'चायवाला' मोदी: किसकी चाय, किसकी चर्चा!

  • 21 अप्रैल 2014

कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने जब नरेंद्र मोदीपर चुटकी लेते हुए उन्हें चायवाला कहा तो शायद उन्हें इस बात का अंदाज़ा भी नहीं होगा कि भारतीय जनता पार्टी मोदी के इस 'अपमान' को चुनाव 2014 के सबसे बड़े डिजिटल कैंपेन में बदल देगी.

इस बयान के बाद नरेंद्र मोदी के प्रचार अभियान में जुटी संस्था कैग यानी 'सिटिज़न्स फॉर एकाउंबिलिटी एंड गर्वनेंस' तुरंत हरकत में आई और अगले कुछ महीनों में भारत के 500 से ज़्यादा शहरों में एक हज़ार से ज़्यादा चाय की दुकानों पर जनता और नरेंद्र मोदी को 'चाय पे चर्चा' के लिए जोड़ दिया गया.

'चाय पे चर्चा'

चार फरवरी को भाजपा ने इस डिजिटल अभियान की शुरुआत की. कैंपेन लॉन्च होने के कुछ ही घंटों में 'चाय पे चर्चा' का वीडियो और थीम सॉन्ग इंटरनेट पर वायरल हो गया और पहले ही दिन लगभग 20,000 लोगों ने इंटरनेट पर इसे देखा. 'चाय पे चर्चा' की रिंग टोन भी अब डाउनलोड के लिए उपलब्ध है.

'चाय पे चर्चा' को दुनियाभर में चुनाव 2014 के सबसे लोकप्रिय डिजिटल अभियान के रूप में देखा जा रहा है. मार्केटिंग संस्थान इस अभियान की लोकप्रियता पर अध्ययन में जुट गए हैं.

लेकिन ऑनलाइन छाए रहने वाले ये डिजिटल चुनावी कैंपेन क्या ऑफलाइन भी उतने ही कारगर हैं? जिस आम आदमी तक पहुंचने की ये सारी कवायद है क्या वो वाकई इन्हें देख रहा है?

सबसे बड़ा डिजिटल चुनाव

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चुनावी माहौल में तकनीक के गढ़ बंगलौर की यात्रा के दौरान इन सवालों के जो जवाब मुझे मिले वो इंटरनेट पर जंग में जुटी पार्टियों के लिए शायद सुखद न हों.

कैग की वेबसाइट के मुताबिक बंगलौर में 400 कार्यकर्ताओं ने 23 इलाकों में 'चाय पे चर्चा' का आयोजन किया. विज्ञापन शैली में बनाए इन चायवालों के वीडियो और छोटी-बड़ी तमाम क्लिप कैग सहित, यू-ट्यूब, फेसबुक और सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं.

बंगलौर में हमने इनमें से आठ अलग-अलग इलाकों का दौरा किया लेकिन हम न तो वो चाय की दुकानें ढूंढ पाए जहां कई सौ की भीड़ जुटने के दावे हैं और न दूर-दूर तक लोगों को इस आयोजन के बारे में कोई जानकारी थी.

ऑनलाइन या ऑफलाइन?

बंगलौर के शिवाजी बस स्टॉप इलाके में बार-बार पूछने पर एक आदमी ने झुंझलाकर कहा, ''हम तो पहली बार आपसे ही चाय पे चर्चा की बात सुन रहे हैं. मोदी का नाम तो हमने सुना है पर ये चर्चा क्या है.''

दो दिन की मेहनत के बाद बंगलौर के गांधीनगर इलाके में आख़िरकार हमें एक चौराहा मिला जहां बड़े-बड़े स्क्रीन लगाए गए थे और वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग हुई, लेकिन कहानी वहां भी कुछ और ही थी.

चौराहे पर दुकान चलाने वाले एक शख़्स ने बताया, ''जिस चायवाले के ठेले को चर्चा से जोड़ा गया था वो यहां का नहीं था, उसे तो कहीं और से लेकर आए थे. भीड़ तो जुटी थी लेकिन हम कोई सवाल नहीं पूछ पाए. पहले मोदी जी बोले फिर और लोग बोले जब तक हमारे सवाल का नंबर आया कनेक्शन कट चुका था.''

सोशल मीडिया और चुनाव

Image caption ''हम तो पहली बार आपसे ही चाय पे चर्चा की बात सुन रहे हैं. मोदी का नाम तो हमने सुना है पर ये चर्चा क्या है- शिवाजी नगर बस स्टॉप.''

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में 2014 का आम चुनाव दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल चुनाव भी है.

