इक़बाल बानो: मोहब्बत करने वाले कम न होंगें!

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1985 का साल रहा होगा. जनरल ज़ियाउल हक़ के पाकिस्तान में रेडियो और टेलीविज़न पर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की रचनाओं पर अघोषित प्रतिबंध लगा हुआ था. प्रशासन ने बहुत मुश्किल से फ़ैज़ का जन्मदिन मनाने की अनुमति दी थी. लाहौर के अलहमरा ऑडीटोरियम में इक़बाल बानो को फ़ैज़ को गाना था.

सुनें: इसी रिपोर्ट पर आधारित विशेष रेडियो रिपोर्ट

जनरल ज़िया के पाकिस्तान में न सिर्फ़ फ़ैज़ पर प्रतिबंध था बल्कि औरतों के साड़ी पहनने को भी हिकारत की नज़रों से देखा जाता था. इक़बाल बानो उस दिन सिल्क की साड़ी पहन कर आई थीं और पूरे प्रशासन को धता बताते हुए उन्होंने 'हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे', गाया था और पूरे लाहौर ने उनके सुर में सुर मिलाए थे.

पाकिस्तान की नामी गायिका टीना सानी उन ख़ुशकिस्मत लोगों में थी जो उस दिन अलहमरा हॉल में मौजूद थे.

टीना बताती हैं, ''लोग इतने ज़्यादा थे कि हॉल के दरवाज़े खोल दिए गए थे. लोगों की मांग पर बाहर मॉल पर भी लाउडस्पीकर्स की व्यवस्था की गई थी. जैसे ही इक़बाल बानो ने 'हम देखेंगे' गाना शुरू किया, लोग खड़े हो गए और उनके साथ गाने लगे. लोगों के जोश को कम करने के लिए वहाँ मौजूद पुलिसवालों ने हॉल की बत्तियाँ बुझा दीं, लेकिन इक़बाल बानो ने तब भी गाना जारी रखा और उनके साथ हज़ारों की भीड़ ने भी.''

वे बताती हैं, ''उस दिन मैंने अपनी आँखों से लोगों को पूरी तरह से पागल होते देखा है. मुझे याद नहीं कि उन्होंने इसे कितनी देर तक गाया लेकिन इतना ज़रूर याद है कि ये गाना ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था. जब भी वो इसे ख़त्म करने की कोशिश करतीं लोग उनके साथ गाने लगते. बाद में ये गाना उनका ट्रेडमार्क बन गया था. जहाँ भी वो जातीं, इस जाने की फ़रमाइश सबसे पहले होती.''

मिली सज़ा, लगा प्रतिबंध

इस गीत को गाने की सज़ा इक़बाल बानो को ये मिली कि उन पर पाकिस्तानी टेलीविज़न और रेडियो पर प्रतिबंध लगा दिया गया. उनके गाने के टेप काले बाज़ार में बिकने लगे.

सरकारी प्रतिबंध के बावजूद वो लोगों के घरों में ख़ास महफ़िलों में भाग लिया करती थीं और कहा जाता है कि कई बार राष्ट्रपति ज़िया के जनरल सादे कपड़ों में आकर इक़बाल बानो के गायन का आनंद उठाया करते थे.

1935 में दिल्ली में जन्मी इक़बाल बानो का बचपन रोहतक में बीता था. उन्होंने संगीत सीखा था दिल्ली घराने के उस्ताद चाँद खाँ से. 1952 में 17 साल की उम्र में वो पाकिस्तान चली गईं जहाँ उनकी एक ज़मींदार घराने में शादी हुई. लेकिन दिल्ली का साथ उन्होंने कभी नहीं छोड़ा.

दिल्ली घराने के ख़लीफ़ा इक़बाल अहमद कहते हैं, ''हम बाजी बुलाते थे उनको. उन्होंने हमारे नाना से संगीत सीखा. जब भी वो भारत आती थीं हमारे यहाँ ही रुकती थीं. जब भी वो शाम को बोर हो जातीं, मुझसे कहतीं मुझे दिल्ली घुमाने ले चलो. मेरे पास उन दिनों एक पुरानी फ़िएट कार हुआ करती थी और मुझे उन्हें उस पर बिठाने में शर्म आया करती थीं लेकिन वो हंस कर कहा करती थीं, दिल बड़ा होना चाहिए.''

मीठी और सरल

बेगम अख़्तर की शिष्या और जानी मानी गायिका शांति हीरानंद से उनकी पहली मुलाक़ात लाहौर में हुई थी. शांति हीरानंद कहती हैं, ''इंडिया हैबीटेट सेंटर पर हम लोग घंटों संगीत के बारे में बातें किया करते थे. उनको कोई घमंड नहीं था. अच्छे से तपाक से मिलती थीं. उनकी गायकी में एक सहूलियत सी थी जैसी कि होनी चाहिए. बहुत ही मीठी, बहुत ही सरल और प्यार करने वाली औरत थीं.''

साल 1986 में जब वो दिल्ली आई थीं तो ऑल इंडिया रेडियो की फ़ारसी विभाग की अध्यक्षा सलमा हुसैन ने रिकॉर्डिंग के बाद उन्हें अपने घर खाने पर बुलाया था. खाने के बाद सलमा के पॉमपोश कॉलोनी के निवास पर एक संगीत की महफ़िल हुई थी जिसे वो आज तक नहीं भूल पाई हैं.

