सागरनामा 19: सड़कें, समुद्र, सोच और लहरें

  • 9 अप्रैल 2014
सागरनामा केरल

कथाएँ और यात्राएँ एक तरह शुरू होती हैं और उनका समापन भी एक जैसा होता है. सुखांत हों या दुःखांत, दोनों में अगली कथा के बीज और अगली यात्रा के अँखुए निकलने लगते हैं. जीवन इन्हीं के बीच अपनी जगह और सार्थकता तलाश करता है.

हर यात्रा का एक अतीत होता है. जिन यात्राओं की शुरुआत नहीं हुई, उनका भी. हर अतीत निहायत चमकदार और सुंदर गल्प की तरह प्रेरित करने वाला. सात हज़ार किलोमीटर की सड़क यात्रा के बाद सागरनामा भी काकद्वीप पहुँचकर अतीत हो गया.

कोई पन्ने पलटेगा तो उसे नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों की धूल-मिट्टी, सागर की लहरें और ख़ारापन, सैंकड़ों-हज़ारों छोटी कहानियाँ, ख़ुशी, ग़ुस्सा, आकांक्षा और सपनों की बेपनाह कथाएं मिलेंगी. कई सिरे मिलेंगे कि कोई पकड़े और कथा को आगे बढ़ा दे.

सागरनामा के पास पहले भविष्य था, अब अतीत भी हो गया. यह केवल एक कार और चार लोगों का नहीं उन सबका साझा अतीत है, जिनके पास सपने हैं. वैसे भी बिना अतीत वाले भविष्य का कोई अर्थ नहीं रह जाता.

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अतीत और भविष्य

भागवत पुराण में पुरंजननगर की कथा है, जहाँ लोगों के पास सबकुछ था. आलीशान इमारतें, शानदार जीवन, सुखद भविष्य. कमी बस एक चीज़ की थी, उनके पास अतीत नहीं था. इतिहास नहीं था. बिना अतीत वाला पुरंजननगर एक दिन भविष्य के बोझ से दबकर ख़त्म हो गया.

सागरनामा को ऐसा कोई ख़तरा नहीं है. भविष्य उसके पास था और रहेगा, बोझ बने बिना. अतीत उसे पुरंजननगर बनने से बचा लेगा. यह केवल भारत के तटवर्ती क्षेत्र की यात्रा की अवधारणा नहीं बल्कि चार लोगों की व्यक्तिगत कल्पनाओं का भी अतीत और भविष्य है. इसका मन ही मन दोहराया जाना, छूट गईं कथाएं याद करने का तरीक़ा होगा.

सबकुछ तुरंत जान लेने की हड़बड़ी में, उत्साही आँखों वाले दिलनवाज़, अपनी मशीनों की ख़ुद से ज़्यादा हिफ़ाज़त करने वाले शाकिर और स्टियरिंग हाथ में न हों तो दुलकी चाल से चलने वाले सारथी हरविंदर और मैं, 21 मार्च 2014 को दिल्ली से निकले थे. पोरबंदर से समंदर का साथ मिला, जिसके बाद कभी समंदर के साथ, कभी उसके साथ की ख़्वाहिश लिए सागरनामा की टीम सात अप्रैल को दक्षिण 24 परगना में काकद्वीप पहुँच गई.

काकद्वीप से आगे का रास्ता नाव से है. गंगासागर और उसके कलेक्टरगंज तक कार से नहीं पहुँचा जा सकता. हिंद महासागर की इसी बंगाल की खाड़ी के पूर्वी सिरे पर समुद्र से भारत की आख़िरी मुलाक़ात होती है.

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बदलाव की बयार

महात्मा गाँधी की जन्मस्थली पोरबंदर से काकद्वीप तक की यात्रा के दौरान चार जोड़ी आँखों ने जो देखा और ज़ज्‍़ब किया उसका कुछ हिस्सा आप तक पहुँचा है, कुछ धीरे-धीरे पहुँचेगा और कुछ शायद हमारे अंदर ही रह जाए.

जो देखा, यक़ीन दिलाने वाला था कि ठहराव कहीं नहीं है और बहुत कुछ बदल रहा है. मुल्क में और हमारी आँखों में.

रोज़ाना 18 घंटे सड़क पर रहने के बावजूद न यात्रा की थकान हुई न नयापन देखने का सलीका छूटा, न मस्ती में कमी आई. सड़कें, सागर और सोच एक दूसरे को सहारा देते रहे.

यात्रा में सामाजिक बदलाव दिखा लेकिन उस पर ग़ौर करने के लिए थोड़ी और फ़ुर्सत, थोड़ा और वक़्त, थोड़ी और ग़हराई चाहिए. वह क़िस्सा फिर कभी, अभी तो फिलहाल बदलाव की पहली झलक की तस्वीरें ही हैं.

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हाशिए से केंद्र

समुद्र तट से लगे नौ राज्यों-गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, सीमांध्र (पूर्व आंध्र प्रदेश), ओडिशा, पश्चिम बंगाल और तीन केंद्र शासित प्रदेशों दमण-दीव, दादरा नगर हवेली और पुडुचेरी का राजनीतिक तौर पर महत्व काफ़ी है, जहाँ से 269 सांसद चुनकर आते हैं. लोकसभा में पूर्ण बहुमत से केवल तीन कम.

इन राज्यों में कुछ जगह क्षेत्रीय लहरें हैं, मसलन सीमांध्र, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में. गुजरात में बीजेपी का उफान और बाक़ी जगह लोकसभा चुनाव का मैदान सबके लिए खुला है. कहीं बराबरी का, तो कहीं उन्नीस-बीस. इन सबको जोड़ दें तब भी कोई राष्ट्रीय लहर नहीं बनती.

दिल्ली इन तटीय और राजनीतिक लहरों से बहुत दूर है. किसी को भी ये मुग़ालता हो सकता है कि लहर बहुत ऊँची है और उसी के पाँव पखारने आ रही है.

सागरनामा हाशिए से केंद्र को देखने का प्रयास था जो हो सकता है केंद्र से केंद्र को देखने वालों को रास न आए. हाशिया सिंदबाद जहाज़ी की कहानी नहीं जानता. उसका अपना कटामारान है.

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