क़तार के आख़िरी: आबादी 33 लाख, खाते 50 लाख

केरल सेविंग अकाउंट्स

विश्वन को दिल का दौरा पड़ा था. क़र्ज़ न उतार पाने से उन्हें ऐसा धक्का लगा कि उनकी सेहत गिरती चली गई. उनके परिवार में उनकी पत्नी और उनकी 17 साल की बेटी हैं. वह आज सुखी नज़र आते हैं, पर दो साल पहले तक वह क़र्ज़दार थे. क़र्ज़ यानी सूदख़ोरों के देनदार.

एक किसान की ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव का सीधा संबंध होता है उसकी ज़मीन से. यही ज़मीन विश्वन के पास नहीं थी. साहूकारों के जाल से निकलना तक़रीबन नामुमकिन था.

विश्वन कहते हैं, “मैं जिस तीन एकड़ ज़मीन पर खेती करता हूं, वह मेरी नहीं, मेरे मालिक की है.”

फिर एक दिन बैंक वाले आ गए. एर्नाकुलम से सिर्फ़ 30 किलोमीटर दूर विश्वन ने यूनियन बैंक में एक खाता खुलवाया था. बहुत से दूसरे ज़मीन विहीन किसानों की तरह.

मगर इस खाते का वह करते भी क्या, जब 30 हज़ार रुपए का पहाड़ जैसा क़र्ज़ तक चुकाना मुहाल हो रहा था. फिर भी यही खाता उनके काम आया.

महेंद्रगढ़ से गायब होती बेटियां

आज विश्वन को लगता है कि वह ग़रीबी रेखा से ऊपर उठ चुके हैं.

उन्होंने कहा, “मैं सेहत के लिहाज़ से कमज़ोर हूं. पहले की तरह मेहनत नहीं कर सकता. घर का अकेला कमाने वाला सदस्य हूं. मगर मेरे ग़रीबी के दिन दूर हो चुके हैं. अब मेरी आमदनी पंद्रह हज़ार रुपए महीने है. हमारा गुज़ारा हो जाता है.”

दो साल पहले की बात है. जब विश्वन 55 साल के थे और उनके सिर पर पूरे परिवार को चलाने की ज़िम्मेदारी थी. मगर कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था.

इसी बीच रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने तय किया कि एर्नाकुलम में हर परिवार के सदस्यों का बैंक खाता खोला जाए, ताकि सरकारी क़र्ज़ और सब्सिडी सीधे किसानों के खाते में पहुंचे. विश्वन ने तब अपनी पत्नी और बेटी के नाम का अकाउंट खुलवा दिया.

किस्मत से सरकारी क़र्ज़ माफ़ी अभियान में विश्वन का नाम भी शामिल कर लिया गया.

मगर तब तक विश्वन बिस्तर से लग चुके थे. दिल का दौरा पड़ा, तो पैसा पानी की तरह बहने लगा. कहां पहले से 30 हज़ार रुपए का कर्ज़ और ऊपर से इलाज में 88 हज़ार रुपए का ख़र्चा.

वह तो उनका स्वास्थ्य बीमा न होता, तो हालात कुछ और होते. यह बीमा खाता खुलवाते समय हुआ था.

अस्तित्व की लड़ाई लड़ते आदिवासी

विश्वन और उनके गांव कुलतिकेरा के लोग क़र्ज़दारों के जंजाल से कैसे बाहर निकले? क्योंकि महाराष्ट्र, पंजाब और आंध्र प्रदेश के किसानों की ख़ुदकुशी की कहानियां कुछ और ही बयान करती हैं.

न बैंक, न पोस्ट ऑफ़िस, न पेयजल

57 साल के विश्वन मंझोले क़द के दुबले-पतले किसान हैं. उनकी ज़िंदगी उनके छोटे से गांव में ही गुज़री.

कुलेतिकेरा केरल के कुछ सबसे ग़रीब गांवों में है. हरियाली से घिरे इस गांव की आबादी है क़रीब 200 घर. कम से कम केरल के आर्थिक स्तर के पैमाने के हिसाब से नापें, तो कुलतिकेरा के किसान ग़रीब ही कहे जाएंगे.

यहां सिर्फ़ वो किसान बसते हैं, जिनका आसरा धान और वो सब्ज़ियां हैं, जो शहर में बिकने के बाद उनके रोज़मर्रा की ज़िंदगी चलाने लायक पैसा दे जाती हैं.

गांव हाइवे से काफ़ी अंदर है और अगर आप यहां के बाशिंदे नहीं हैं या यहां के बाशिंदों के रिश्तेदार नहीं तो आप शायद ही यहां आने का कष्ट करें.

