गुरुजी की चुनावी नैया पार लगा पाएंगे हेमंत?

शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन

क्या झारखंड के दुमका संसदीय क्षेत्र से शिबू सोरेन सातवीं बार जीत का परचम लहरा पाएंगे या 1998 की तरह बाबूलाल मरांडी यहां से शिबू सोरेन को देंगे मात.

क्या डेढ़ दशक बाद भाजपा की इस सीट पर वापसी होगी या फिर चुनावी मोर्चे पर घिरे शिबू सोरेन को उनके पुत्र और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन संकट से निकाल पाने में सफल रहेंगे? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो झारखंड की चुनावी राजनीति को मथ रहे हैं.

(झारखंड में क्षेत्रीय दलों का पेंच)

संथाल परगना में दुमका समेत तीन संसदीय क्षेत्र- राजमहल और गोड्डा के लिए 24 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे. दुमका में कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल ने शिबू सोरेन को अपना समर्थन दिया है. संथाल परगना झारखंड मुक्ति मोर्चा का गढ़ रहा है और लगभग चार दशकों में शिबू सोरेन यहां के कद्दावर नेता के रूप में उभरे हैं.

इस बार शिबू सोरेन की घेराबंदी भारतीय जनता पार्टी के साथ झारखंड विकास मोर्चा ने भी की है. भाजपा ने संथाल के राजमहल संसदीय क्षेत्र से झामुमो के वरिष्ठ विधायक हेमलाल मुर्मू को चुनाव लड़ाकर शिबू सोरेन को सकते में डाला है. इनके अलावा झामुमो के वरिष्ठ नेता साइमन मरांडी भी हेमंत सोरेन से लगातार नाराज़ चल रहे हैं.

वोटरों का फैसला

झामुमो को इसका भी अहसास है कि पिछले चुनाव में शिबू सोरेन महज 18 हज़ार वोटों के अंतर से जीते थे. शिबू की घेराबंदी की नजाकत को भांपते हुए ही महीने भर से हेमंत सोरेन संथाल परगना की चुनावी राजनीति में केंद्रित हो गए हैं.

(संकटों से घिरे हेमंत सोरेन)

इनके अलावा झामुमो का पूरा कुनबा दुमका में जुटा है. शिबू-हेमंत की रोज़ दस से बारह सभाएं हो रही हैं. हिन्दी दैनिक 'प्रभात खबर' के वरिष्ठ संपादक अनुज कुमार सिन्हा बताते हैं कि संथाल परगना में शिबू सोरेन का सम्मान बरक़रार है और संगठन में उनके कैडर, कार्यकर्ता भी वफ़ादार हैं.

लेकिन इस बार दुमका में एक साथ कई फैक्टर काम कर रहे हैं. झामुमो और भाजपा के साथ झाविमो भी लड़ाई में शामिल है. लिहाजा इस बार चुनाव कठिन है. इसलिए किसी भी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. सिन्हा के मुताबिक़ दुमका में युवा वोटरों का फ़ैसला अहम हो सकता है.

बाबूलाल मरांडी

राजनीति में शिबू सोरेन और बाबूलाल मरांडी दोनों बड़े क़द के नेता हैं. 1991 और 1996 के चुनावों में बाबूलाल मरांडी दुमका में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे लेकिन दोनों बार वे हार गए थे. इसके बाद 1998 में बाबूलाल मरांडी ने शिबू सोरेन और 1999 में शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन को हराया.

(हिरासत में झामुमो विधायक)

तब भी वे भाजपा में थे. लिहाजा केंद्र में वे मंत्री भी बने. झारखंड अलग राज्य गठन के बाद बाबूलाल मरांडी इस राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने. 2004 में वे भाजपा के टिकट पर कोडरमा से लोकसभा का चुनाव जीते थे. उस वक्त राज्य की चौदह सीटों में बाकी तेरह पर भाजपा हार गई थी.

