'भ्रष्टाचार की चिंता करें या बेरोज़गारी की'

बीबीसी हैंगआउट

“गाँवों में बसने वाला भारत ये समझ ही नहीं पाया कि वो भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन में शामिल हो या अपने बेरोज़गार होने की चिंता करे.”

आज जबकि आम चुनाव में भ्रष्टाचार का मुद्दा इतना ज़ोर-शोर से छाया हुआ है बंगलौर के एक छात्र का ये बयान सोचने पर मजबूर करता है कि क्या गाँव और शहर में भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर सोच इतनी अलग है?

मगर जवाब भी एक छात्र से ही मिला. “चुनाव में मुद्दे भले ही और भी हों मगर भ्रष्टाचार का मुद्दा हर मुद्दे को प्रभावित करता है. सरकार भले ही जनता को फ़ायदा पहुँचाने वाली नीतियाँ बनाए मगर जिन्हें इसे जनता तक पहुँचाना है वे ही भ्रष्ट हैं और सिर्फ़ अपने बारे में सोचते हैं.”

मौक़ा बंगलौर के नेशनल लॉ स्कूल ऑफ़ इंडिया विश्वविद्यालय में बीबीसी हिंदी के चुनाव पर केंद्रित कार्यक्रम बीबीसी कैंपस हैंगआउट का था.

तिरंगा- रंगों से गाल पर, कपड़े के रूप में सिर पर या हाथों में डंडे पर चढ़ा हुआ. भारतीय युवा ने जब भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन को अपने हाथों में थामा तो उसने खुलकर अपना जज़्बा दिखाया. पर अब जबकि सरकार ने लोकपाल और लोकायुक्त क़ानून पास किया है तो बिना किसी लाग-लपेट इन युवाओं ने उससे असहमति जताने में भी हिचक नहीं दिखाई है.

‘सुबह की चाय के साथ घोटाला’

एक छात्रा श्रद्धा चौधरी का कहना था, “सुबह की चाय के साथ नया घोटाला आज की ज़िंदग़ी का हिस्सा बन गया है. युवाओं में आज बदलाव का एक जज़्बा है मगर ज़रूरी नहीं कि ये बदलाव लोकपाल से आए.”

वह कहती हैं, “देश में अब भी क़ानून का एक ढाँचा है मगर किसी ने उसे ज़मीनी स्तर तक पहुँचाया ही नहीं. अगर मौजूदा क़ानून का लाभ लोगों को नहीं मिल रहा तो क्या गारंटी है कि नए क़ानून का फ़ायदा होगा?”

एक अन्य छात्र दीपांकर ने ख़ुद आम लोगों को इसके लिए कटघरे में खड़ा किया. उन्होंने कहा, “हम 2011-12 में इस आंदोलन के लिए खड़े हुए थे मगर आज हम क्या कर रहे हैं. आज भी लाइसेंस की लंबी लाइन से बचने के लिए हम 500 रुपए देते हैं, दलालों के पास जाते हैं. मध्याह्न भोजन का अनाज आज भी प्रधानों और आँगनबाड़ी की बहन जी के घर पर पड़ा रहता है. हम भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन करते हैं और फिर उसी में शामिल होते हैं.”

‘लोकपाल में दलितों की चिंता’

साथ ही दीपांकर ने इसमें जातिगत मुद्दे को भी जोड़ा. दीपांकर का कहना था, “हम अगर लोकपाल के लिए कोई समिति बनाते हैं तो क्या उसमें दलितों का समुचित प्रतिनिधित्व होगा? क्या उन्हें उससे न्याय मिलेगा?”

उन्होंने कहा, “आशीष नंदी ने कुछ समय पहले कहा था कि दलित और पिछड़े वर्ग के लोग सबसे भ्रष्ट होते हैं. मैं कहूँगा कि हाँ क्योंकि उसके अलावा कोई चारा भी तो नहीं है. दफ़्तरों में जाइए तो ऊँची जाति वाले काम ही नहीं करेंगे तो हम कहेंगे कि अच्छा 500 रुपए ले लो मगर काम कर दो. हमें करना पड़ता है ऐसा.”

एक छात्र प्रखर ने इस संबंध में सुझाव दिया सरकारी कर्मचारियों को बेहतर सुविधाएँ दिलवाने का.

उनका कहना था, “पुलिस वालों और अन्य सरकारी कर्मचारियों को बाज़ार के हिसाब से तनख़्वाह मिलनी चाहिए. इतने छोटे वेतन में पुलिस वाला काम करेगा कैसे? सिर्फ़ भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून बनाने से कुछ नहीं होगा. हमें सुविधाएँ भी बेहतर करनी होंगी.”

वहीं राखी ने राजनीतिक दलों की ओर उंगली उठाई. उन्होंने पूछा, “राजनीतिक पार्टियाँ ख़ुद सूचना के अधिकार के दायरे में क्यों नहीं आना चाहतीं. क्या उन्हें डर है कि हम उनसे कुछ ऐसे सवाल पूछेंगे जिनके जवाब उनके पास नहीं होंगे?”

क़ानून के छात्र-छात्राओं के बीच जाकर भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून की बहस ने इस क़ानून की पड़ताल का मौक़ा दिया. इन छात्र-छात्राओं की राय में ये साफ़ था कि सिर्फ़ क़ानूनों से समाज का भ्रष्टाचार दूर नहीं किया जा सकता. इसके लिए ज़रूरी है समाज के भीतर से बदलाव और युवा वर्ग राजनीतिक दलों पर इस मामले में पैनी नज़र बनाए हुए है.

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