जहां महिलाएं हैं संख्या में भारी, पर सियासत में कम भागीदारी

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"तमाम विपरीत परिस्थितियों में इंटर तक पढ़ाई पूरी कर ली लेकिन उसके बाद वक़्त ने जीने का ज़रिया ढूंढ़ने को विवश कर दिया. अभावों में करती क्या, सिलाई सीखी और तब से मशीन के साथ जिंदगी भी जैसे मशीनी हो गई है. आदिवासी हूं. जंगलों, पहाड़ों से करीब के रिश्ते रहे हैं. इसलिए जल्दी घबराती नहीं."

यह हैं मेरी हस्सा. आदिवासी इलाक़े खूंटी की एक ग्रामीण हाट में हम उनके सामने थे. हमने सिर्फ़ एक सवाल किया था: आप वोट देंगी और इस पेशे से कैसे जुड़ीं?

वह गंवई अंदाज में बोलीं, "वोट तो देंगे, लेकिन आदिवासी महिलाओं की तरक्क़ी के बारे में सोचता कौन है. रही बात पेशे की, तो गांवों की महिलाओं की परेशानी देख ही हमने इसे चुना."

संख्या बल

वाकई मेरी हस्सा के सवाल-जवाब में कई बातें और तथ्य निहित थे. उनमें ख़ास यह कि आदिवासी महिलाएं चुनावों में अपने को कहां खड़ा पाती हैं.

दरअसल मतदाताओं के हिसाब पर ग़ौर करें, तो झारखंड में सामान्य वर्ग की तुलना में आदिवासी इलाक़ों में महिला वोटरों की संख्या कहीं ज्यादा हैं. आदिवासियों के लिए सुरक्षित तीन विधानसभा क्षेत्र पोटका, मंझगांव और लिट्टीपाड़ा में महिला वोटर पुरूष मतदाताओं की तुलना में ज्यादा हैं.

मतलब एक जनप्रतिनिधि चुनने में उनकी भूमिका अहम है. लेकिन उनकी जिंदगी, तरक्की के सवाल कहीं पीछे खड़े हैं.

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झारखंड में लोकसभा की 14 और विधानसभा की 81 सीटें हैं. इनमें लोकसभा की पांच – चाईबासा, राजमहल, खूंटी, दुमका व लोहरदगा आदिवासियों के लिए सुरक्षित हैं.

संसदीय चुनावों के इतिहास में सिर्फ़ दो आदिवासी महिलाएं ही सांसद बनीं. इनमें लोहरदगा से कांग्रेस की सुमति उरांव और खूंटी से सुशीला केरकेट्टा दो–दो बार चुनाव जीतीं.

इनके अलावा वर्तमान में झारखंड विधानसभा की 81 में से 28 सीटें आदिवासियों के लिए सुरक्षित हैं.

इनमें सिर्फ़ दो आदिवासी महिलाएं - जगरनाथपुर से गीता कोड़ा और पोटका से मेनका सरदार विधायक हैं. गीता कोड़ा अभी चाईबासा से संसदीय चुनाव लड़ रही हैं.

पंचायत प्रतिनिधि हरि हास्सा कहती हैं कि आप झारखंड के जिस आदिवासी इलाकों में जाएं, एक बात साफ़ दिखेगी कि घर-गृहस्थी चलाने में आदिवासी महिलाओं की भूमिका अहम है.

वनोत्पाद चुनने से लेकर, साग-सब्ज़ी की खेती करने या खाने-पीने के सामान घरों में पकाकर उसे बाज़ारों में बेचने या फिर बाल-बच्चों की परवरिश करने की ज़िम्मेदारी भी आदिवासी महिलाएं बख़ूबी निभाती हैं.

लेकिन विकास के पैमाने और सामाजिक, आर्थिक स्थिति के पैमाने पर वे काफी पीछे हैं. हास्सा खुद भी परचून की दुकान चलाती हैं.

खूंटी से लोकसभा का चुनाव लड़ रहीं निर्दलीय उम्मीदवार आश्रिता टूटी और दुमका से भाकपा माले के टिकट पर चुनाव लड़ रहीं बिटिया माझी के विचार लगभग समान हैं.

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वे कहती हैं कि आदिवासी महिलाओं की राजनीति में भागीदारी बढ़ाना सबसे जरूरी है.

वोट किसे देना है और इसका आधार क्या होगा? इस बारे में भी आदिवासी औरतें ख़ुद निर्णय नहीं ले पातीं. महज वोट बैंक के रूप में उनका इस्तेमाल किया जाता है.

किसी के एजेंडे में नहीं

ज्योत्सान डांग एक आदिवासी महिला पत्रकार हैं. वे बताती हैं कि आदिवासी महिलाओं के बीच शिक्षा, स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार करना और रोज़गार मुहैया कराना सबसे ज़रूरी है. महिला पलायन बड़ी समस्या है.

वह कहती हैं कि आदिवासी समुदायों में हड़िया (चावल से बने मादक पेय) को जीवन, संस्कृति से जोड़कर भले ही देखा जाता है, लेकिन उनकी समझ है कि हड़िया के निर्माण व बिक्री के इर्द- गिर्द ही आदिवासी महिलाओं का एक हिस्सा सिमट कर रह गया है.

राज्य सरकार के आंकड़े बताते हैं कि आदिवासी इलाकों में महिला साक्षरता अब भी सामान्य वर्ग की तुलना में कम है. मसलन दुमका में महिलाओं की साक्षरता दर 48.82, साहेबगंज में 43.31, पाकुड़ में 40.52, चाईबासा में 46.29, खूंटी में 53.69, गुमला में 53.90 फीसदी है.

करीब 67 फीसदी आदिवासी महिलाओं संस्थागत प्रसव नहीं करा पातीं. 76 फीसदी महिलाएं एनिमिया या ख़ून की कीमी से पीड़ित हैं.

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आदिवासी मामलों के शोध विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री डॉ. रमेश शरण कहते हैं कि स्वायतत्ता के मामलों में आदिवासी महिलाओं की स्थिति बेहतर है. लेकिन स्वशासन, संपत्ति के अधिकार, पांरपरिक व्यवस्था में उन्हें हाशिए पर रखा जाता है.

परंपरागत ग्राम-सभाओं में भी उनकी भूमिका गौण है. जबकि लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत चुनावों में वह वोट के अहम हिस्से हैं.

शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में वह काफी पीछे हैं जबकि डायन बिसाही, हिंसा, विस्थापन के सवाल आदिवासी महिलाओं के विकास को लगातार प्रभावित कर रहे हैं. फिर भी चुनावों में ये सवाल हाशिए पर रह जाते हैं.

आदिवासियों के बीच काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता रतन तिर्की कहते हैं कि पलायन और मानव तस्करी, विस्थापन-पुनर्वास झारखंड की बड़ी समस्या हैं लेकिन चुनावों में आदिवासी महिलाओं के मुद्दे किसी दल के एजेंडे में शामिल नहीं होते.

अलबत्ता क्षेत्रीय दल भी सिर्फ चोंचलेबाजी करते हैं. हर साल सीज़नली कम-से-कम पांच लाख आदिवासी महिलाएं रोजगार के लिए पलायन करती हैं, लेकिन इसकी भी चर्चा चुनावों में नहीं होती.

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