उजले कुर्ते और गांधी टोपी पहने राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी इस बार 'बच्चों का खेल' समझे जाने वाले सोशल मीडिया को अपनी किस्मत की कुंजी मान रहे हैं. हर राजनीतिक पार्टी अपनी छोटी-बड़ी डिजिटल सेना के ज़रिए भारत के 24 करोड़ इंटरनेट यूज़र्स को अपने रंग में रंगने के लिए जुटी है.

'इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशल ऑफ इंडिया' की रिपोर्ट के मुताबिक इन चुनावों में 543 में से 160 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें फेसबुक यूज़र्स की संख्या चुनाव नतीजों पर असर डाल सकती है. मोदी की 'चाय पे चर्चा' के दिन तो अब लद गए हैं लेकिन हर दिन नए से नए डिजीटल कैंपेन सामने आ रहे हैं.

लेकिन इंटरनेट पर जो राजनीतिक आंधी चल रही है क्या वो एक गुब्बारा भर है जिसकी हवा ज़मीन पर पहुंचने तक निकल गई है? या फिर सोशल मीडिया और इंटरनेट की अपनी दुनिया है जिस पर कांटे की टक्कर उतनी ही ज़रूरी है जितनी ज़मीनी लड़ाई.

पेशे से ब्रांड कंसलटेंट और डिजिटल कैंपेंज़ की समझ रखने वाले हरीश बिजूर के मुताबिक, ''कैंपेन ऐसा होना चाहिए जो ज़मीनी स्तर पर बहुत मज़बूत हो. फोन, कंप्यूटर और इंटरनेट के ज़रिए डिजिटल कैंपेंज़ घर-घर तक पहुंचते हैं लेकिन चाय पे चर्चा की बात करें तो ये ज़मीनी स्तर पर बहुत फीका रहा है. मेरे हिसाब से ये एक बबल कैंपेन है.''

'स्पॉनटेनियस' या 'बॉट आउट'

तो सोशल मीडिया पर जो चुनावी माहौल सुनाई-दिखाई दे रहा है क्या वो असल ज़िंदगी में असरदार नहीं है?

हरीश कहते हैं, ''इंटरनेट पर दो तरह के चुनावी कैंपेन मौजूद हैं एक वो जो पैसे दे कर ख़रीदे गए हैं और दूसरे वो जो आम लोगों के मन से निकल रहे हैं. इसका कोई प्रामाणिक डेटा नहीं लेकिन मेरे हिसाब से फिलहाल जो 'पॉलिटिकल वॉर' जारी है उसमें भाजपा या कांग्रेस के लगभग 60 फीसदी चुनावी कैंपेन खरीदे गए यानी 'बॉट आउट' हैं. केवल 40 फीसदी चुनाव अभियान ही असली यानी 'स्पॉनटेनियस' लगते हैं. 'बॉट आउट' अभियानों का असर दूर तक नहीं होता.''

लेकिन सवाल सिर्फ ये नहीं कि इंटरनेट पर लड़ी जा रही ये जंग ज़मीन पर इन नेताओं को कितने वोट दिलाएगी. सवाल ये भी है कि इंटरनेट की इस जंग ने पार्टियों और इनके कार्यकर्ताओ को क्या ज़मीन से दूर कर दिया है?

कैग कार्यकर्ता अभिषेक भास्कर के मुताबिक वो जनता की नब्ज़ समझते हैं, ''जो लोग रैलियों में जाकर मोदी को नहीं सुन सकते 'चाय पे चर्चा के ज़रिए हम उनके लिए मोदी को गली-नुक्कड़ तक लाए हैं. ये हो ही नहीं सकता कि जिन चायवालों को या इलाकों को हमने जोड़ा है उन्हें इस आयोजन के बारे में पता न हो या वो इसके समर्थन में न हों.''

चीनी, चाय या नेता

अभिषेक अपने साथ हमें तीन चायवालों के पास ले गए लेकिन एक को छोड़कर बाकि दोनों ने उस आयोजन को देखा भर था.

इधर हरीश बिजूर का इशारा किसी दूसरी ही तरफ है, ''चुनाव 2014 का सच ये है कि 'डिजिटल रिएलिटी' और 'ग्राउंड रिएलिटी' में बेहद फर्क है. राजनीतिक पार्टियों के लिए 'डिजिटल मार्केटिंग' कर रहे लोगों की ज़मीन पर पकड़ और राजनीति की समझ कमज़ोर है. इनमें से कई नेताओं को उसी स्टाइल में बेच रहे हैं जैसे चाय और चीनी बिकती है.''

बंगलौर भारत नहीं और बंगलौर के चार कोनों में चार दुकानों पर अगर लोगों को मोदी की चाय याद नहीं तो इससे कोई बड़े नतीजे निकालना बेवकूफी है. लेकिन एक नतीजा तो हर हाल में निकलता है कि इंटरनेट की आंधी से जनता के दिल में घर करना उतना आसान नहीं जितना कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठ कर लगता है.

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