खाद्य सुरक्षा, आरटीई का क्या करेगा एनडीए?

  • 19 अप्रैल 2014
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चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस और यूपीए पर जमकर हमले किए और अब पार्टी को यक़ीन हो गया है कि एनडीए सबसे बड़ा गठबंधन बनकर उभरेगा इसलिए बीजेपी नेता यह बताने लगे हैं कि सत्ता में आए तो वे क्या करेंगे.

पार्टी के कुछ नेता कह रहे हैं कि वे कांग्रेस नीत यूपीए के पसंदीदा कार्यक्रमों को या तो बंद कर देंगे या फिर उनकी समीक्षा करेंगे. इनमें आधार कार्ड योजना, शिक्षा का अधिकार (आरटीई) और खाद्य सुरक्षा विधेयक शामिल हैं.

यह तीनों यूपीए सरकार के सबसे महत्वपूर्ण अधिकार-प्रदान करने वाले कार्यक्रम हैं.

गोवा के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ बीजेपी नेता मनोहर पर्रिकर ने बीबीसी हिंदी से कहा, "सैद्धांतिक रूप से ये कार्यक्रम अच्छे हैं लेकिन यूपीए इनके क्रियान्वयन में नाकाम रहा. हमें आधार कार्ड परियोजना की लागत का आकलन करना होगा ताकि यह तय किया जा सके कि इसे बंद किया जाए, समीक्षा की जाए या संशोधन किया जाए."

'उद्देश्य हासिल नहीं हुआ'

पर्रिकर के विचार पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और बैंगलोर दक्षिण लोकसभा सीट से उम्मीदवार अनंत कुमार से अलग हैं. आईटी क्षेत्र के दिग्गज और पूर्व यूआईडीएआई परियोजना के चेयरमैन नंदन नीलेकणी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ रहे अनंत ने अपने प्रचार में कसम खाई है कि बीजेपी नीत सरकार इस परियोजना को बंद कर देगी.

बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने 17 अप्रैल के मतदान से पहले कर्नाटक में प्रचार करते हुए कहा था कि एनडीए सरकार इसकी समीक्षा करेगी. पर्रिकर और राजनाथ सिंह लगातार राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) की बात कर रहे हैं जिसे एनडीए सरकार ने 2003 में जारी किया था. अनंत कुमार का कहना है कि इसे यूपीए सरकार ने बंद कर दिया था.

इनका कहना है कि अवैध अप्रवासियों को भी आधार कार्ड मिल गया है और इसलिए वे भारत के नागरिक बन गए हैं. इस तर्क की पुष्टि कुछ बांग्लादेशी मज़दूरों के किसी बेशक़ीमती चीज़ की तरह आधार कार्ड दिखाने से भी होती है.

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भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने भी इस पर यह कहकर टिप्पणी की कि कांग्रेस ने अनंत कुमार के ख़िलाफ़ ऐसा उम्मीदवार उतारा है, जिसका "कोई आधार नहीं है."

दूसरी तरफ़ नीलेकणी ने सारी आलोचना को "राजनीतिक बयानबाज़ी" कहकर ख़ारिज कर दिया है. उनका कहना है कि यह कार्ड किसी को नागरिकता नहीं देता सिर्फ़ पहचान देता है.

वह कहते हैं, "यह देश के इतिहास की सबसे परिवर्तनकारी परियोजना साबित होगी. इस संबंध में संसद में विधेयक पेश किया जा चुका है."

लेकिन नीलेकणी के आईआईटी के सहपाठी और दोस्त पर्रिकर कहते हैं, "आधार के लिए कोई क़ानूनी ढांचा तैयार नहीं है. यह तो पहचान की भी गारंटी नहीं देता. लेकिन दिक़्क़त यह है कि ग़लत लोग अब भी इस सिस्टम में मौजूद हैं."

पर्रिकर के अनुसार, "इसे अमरीका के सोशल सिक्योरिटी नंबर की तर्ज पर तैयार किया गया था. लेकिन इससे वह उद्देश्य हासिल नहीं हुआ जिसकी उम्मीद थी."

'सैद्धांतिक रूप से अच्छे'

यूआईडीएआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर कहा, "प्रक्रिया को चुस्त करने के तरीक़े हमेशा होते हैं. हम अब तक 60 करोड़ लोगों तक पहुंच चुके हैं और उन्हें वजीफ़े, आर्थिक सहायता जैसे फ़ायदे मिल रहे हैं. "

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उन्होंने कहा, "यह एक ऐच्छिक योजना है और सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा है कि हमें आधार कार्ड बनाने बंद कर देने चाहिए. कोर्ट ने सिर्फ़ यह कहा है कि इस कार्ड के फ़ायदे सभी को मिलने चाहिए और तब तक इसे अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता."

पर्रिकर कहते हैं, "हो सकता है कि आर्थिक आधार को शामिल कर लिया गया हो लेकिन राष्ट्रीयता की गारंटी कहां है. हो सकता है कि इससे फ़ायदे उन लोगों को मिल रहे हों जो इस देश के हैं ही नहीं."

तो यूपीए सरकार के उन अन्य कार्यक्रमों का क्या होगा जो आम जनता को अधिकार देने वाले हैं?

पर्रिकर कहते हैं, "कोई भी यह नहीं कहता कि सैद्धांतिक रूप से यह कार्यक्रम अच्छे हैं. लेकिन इनका क्रियान्वयन ख़राब है. यह उस ज़रूरत को पूरा नहीं करते जिसके लिए इन्हें तैयार किया गया था. खाद्य सुरक्षा कानून अच्छा है और इसी तरह शिक्षा का अधिकार (आरटीई) भी."

वह कहते हैं, "आरटीई से क्या हुआ? इससे शिक्षा व्यवस्था चौपट हो गई है. लेकिन हमें यूपीए सरकार के कुछ कार्यक्रमों की समीक्षा करनी होगी जो ठीक से लागू नहीं हो पाए."

अपने घोषणापत्र में बीजेपी ने पहले ही ऐलान कर दिया है कि वह मल्टी-ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लागू नहीं होने देगी.

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