क्या मोदी ने समाज को विभाजित कर दिया है?

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हाल ही में मेरी एक उदारवादी महिला दोस्त ने मुझसे कहा कि उन्हें नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की बात डरा देती है.

जब मैंने उनके डर जाने वाली बात पर बहुत ज़ोर नहीं दिया तो वो ऊंची आवाज़ में घबराकर कहने लगीं, "आप मुसलमान होकर भी मोदी के आने का ख़तरा महसूस नहीं कर रहे हो? इतना कूल क्यों हैं आप?"

(क्या हिंदुत्व की हवा निकल चुकी है?)

मैंने मुस्कुराते हुए कहा कि मुझे आपने एक पत्रकार दोस्त की बजाय मुसलमान कह डाला है तो मेरा जवाब सुन लीजिए. नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनें या लालकृष्ण आडवाणी मुसलमानों को अधिक फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. मुसलमानों को आडवाणी के मुक़ाबले मोदी से अधिक शिकायत हो सकती है.

लेकिन मोदी के आने से आप जैसे उदारवादियों को ही अधिक दिक़्क़त होगी. आप उनकी विचारधरा के विपरीत छोर पर खड़ी हैं.

मेरी ये दोस्त उदारवादियों की उस श्रेणी में आती हैं जो विचारधारा की इस लड़ाई में अक्सर उसी अनुदारता का शिकार हो जाते हैं जिसके ख़िलाफ़ वे लड़ रहे हैं. इन उदारवादी लोगों की अनुदारता हर ऐसे वक़्त में नमूदार होती है जब उनकी उदारता को ख़तरा महसूस होता है.

'बौद्धिक ब्लैकमेल'

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उनके ख्याल में इस समय नरेंद्र मोदी उनकी उदारता के लिए सब से बड़ा ख़तरा बन कर उभरे हैं तो ऐसे में उनके रैंक से कोई भी मोदी के पक्ष में कुछ भी बोलता है तो वो एक बड़ा गुनहगार क़रार दिया जाता है और उसे हर तरफ से फटकार मिलती है.

(मोदी के तीखे होते हमले)

अब उदाहरण के तौर पर साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाले तमिलनाडु के साहित्यकार जो डिक्रूज़ को ले लीजिए, जिनका एक तमिल उपन्यास अंग्रेज़ी में छपने वाला था. जो डिक्रूज़ की खता ये थी कि उन्होंने अपने फ़ेसबुक पन्ने पर नरेंद्र मोदी को एक दूरदर्शी नेता कहा था और भारत के प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे उचित और दबंग नेता माना था.

इसके बाद उन्हें उनके प्रकाशक एस आनंद की तरफ से एक ईमेल आया जिसमें उनसे कहा गया कि मोदी और फ़ासीवाद का समर्थन करने के कारण वो और उनके उपन्यास का अनुवाद करने वाली महिला उनके बयान का खंडन करते हैं और इसीलिए वो उनकी किताब नहीं छापेंगे.

जो डिक्रूज़ काफ़ी मायूस हुए लेकिन मोदी के प्रति अपने बयान को नहीं बदला. उन्होंने मुझसे कहा, "ये तो एक तरह का बौद्धिक ब्लैकमेल है."

साधारण नागरिक

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आनंद के इस क़दम के बाद जो डिक्रूज़ का मोदी के लिए समर्थन और भी मज़बूत हो गया है जैसा कि उन्होंने मुझे बताया, "मोदी एक मज़बूत और ऊंचे क़द के नेता हैं और मेरा विश्वास है कि भारत उनके नेतृत्व में हिमालय की चोटियों को छूएगा."

(मुसलमान हैं तो क्या घर नहीं मिलेगा?)

जो डिक्रूज़ के अनुसार उन्हें अफ़सोस इस बात का है कि उन्होंने मोदी के बारे में एक 'लेखक के तौर पर नहीं बल्कि एक साधारण नागरिक के रूप' में अपने विचार प्रकट किए थे. उन्होंने कहा, "हमारे विचार समान हों, ऐसा ज़रूरी नहीं. मैं उनके विचार का विरोध तो नहीं कर रहा?"

