‘दस राज्यों में मुस्लिम वोटर निर्णायक स्थिति में’

  • 20 अप्रैल 2014
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पाकिस्तान के उर्दू मीडिया में जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच अहम बैठक, बढ़ती महंगाई और तालिबान से सरकार की बातचीत पर मंडराते आशंका के बादल सुर्ख़ियों में रहे तो भारत में चुनावी सरगर्मियां सभी उर्दू अख़बारों को अपनी गिरफ़्त में लिए हुए हैं

हिंदोस्तान एक्सप्रेस ने अपने संपादकीय में लिखा है कि देश में 10 राज्य ऐसे हैं जहां मुसलमान मतदाता निर्णायक स्थिति में हैं.

इनमें उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, जम्मू कश्मीर, केरल, असम, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश. इन राज्यों में लोकसभा की 360 सीटें हैं जहां 12 करोड़ से ज़्यादा मुसलमान उम्मीदवारों की हार-जीत में अहम भूमिका अदा करेंगे या कर रहे हैं.

अख़बार कहता है कि देश भर में कुल मुसलमान मतदाता 15 करोड़ 25 लाख हैं जिनमें से आधे उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बंगाल और बिहार में रहते हैं. अख़बार के मुताबिक़ इतनी बड़ी आबादी के बावजूद सिर्फ़ 30 या 32 मुसलमान ही लोकसभा में पहुंचते हैं जबकि ये संख्या 60 के आसपास होनी चाहिए.

इसकी वजह बताते हुए अख़बार लिखता है कि मुस्लिम वोट विभिन्न क्षेत्रों में इस कदर बिखरे हैं कि वो तमाम कोशिशों के बावजूद अपने समुदाय के सांसदों की संख्या नहीं बढ़ा सकते हैं.

‘ड्रामे नहीं करता’

वहीं आज समाज ने भारतीय जनता पार्टी में ‘मतभेदों’ को अपने संपादकीय का विषय बनाया है. अख़बार कहता है कि बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह यूं तो एकजुटता से पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का समर्थन करते हैं लेकिन उनके बीच मतभेद भी उभरते दिखते हैं.

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अख़बार लिखता है कि जब पिछले दिनों मुस्लिम धर्मिक नेताओं के एक सम्मेलन में राजनाथ सिंह ने मुस्लिम टोपी पहनी तो इस पर मोदी ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा था कि ‘मैं इस तरह के ड्रामे नहीं करता’.

अख़बार के संपादकीय के अनुसार पहले भी मोदी राजनाथ के कई क़दमों की आलोचना करते रहे हैं. ऐसे में पार्टी भले ही दोनों के मतभेदों पर पर्दा डालने की कोशिश करे लेकिन जो बातें छन छन कर बाहर आती हैं, वो पार्टी की कोशिशों पर पानी फेरती हैं.

राष्ट्रीय सहारा ने अपने संपादकीय में न्यूयॉर्क पुलिस के उस फ़ैसले को सकारात्मक बताया है जिसके तहत मुसलमानों की निगरानी करने वाले विभाग को बंद कर दिया गया है.

अख़बार लिखता है कि अमरीका पर 11 सितंबर 2001 के हमले के बाद अमरीका और यूरोपीय देशों में मुसलमानों के प्रति भेदभाव में अचानक वृद्धि हो गई थी. अब न्यूयॉर्क पुलिस ने ख़ुफ़िया निगरानी यूनिट को बंद कर दिया है तो उम्मीद की जा सकती है कि अमरीका में मुसलमानों के भरोसे को बहाल करने में इससे मदद मिलेगी.

‘सौदेबाज़ी न हो’

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रुख़ पाकिस्तान का करें तो नवाए वक़्त ने पिछले दिनों हुई प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ और पूर्व राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी की मुलाक़ात पर संपादकीय लिखा है जिसमें दोनों नेताओं ने लोकतंत्र पर आंच न आने देने का संकल्प जताया.

अख़बार लिखता है कि नवाज़ शरीफ़ को सत्ता में आए साल भर भी पूरा नहीं हुआ है कि नवाज़ शरीफ़ और ज़रदारी को लोकतंत्र ख़तरे में घिरा दिखाई देने लगा है.

अख़बार कहता है कि ज़रदारी की पार्टी की जब सरकार है थी तो भ्रष्टाचार का बोलबाला था और अब नवाज़ शरीफ की सरकार ने लोगों पर महंगाई का बोझ लाद दिया है. जब तक लोकतंत्र के फ़ायदे आम लोगों तक नहीं पहुंचेंगे वो ख़तरे में ही घिरा रहेगा.

अख़बार कहता है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष में आपसी समझ होनी चाहिए लेकिन सौदेबाजी नहीं.

वक़्त ने इस विषय पर कार्टून भी बनाया है जिसमें नवाज़ शरीफ़ और ज़रदारी को एक ही झूले पर पींगें बढ़ाते देखा जा सकता है और जिस पेड़ पर ये झूला पड़ा है उस पर लिखा है जम्हूरियत यानी लोकंत्र.

सवाल नीयत का

जंग ने अपने संपादकीय में लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट ने आटे के बढ़ते दामों को लेकर दायर याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि ये कैसा कल्याणकारी इस्लामी राष्ट्र है जहां लोग भूख से मर रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने सख़्त शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि कोई भी काम सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बग़ैर नहीं होता है.

अख़बार कहता है कि अदालत ने आटे की क़ीमतों को लेकर संघीय और प्रांतीय सरकारों की रिपोर्टों को अधूरा बताते हुए इस बारे में पूरी रिपोर्ट पेश करने को कहा है.

रोज़नामा औसाफ़ ने लिखा है कि तालिबान की तरफ से संघर्षविराम को ख़त्म करने के बाद ये सवाल पैदा हो रहे हैं कि क्या पाकिस्तान की मस्जिदें और निजी क्षेत्र सुरक्षित रह पाएंगे.

अख़बार के मुताबिक़ सरकार ने शांति के लिए पूरे उत्साह के साथ बातचीत शुरू की, लेकिन तालिबान की तरफ़ से लचक और नरमी नहीं दिखाई जा रही है जबकि बातचीत की कामयाबी के लिए जरूरी है कि उनमें शामिल पक्षों की नीयत ठीक हो, वरना ये अमन का सपना सच नहीं हो पाएगा.

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