शिबू सोरेन के रिकॉर्ड पर गौर करें, तो वे 1980, 1989, 1991, 1996, 2004 और फिर 2009 के चुनाव में दुमका से चुनाव जीते हैं. यूपीए-एक की सरकार में शिबू कोयला मंत्री बने थे. इनके अलावा झारखंड के वे तीन बार मुख्यमंत्री भी रहे हैं. हालांकि शिबू सोरेन चुनाव जीतने को लेकर पूरी तरह इत्मीनान में हैं.

विकास पर जोर

वे कहते हैं कि दुमका से ज्यादा वे अपनी पार्टी के दूसरे उम्मीदवारों के लिए प्रचार कर रहे हैं. शिबू अपने देसी अंदाज में कहते है, "संथाल परगना और खासकर दुमका से उनके रिश्ते चालीस साल पुराने हैं, जन, जंगल, जमीन, जल से वे इस तरह घुले मिले हैं कि जनता उन्हें ही अपना जनप्रतिनिधि चुनेगी."

(शाकाहारी हैं सोरेन)

नरेंद्र मोदी के प्रभाव को भी वे सिरे से खारिज करते हैं. सोरन को अपने पुत्र हेमंत सोरेन से भी उम्मीदें हैं. झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय प्रवक्ता विनोद पांडे कहते हैं कि हर चुनावों में यही कहा-सुना जाता है कि दिशोम गुरु (शिबू सोरेन) घिर गए हैं, लेकिन जब परिणाम निकलता है, तो गुरुजी ही जीतते हैं.

संथाल में गुरुजी का नाम और झामुमो का चुनाव चिह्न ही विरोधियों पर भारी है. कांग्रेस के झारखंड प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव भगत का मानना है कि चुनावों में इस तरह की हवाएं चलती हैं लेकिन ये सच है कि दुमका में गुरुजी ही चुनाव जीतेंगे. चुनावी मुद्दों पर गौर करें, तो यहां सभी दल विकास पर जोर दे रहे हैं.

बुनियादी सुविधाएँ

Image caption सुनील सोरेन दुमका से भाजपा उम्मीदवार हैं.

इनके अलावा रेल यातायात का विस्तार, बुनियादी सुविधाओं का अभाव, रोजगार का संकट, पलायन पर भी बातें हो रही हैं. और इन मुद्दों पर भारी है जातीय तानाबाना और दलों–नेताओं का एक दूसरे पर वार-प्रतिवार.

(झारखंड फिर राजनीतिक संकट की चपेट में)

झारखंड विकास मोर्चा के उम्मीदवार बाबूलाल मरांडी कहते हैं कि दुमका में उन्हें जनता के बीच पहले की तरह रिस्पॉन्स मिल रहे हैं. उन्होंने संथाल के पिछड़ेपन को चुनाव का मुद्दा बनाया है. वे बताते हैं कि कुशल नेतृत्व और विजन के अभाव में संथाल परगना में बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है.

सड़क, बिजली, पानी आदिवासियों को रोजगार यहां के बड़े सवाल हैं. हाल ही में कांग्रेस छोड़ बाबूलाल मरांडी के साथ आए संथाल परगना के आदिवासी नेता स्टीफन मरांडी कहते हैं कि झारखंड मु्क्ति मोरचा का दीया बुझने को है. बाबलालू मरांडी की दुमका में अच्छे नेतृत्वकर्ता के रूप में पहले से ही लोकप्रियता रही है. दुमका में झाविमो की जीत तय है.

सीधा लाभ

2009 के चुनाव में शिबू सोरेन से महज 18 हजार 812 वोट से हारे सुनील सोरेन को भाजपा ने फिर उम्मीदवार बनाया है.

(राष्ट्रपति शासन की सिफारिश)

सुनील सोरेन कहते हैं, "संथाल परगना के आदिवासियों को अब तक शिबू सोरेन और उनके परिवार ने छलने का ही काम किया है. अब वोटर इसे समझने लगे हैं. उनका दावा है कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के प्रभाव में इस बार संथाल की तीनों सीटें भाजपा ही जीतेंगी."

भाजपा के दुमका जिला अध्यक्ष दिनेश दत्ता का दावा है कि इस बार झामुमो- झाविमो के बीच वोटों के बंदवारे का सीधा लाभ भाजपा को ही मिलेगा.

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