इस गांव में मवेशी, मचान और मिट्टी से बने घर आपको नहीं दिखेंगे. सभी घर पक्के हैं, विश्वन का घर भी. और इनके इर्द-गिर्द पेड़ और हरे-भरे खेत देखने को मिलेंगे.

वोट पर भरोसा, नेता पर नहीं

जब आप इसके बाशिदों से मुख़ातिब होते हैं तब आपको पता चलता है कि यहां ज़िंदगी बसर करना आसान नहीं है.

इस गांव से पहला स्कूल आधे घंटे की दूरी पर है. न कोई बैंक है, न पोस्ट ऑफिस. पीने का पानी भी यहां नहीं है. कोई सरकारी बस यहां नहीं आती है, न ट्रेन.

चुनावी गहमागहमी से दूर कुलतिकेरा

कुलतिकेरा गांव से आप जब बाहर निकलकर हाइवे पर आते हैं तो आपका स्वागत भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के पोस्टरों से होता है.

सड़क पर आम चुनाव की गहमागहमी दिखती है, पर कुलेतिकेरा इससे अछूता है. न वहां आपको कोई पोस्टर दिखता है, न चुनावी माहौल और न किसी किस्म की नारेबाज़ी.

मगर विश्वन हमेशा वोट देते हैं. इसके लिए हालांकि उन्हें पास के गांव तक सफ़र करना पड़ता है. विश्वन बताते हैं कि इस बार भी जाएंगे. विश्वन की सियासत में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं. साथ ही वह यह भी कह देते हैं कि दिल्ली में सरकार चाहे किसी की हो, उनके गांव पर इसका कोई असर नहीं होने वाला, और न ही उनके जीवन में इससे कोई बदलाव आने वाला है.

वह आत्मसंतुष्टि के भाव से यह भी जोड़ देते हैं, “गांव में सुविधाएं कम हैं, लेकिन हमें कोई शिकायत नहीं. सभी सुविधाएं यहीं आसपास हैं.” विश्वन की दुनिया सीमित है और ज़रूरतें भी.

कपास जिससे ज़ख़्म ढकने वाले फाहे नहीं बनते

विश्वन की रोज़ाना की दिहाड़ी 600 रुपए है, जो बाक़ी राज्यों की तुलना में ज़्यादा है. वे कहते हैं, “मेहनत इतनी है कि 90 फ़ीसदी खेती का काम मैं ख़ुद करता हूं जबकि हाल ही में मेरे दिल के ऑपरेशन हुआ है.”

एर्नाकुलम में बहुत संपन्नता तो शायद आपको न दिखे, मगर तंगहाली और भीषण ग़रीबी भी नहीं देखने को मिलेगी.

आबादी 33 लाख, खाते 50 लाख

शायद इसकी वजह है लेनदेन के तरीक़े में बदलाव.

एर्नाकुलम में अब 50 लाख बैंक खाते हैं. हालांकि ज़िले की आबादी सिर्फ़ 33 लाख है. 2013 में इस ज़िले को भारत का सबसे अधिक बैंक खातों वाला ज़िला घोषित किया गया है.

ज़िले में 900 व्यावसायिक बैंक शाखाएं हैं और 200 सहकारी बैंक शाखाएं. यहां किसानों को क़र्ज़ आसानी से मिल जाते हैं. इसके बावजूद निजी क्षेत्र के बैंक, माइक्रोफ़ाइनेंस और निजी साहूकार भी यहां सक्रिय हैं.

यूनियन बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी जयप्रकाश से मेरी मुलाक़ात हुई. जो बैंक खाते खोलने की योजना लागू करने वालों में सबसे आगे थे.

वह कहते हैं, “मैं यह दावा नहीं करता कि सभी ग़रीब इस योजना के तहत आ गए हैं लेकिन इसने पूरे ज़िले के ज़्यादातर लोगों को कवर किया है.”

जयप्रकाश कहते हैं कि इस योजना का उद्देश्य किसानों की ग़रीबी दूर करना था, ताकि वो आसान ब्याज दरों पर क़र्ज़ हासिल कर सकें, माइक्रो बीमा करा सकें और क़र्ज़ों की अदायगी के योग्य बन सकें.

वह कहते हैं इस योजना का एक और मक़सद था किसानों को साहूकारों के चंगुल से आज़ाद कराना. “इसलिए यह ज़रूरी था कि सभी ग़रीब लोगों के अपने बैंक खाते हों.”

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