झूठ का सहारा लेने वाला कैसे पीएम बनेगा: उर्दू मीडिया

  • 13 अप्रैल 2014
नरेंद्र मोदी इमेज कॉपीरइट Reuters

पाकिस्तान के उर्दू अख़बारों में जहां चरमपंथी हिंसा की एक नई लहर का ज़िक्र है तो भारत में हो रहे चुनावों पर भी वहां चर्चा हो रही है जबकि भारत में नरेंद्र मोदी की ओर से हलफ़नामे में ख़ुद को शादीशुदा बताए जाने पर ख़ूब टीका टिप्पणी हो रही है.

दिल्ली से छपने वाले हमारा समाज ने लिखा है कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर यह आरोप तो लगेगा कि उन्होंने एक महिला को उसके अधिकार से वंचित रखा.

अख़बार सवाल करता है कि जब मोदी शादीशुदा हैं तो वो 2001 से 2012 तक दिए अपने हलफ़नामों में झूठी जानकारी क्यों देते रहे. क्या ऐसा व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री बन सकता है जो अपने हलफ़नामे में झूठ का सहारा लेता हो.

सत्ता और गृहस्थ

इसी पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय सहारा लिखता है कि अमरीका में वही व्यक्ति राष्ट्रपति बन सकता है जो शादी शुदा हो, जिसकी पत्नी उसके साथ रहती हो, जिसने अपनी पत्नी को छोड़ा न हो और जिसके बच्चे और हंसता खेलता परिवार हो.

वहां माना जाता है कि जो व्यक्ति परिवार को संभालने और पालने की क्षमता रखता है, वो देश को भी संभाल सकता है. अख़बार कहता है कि भारत में अब तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए हैं वह सभी घर गृहस्थी वाले थे.

सिर्फ़ अटल बिहारी वाजयेपी इसके अपवाद हो सकते हैं लेकिन उन्होंने भी एक लड़की को गोद लिया और अब वही उनकी वारिस हैं. इसलिए अख़बार कहता है कि उन्हें भी परिवार वाला ही समझा जा सकता है. अख़बार के अनुसार देश का नेतृत्व करने के लिए परिवार वाला होना कोई लिखित नियम तो नहीं है, लेकिन इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता है.

वहीं हिंदोस्तान एक्सप्रेस ने 10 अप्रैल को हुए मतदान में मुज़फ़्फ़रनगर के दंगा पीड़ितों की भागीदारी पर संपादकीय लिखा है. अख़बार कहता है कि दंगों के बाद शिविरों में रह रहे ये लोग पहली बार अपने गांव वोट डालने गए. लगभग 50 लोग उन जगहों पर गए जहां कभी उनके घर थे लेकिन आज बर्बादी के निशानों के सिवाय कुछ नहीं है.

अख़बार कहता है कि अपने कुटबा गांव पहुंचे ये लोग सहमे हुए थे लेकिन देश को एक अच्छी सरकार देने के लिए वह अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा करने पहुंचे.

तालिबान ने की निंदा

रूख़ पाकिस्तान का करें तो प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के चीन दौरे के सिलसिले में नवाए वक़्त ने लिखा है कि पाकिस्तान इस समय जिस तरह अंदरूनी और बाहरी चुनौतियों का सामना कर रहा है उनसे निपटने में चीन पाकिस्तान दोस्ती बेहद काम आ सकती है.

पाकिस्तानी की बेबसी का ज़िक्र करते हुए अख़बार लिखता है कि वह ईरान के साथ गैसपाइप लाइन पर इसलिए काम नहीं कर रहा है क्योंकि उसे डर है कि अमरीका कहीं नाराज़ न हो जाए जबकि अब अमरीका ख़ुद ईरान के साथ रिश्ते बेहतर कर रहा है, लेकिन इसके चलते सऊदी अरब पाकिस्तान के और क़रीब आ रहा है.

अख़बार चीन की बढ़ती ताक़त को देखते हुए उससे रिश्तों को लगातार बढ़ाने पर जोर देता है.

इमेज कॉपीरइट AP

रोज़नामा एक्सप्रेस का संपादकीय है- दहशतगर्दी की नई लहर. अख़बार के मुताबिक़ इस्लामाबाद की सब्ज़ी मंडी में हुए धमाके ने 24 लोगों की जान ले ली जबकि इससे पहले रावलपिंडी जाने वाली जाफ़रा एक्सप्रेस में धमाके में 17 लोग जिंदगी से हाथ धो बैठे.

अख़बार के मुताबिक़ तालिबान ने इन हमलों की निंदा की है और निर्दोष लोगों को निशाना बनाने को नाजायज़ और हराम बताया है. तालिबान प्रवक्ता के मुताबिक़ उनके नाम पर कोई और हमले कर रहा है.

सरकार के साथ जारी बातचीत के मद्देनज़र तालिबान ने अस्थायी संघर्षविराम की घोषणा कर रखी है ऐसे में अख़बार कहता है कि इस बात की ज़िम्मेदारी अब सरकार के ऊपर आती है कि पता लगाए कि फिर कौन ये हिंसा का खेल खेल रहा है.

हल को कश्मीर मसला

पाकिस्तान में आटे की बढ़ती कीमतों पर दैनिक वक़्त ने अपने संपादकीय पन्ने पर एक कार्टून बनाया है जिसमें एक फटे हाल व्यक्ति पंख लगा कर उड़ रही आटे की बोरी के पीछे भाग रहा है.

नवाए वक़्त कहता है कि पंजाब प्रांत में आटा मिलों की हड़ताल से आटे की किल्लत पैदा हो सकती है जबकि मुनाफ़ाख़ोरों ने पहले ही उसके दाम प्रति किलो एक रुपया बढ़ा दिए हैं.

इमेज कॉपीरइट Reuters

पाकिस्तान मीडिया में पड़ोसी देशों में चुनावी प्रक्रिया पर भी ध्यान दिया गया है. जंग लिखता कि अफ़ग़ानिस्तान और भारत में नई सरकारें बनने के बाद तीनों देशों को नए सिरे से क्षेत्रीय और दोतरफ़ा मसलों को हल करने का मौक़ा मिलेगा.

भारत के बारे में अख़बार लिखता है कि वहां चुनावी गरमा-गरमी में पाकिस्तान का ज़िक्र होना नई बात नहीं है लेकिन पाकिस्तान इस बारे में निष्पक्ष है. अब सरकार चाहे बीजेपी की बने या फिर कांग्रेस की, पाकिस्तान उसका स्वागत करेगा.

अख़बार आगे लिखता है कि पाकिस्तान दक्षिण एशिया में स्थायी अमन चाहता है लेकिन जम्मू कश्मीर समस्या हल किए बिना इस दिशा में कोई प्रगति होना मुमकिन नहीं है. इसलिए नई सरकार से उम्मीद है कि वह डेढ़ अरब लोगों के हित में कश्मीर पर बातचीत की प्रक्रिया को शुरू करेगी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार