञानिक होने का दावा किया जाता है तो हास्यास्पद लगता है.

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फ़ॉर पॉलिटिकल स्टडीज़ में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं.)

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