सलमा कहती हैं, ''मैंने उनसे पूछा था कि क्या आप फ़ारसी में गा सकती हैं तो वो बहुत हंसीं और बोलीं कि मैं फ़ारसी उसी तरह गाती हूँ जैसे उर्दू. उन्होंने अमीर ख़ुसरो और निज़ामी गंजवी के कलाम गाए. जब मैंने उनकी ग़ज़लों का ये प्रोग्राम एयर किया तो मेरे पास अफ़ग़ानिस्तान से हज़ारों तारीफ़ के ख़त आए. मैंने रिकॉर्डिंग के बाद उनसे कहा था कि मुझे बड़ी ख़ुशी होगी अगर मेरे घर आएं और हमारे साथ खाना खाएं. वो आईं. उन्होंने उस दिन ऐसी यादगार शाम हमें दी जिसे हम कभी भूल नहीं पाएंगे. खाने से पहले उन्होंने फ़ैज़ की एक दुआ पढ़ी थी-

'आइए हाथ उठाएं हम भीहम जिन्हें रस्मे-दुआ याद नहींहम जिन्हें सोज़े- मोहब्बत के सिवाकोई बुत कोई ख़ुदा याद नहींआइए अर्ज़गुज़ारे कि निगारे हस्तीज़हरे इमरोज़ में शीरिनि-ए-फ़र्दा भर दें.'

सरहद पार शोहरत का आलम

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Image caption इक़बाल बानो ने फ़ैज़ को दिल से गाया

इक़बाल बानो भारत और पाकिस्तान के साथ साथ ईरान और अफ़गानिस्तान में भी उतनी ही लोकप्रिय थीं. 1979 से पहले वो हर साल काबुल के सांस्कृतिक मेले जश्ने काबुल में भाग लेती थीं. वहीं एक बार अफ़ग़ानिस्तान के शाह ज़ाहिर शाह ने उन्हें एक सोने का वाज़ भेंट किया था.

सलमा हुसैन ने एक बार उनसे पूछा था कि फ़ारसी में गाने का आपका सिलसिला किस तरह शुरू हुआ. वो कहने लगीं, ''मुझे अमीर ख़ुसरो का कलाम बहुत अच्छा लगा. मैंने न सिर्फ़ उसको पढ़ा बल्कि उसको गाया भी. फिर मैंने निज़ामी गंजवी को गाया और फिर ईरान और अफ़ग़ानिस्तान में मेरी प्रसिद्धि फैल गई.''

सलमा कहती है कि इक़बाल बानो ग़ज़लों को साथ-साथ ठुमरी और दादरा भी उसी ज़बरदस्त अंदाज़ में गाती थीं. एक बार नैना देवी के घर पर उन्होंने सिर्फ़ ठुमरियाँ गाई थीं. जहाँ भी वो जाती थीं फ़रमाइश आती थी कि वो तू लाख चले रे गोरी थम-थम के, तेरी पायल के गीत हैं छमछम के, ज़रूर गाएं.

बेगम अख़्तर से तुलना

कुछ संगीत पंडितों का मानना है कि इक़बाल बानो और बेगम अख़्तर के गायन में काफ़ी समानताएं हैं.

शांति हीरानंद कहती हैं, ''इक़बाल बानो बेग़म अख़्तर को बहुत पसंद करती थीं. ग़ज़लों की अदायगी, उसे कहाँ तोड़ना चाहिए, कम से कम संगीत वाद्यों का इस्तेमाल, ये कला बेग़म अख़्तर के बाद किसी में थी तो इक़बाल बानो में थी. वो ख़याल सीखे हुए थीं और उसी अंदाज़ में गाती थीं.''

'हम देखेंगे' के बाद जो ग़ज़ल इक़बाल बानो का पर्यायवाची बनी वो थी फ़ैज़ की 'दश्ते तन्हाई'. इसको फ़ैज़ ने लिखा ज़रूर था लेकिन इसकी आत्मा को आत्मसात किया इक़बाल बानो ने.

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मैंने टीना सानी से पूछा कि इक़बाल बानो की आपकी सबसे पसंदीदा ग़ज़ल कौन सी है? उन्होंने छूटते ही जवाब दिया था, ''दश्ते- तन्हाई.... हमेशा से. मैं तेरह या चौदह साल की रही होउंगी. मुझे उस समय ये भी पता नहीं थी कि इसे फ़ैज़ साहब ने लिखा है लेकिन मैं कह सकतीं हूँ कि बच्चे-बच्चे को याद थी उस ज़माने में. अब तो ये ग़ज़ल फ़ैज़ से ज़्यादा इक़बाल बानो की हो गई है.''

फ़ैज़ को बनाया अमर

यूँ तो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को कई गायकों ने गाया है लेकिन उनकी गज़लों को अमर करने का श्रेय जितना इक़बाल बानो को जाता है उतना शायद किसी को भी नहीं.

फ़ैज़ की बेटी सलीमा हाशमी कहती हैं, ''वो अक्सर हमारे घर पर गाया करती थीं. उन्होंने पहली बार 1981 में फ़ैज़ को उस समय गाना शुरू किया था जब वो बैरूत में निर्वासन में रह रहे थे. हमारे परिवार के लोगों के दिलों और दिमाग़ में उनके लिए हमेशा एक ख़ास जगह रहेगी.''

इक़बाल बानो जब मंच पर आती थीं और अपने नियंत्रित, ख़ास अंदाज़ में गाना शुरू करतीं थी तो दुनिया जैसे रुक सी जाया करती थी. उनको इस दुनिया से गए पाँच साल होने को आए हैं लेकिन उनका संगीत कालजयी है. फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का एक शेर याद आता है-

'वीराँ है मयकदा, ख़ुमो साग़र उदास हैंतुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के'(बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें. आप बीबीसी हिंदी से फ़ेसबुक या ट्विटर जैसे सोशल मीडिया माध्यमों पर भी जुड़ सकते हैं)

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