उन्हें इस बात का भी दुःख है कि इस किताब के 'अनुवाद पर उन्होंने पूरे दो साल लगाए थे जो अब बर्बाद हो गए.' मुंबई के मनोरंजन जगत के एक उदारवादी समूह ने भी वोटरों से अपील जारी की है कि वो अपना वोट केवल धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को ही दें. ज़ाहिर है उनकी अपील मोदी के ख़िलाफ़ वोट डालने की है.

उदारवादियों के भय को समझाते हुए मेरी मोदी-विरोधी दोस्त (जिनका मैंने ऊपर ज़िक्र किया है) कहती हैं कि उन्हें डर इस बात का है कि मोदी के काल में 'हिन्दू तालिबान' सिर न उठा लें.

उन्होंने उदाहरण के तौर पर पांच साल पहले कर्नाटक में भाजपा के काल में उस घटना की याद दिलाई जिसमें राम सेने संस्था के कई कार्याकर्ताओं ने महिलाओं को एक शराबखाने में घुस कर कथित तौर पर मारा था और उनकी सरेआम बेइज़्ज़ती की थी.

'तालिबान मानसिकता'

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उदारवादी लोगों का ये ख़ौफ़ बेबुनियाद नहीं कहा जा सकता. ये सच है कि दक्षिणपंथी हिन्दू विचारधारा ज़ोर पकड़ती जा रही है और इसका असर देखने को साफ़ मिलता है. प्रकाशक पेंगुइन इंडिया ने हाल में अमरीकी लेखिका वेंडी डोनिगर की किताब 'दी हिंदूज़ः एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री फ़्रॉम इंडिया' को हिन्दू दक्षिणपंथी लोगों के दबाव में आकर वापस ले लिया था.

('मिट्टी में मिलना पसंद करेंगे')

इसके बाद अंग्रेज़ी अख़बार 'दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया' ने सुर्ख़ी लगाई, "डोनिगर की किताब का हटाया जाना भारत में तालिबान जैसी मानसिकता के असर को उजागर करती है."

ख़बर आई है कि 'एल्फ' प्रकाशक के सम्पादक रवि सिंह ने, जिन्होंने वेंडी की किताब को पेंगुइन इंडिया के साथ छापा था, अब इस्तीफ़ा दे दिया है. इससे पहले भी कुछ अख़बारों के संपादकों को मोदी-विरोधी होने के इल्ज़ाम के बाद इस्तीफ़ा देना पड़ा है.

लंदन के प्रसिद्ध अख़बार 'द गार्डियन' ने इन पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि भारत में उदारवादियों के लिए जगह सिकुड़ती जा रही है.

उदारवादी विचारधारा

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उदारवादियों का डर अपनी जगह पर जायज़ हो सकता है. इस तरह का भय लालकृष्ण आडवाणी के उदय के समय में भी देखा गया था. आडवाणी के साथ कई उदारवादी लोगों ने हाथ मिलाया था. अटल बिहारी वाजपेयी के ज़माने में भी ऐसा हुआ था और अब मोदी के दौर में ऐसा हो रहा है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं.

(धर्मनिरपेक्ष उम्मीदवारों को वोट)

लेकिन उदारवादी विचारधारा के लोग भी वैसी ही हरकत करें जो तालिबान वाली मानसिकता रखने वाले लोग करते हैं तो उदारवाद और रोशन ख़याल होने का फ़ायदा क्या?

हाँ भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी चुनाव के बाद प्रधानमंत्री बन सकें या नहीं, एक काम तो उन्होंने ज़रूर कर दिया है. ऐसा मालूम पड़ता है कि उन्होंने भारतीय समाज को जाने अनजाने में विभाजित कर दिया है, चाहे वो समाज का साहित्यिक हिस्सा हो या सांस्कृतिक या फिर राजनीतिक.

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