'दिल में दुख लेकर असम से निकल रहे हैं'

जीवनाथ, असम के प्रवासी मज़दूर

विवेक एक्सप्रेस के लामडिंग पहुंचने पर मुझे जनरल डिब्बे में जीवनाथ सरकार मिल गए.

जीवनाथ असम के कार्बी आंग्लांग ज़िले के रहने वाले हैं. अपने परिवार को पीछे छोड़कर केरल के एर्नाकुलम जा रहे हैं.

उनसे जब पूछा कि वो एर्नाकुलम में क्या करेंगे तो उन्होंने बताया, "कंपनी में कुछ काम करेंगे, ड्राइविंग के लिए हमें बुलाया है. असम में पैदाइश से रहा हूं लेकिन असम में कुछ नहीं मिला."

वे बताते हैं, "न राशन कार्ड मिला, न जॉब कार्ड, न घर, हमारी तनख़्वाह भी ऐसी नहीं है कि घर चला सकें. इसलिए हमारे परिवार ने फ़ैसला किया कि हम केरल जाएं."

जीवनाथ के परिवार में उनकी पत्नी है, दो बेटियां हैं, बेहद कम आमदनी के बावजूद वो अपनी दोनों बेटियों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ा रहे हैं.

जीवनाथ कहते हैं - दोनों बेटियां इंग्लिश मीडियम में पढ़ती हैं. उन्हें पढ़ाने का काम जारी रखा है ताकि उनकी लाइफ़ बना सकें.

भाषा की दिक्कत

जीवनाथ कार्बी आंग्लांग में गाड़ी चलाते थे तो एक दिन के एक सौ बीस रुपए मिलते थे. उन्हें उम्मीद है कि केरल में कम से कम चार सौ रुपए मिलेंगे. अपने दस-पंद्रह साथियों के साथ वो एर्नाकुलम रवाना हुए हैं.

मैंने उनसे पूछा कि केरल में सब मलयालम या इंग्लिश बोलते हैं, ऐसे में वो काम कैसे चलाएंगे.

उन्होंने कहा, "हम इस देश के हिंदीभाषी हैं, हिंदी से ही काम चला लेंगे. थोड़ी इंग्लिश समझ लेते हैं."

बात चुनाव की ओर मुड़ी तो जीवनाथ का ग़ुस्सा फूट पड़ा. वो बोले, "पहले तो हम कांग्रेस को देते थे, अब बीजेपी में आए हैं."

राशन कार्ड नहीं मिला

वे कहते हैं, "गवर्नमेंट सर्विस करने वालों को राशन कार्ड मिला है, वो चालीस पचास किलो अनाज ले जाते हैं. लेकिन हम ग़रीब रोज कमाते हैं रोज खाते हैं लेकिन हमें एक भी राशन कार्ड नहीं मिला. इसलिए हम दिल में दुख लेकर असम से निकल रहे हैं"

पलायन कर रहे आदिवासियों को अक्सर ठगा जाता है. जीवनाथ ने भी एक चिट फंड कंपनी में पैसे लगाए थे लेकिन कंपनी ने पैसे नहीं लौटाए.

यहां तक कि एर्नाकुलम जाने के लिए फरकटिंग स्टेशन पर रेलवे क्लर्क ने उनसे 525 रुपए के टिकट के 535 रुपए ले लिए.

मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने विरोध क्यों नहीं किया तो बोले, "हमने सोचा कि ये असम का उसूल हो सकता है इसलिए हम चुपचाप रह गए."

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