मैं फ़िलासफ़र नहीं हूंः गुलज़ार

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एक शायर जो पिछले 50 सालों से लिख रहा हो, लोगों का प्यारा बना हुआ हो तो उसके बारे में कुछ लिखने में कई मुश्किलें हैं. कुछ भी लिख दो, बहुत कुछ छूट ही जाएगा. तबीयत और तरबीयत से शायर ये शख़्श हिन्दी सिनेमा को मिल तो गया, लेकिन उतने में उसकी समाई न हुई.

वो साहित्य में भी उतनी ही दखल रखता है जितनी कि सिनेमा में. वो उतना ही उम्दा निर्देशक है जितना उम्दा लेखक. यह शायर संपूर्ण सिंह कालरा उर्फ़ गुलज़ार बंटवारे में पाकिस्तान से भारत आया तो ज़रूर, लेकिन अज़ब बात यह है कि उसके लिखे में कहीं कोई बड़ा रंज नहीं.

उसे कभी तेज़ ग़ुस्सा नहीं आता. 'लगा दो आग चिलमन को..' टाइप गीत उसने कभी नहीं लिखे.

अस्सी के होने से कुछ साल पहले वो लिख रहा था, 'दिल तो बच्चा है जी' और जवानी में उसने ही हिन्दी सिनेमा में सबसे पहले आँखों की ख़ुशबू को महसूस किया और लिखा, 'हमने देखी है उन आंखों की महकती ख़ुशबू, हाथ से छूकर इसे रिश्तों के इल्ज़ाम न दो.'

उस दौर के कई शायरों को लगा कि ये नया शायर तो थोड़ा बेअदब है...जो आंखों की गहराई, रोशनी, चमक, की बजाय उनमें ख़ुशबू ढूंढ रहा है, लेकिन वो शायर तो कुछ ऐसा ही था, जिसने शायद हिन्दी सिनेमा में पहली बार एक स्त्री मन को पढ़ा, आधुनिक स्त्री मन को.

वरना, उससे पहले किसने स्त्री की मनोरचना में किसी पुरुष के कांधे के एक तिल की जगह को पहचाना था? उससे पहले के शायर तो स्त्रियों के ही तिल निहारते आ रहे थे.

सादगी

गुलज़ार से पहले हिन्दी शायरी (चाहे फ़िल्मी हो ग़ैर-फ़िल्मी) बड़ी ही मर्दवादी किस्म की शायरी थी. शायद ही किसी ने स्त्री मन को इतनी बारीकी से पढ़ा होगा, जितना इस एक आदमी ने पढ़ा है. पढ़ा कहना शायद ग़लत होगा, इस शायर ने स्त्री मन को सबसे अधिक महसूस किया है.

इसके बावजूद, बीबीसी से हुई एक बातचीत में उसने कहा था, “मैं कोई फ़िलोसॉफ़र नहीं हूं. मेरे दिमाग़ में बहुत ज़्यादा नहीं है लेकिन दिल में है, इसलिए महसूस ज़्यादा करता हूं और सोचता कम हूं.”

हमेशा चौड़े पांयचे वाला सफ़ेद पायजामा और कुर्ता पहनने वाला यह शायर कभी ऊबता नहीं. उसे हमेशा एक ही तरह के कपड़ों में देखकर ख़्याल आता है कि ऐसी भी क्या सादादिली, लेकिन अगर वो इतना सादादिल न होता तो, शायद गुलज़ार न होता.

वो चाहे कितना भी बड़ा नामवर-नामचीन शख़्सियत हो गया हो, ख़ुद को लेकर हमेशा एक सयास एहसास-ए-कमतरी बनाए रखता है. ये उसकी शाइस्तगी ही है कि सार्वजनिक मंच पर वो कह सकता है, "मेरी वाइफ कहती हैं कि अगर तुम राइटर न होते तो बड़े ही आर्डिनरी आदमी होते."

उसके पास अपने हर एहसास को कहने का एक बड़ा ही नर्म लहज़ा है. अगर वो तल्ख़ भी होता है तो भी बहुत ही तहजीब के साथ. वो अदब जीता है इसलिए उसे बेअदबी नहीं सुहाती.

बेबाक

फ़िल्मी दुनिया में एक वही है जो एक बेस्ट सेलर लेखक को शब्दों के शऊर-बेशऊरी पर सरेआम डांट सकता है.

वो बच्चों के लिए कहानियाँ लिखता है. ऑस्कर, ग्रैमी, पदम पुरस्कार, राष्ट्रीय पुरस्कार और न जाने कौन कौन से दूसरे इनाम-ओ-इकराम जीत चुका है.

हिन्दी-उर्दू-बांग्ला-पंजाबी समेत तमाम भाषाएँ उसकी रगों में बहती हैं. वो खुद कहता है कि मैं ग़ालिब की पेंशन खा रहा हूँ. वो ख़ुद कहता है मेरे उस्ताद शैलेंद्र जो कुर्सी छोड़ गए थे मैं उसके बगल में खड़ा हूँ, बैठने की हिम्मत नहीं होती.

लेकिन उसका सबसे साफ़ अक्स उभरता है उसकी खुद की बनाई फ़िल्मों में. मन के भूगोल का यह सैलानी उसके कोने-कोने क़तरे-क़तरे से वाक़िफ दिखता है, लेकिन उसमें उनको लेकर भी कोई लालच नहीं.

फ़िल्में बनाने वक़्त शायद वो तोल्सतोय हो जाता है, जो कहते थे, तब तक मत लिखो जब तक तुम उसे लिखे बिना रह सकते हो. शायद उसने उतनी ही फ़िल्में बनाईं जितनी बनाए बिना वो रह नहीं पाता.

हिन्दी सिनेमा में आज भी ग़ालिब, शैलेंद्र, बिमल रॉय, एसडी बर्मन की विरासत को अपने कंधे पर उठाए यह सफ़ेद लिबास शफ़्फ़ाफ़ ख्याल शायर जो भी लिखता है उससे पिछले 50 सालों से उसके चाहने वालों को, 'शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा.'

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